Monday, March 25, 2013

मन पखेरू उड़ चला है फिर (सुनीता शानू )

मन पखेरू उड़ चला है फिर (सुनीता शानू )



शब्द को मिलती गयीं
नव अर्थ की उंचाइयाँ
भाव पुष्पित हो गए
मिटने लगी तन्हाईयाँ
गीत में स्वर भर दिए हैं
प्यार के अलाप ने
मन पखेरू उड़ चला फिर
आसमाँ को नापने ...
सुनीता शानू का यह काव्य संग्रह अपनी पहली उड़ान में लिखे शब्दों के
माध्यम से दिल के हर गहराई में उतरना की कोशिश में है ....प्रेम से रची
इन रचनाओं में अधिकतर प्रेम भाव ही उपजा दिखाई देता है ..जो ज़िन्दगी से
मिलने पर कविता बन जाता है ..
तुमसे मिल कर ज़िन्दगी
बन गयी मैं एक कविता
और
मैं एक कलम
जो हर वक़्त
तुम्हारे प्यार की स्याही में
बनाती है तस्वीर तुम्हारी ..........
.दिल जब यूँ ही प्यार में पगा होता
है तो अपने एहसास को शब्दों में ढाल देता है ..मन का पंछी एक पेखुरु ही
तो है जो जहाँ तहां बिना लगाम के उड़ता रहता है ...सुनीता की कई रचनाये
बहुत प्रभवित करती है क्यों की यह सीधे दिल से लिखी गयी हैं ..
फेंक कर पत्थर जो मारा
तड़प उठी मौन लहरें
डूबने से डर रहे तुम
शांत मन की झील में !!...
यहाँ पर एक ख़ामोशी है लफ़्ज़ों की सतह पर जो बात
करती है ...श्याम सखा से बाते भी है इस उड़ते विचरते संग्रह में तो नारी
मन की व्यथा भी मुखुर हुई है लफ़्ज़ों में ..मैं अपना घर ढूंढ़ती  हूँ
रचना में हर नारी मन का सवाल है जो न जाने कितने युगों से है और हर लिखने
वाली नारी मन की कलम से लिख दिया जाता है ...
की बेटी तो पराई है
मगर माँ, सच बतला
घर कौन सा है अपना
जहाँ बेटी बस बेटी है
तभी से आज तक माम
मैं अपना घर  ढूंढ़ती हूँ
खबर दुनिया बदलने की .काम वाली बाई, माँ ,कन्यादान आदि रचनाये
अपनी बात
कहने में पूर्ण रूप से  सक्षम रही है ...
छोटी रचनाएं मुझे अधिक रूप से पसंद आई ..पहले वाली कुछ रचनाये कुछ भटकाव
लिए हैं ..पर आखिरी पेज पर लिखी रचनाये पूर्ण हैं ..बचपने से आगे जैसे एक
उम्र को जीने के अनुभव को लिए ...हुए जैसे
कुदरत के लिए भी सुनीता के दिल की कलम बोल उठती है “अमलतास” ओढ़ा दी चुनर
आदि रचनाये बहुत ही बढ़िया लगी इस सिलसिले में ..
कई कवितायें सुनीता की
कहानी जैसी लगी है मैंने चुना हर वो रास्ता /जो जाता था /तेरे घर की
ओर/परन्तु /आज तुम्ही ने अपना घर बदल लिया ..कम शब्दों में बहहुत सुन्दर
कहानी नजर आती है इस में ...
रचनाओं के बीच में बने चित्र बहुत मनमोहक है ..यह सुनीता के कलापक्ष को
दर्शाते हैं ...अभी यह पहला काव्य संग्रह है सुनीता का ..पर इस संग्रह के
शुरू से किया गया सफ़र जब जैसे पन्ना दर पन्ना आगे बढता है तो लगता है की
आगे आने वाला संग्रह निश्चित तौर पर बहुत बढ़िया होगा !
मन पखेरू फिर उड़ चला
रोक सकी न दीवारें
तुम बांधते रह गए
अशरीरी को सांकलों में !
दिल के लफ्ज़ हैं यह कोई इन्हें बाँध के रोक भी कैसे पायेगा ...जैसे इस
रचना के लिखे भाव बेहद सुन्दर है सच्चे हैं ..जीना चाहती थी मैं”
“दीमक भी पूरा नहीं चाटती
ज़िंदगी दरख्त की
फिर तुमने क्यों सोच लिया
कि मैं वजह बन जाऊँगी
तुम्हारी साँसों की घुटन
तुम्हारी परेशानी की
और तुम्हें तलाश करनी पड़ेगी वजहें
गोरख पांडॆ की डायरी या फिर
परवीन शाकिर के चुप हो जाने की।
ये सच है मैं जीना चाहती थी
तुमसे माँगी थी चंद सांसें-
वो भी उधार।“
सुनीता व्यंग ,लेख ओर हास्य रचनाये भी खूब लिखती है ..इस संग्रह में उनके
यह भाव नजर नहीं आये .उसके लिए उनसे आग्रह रहेगा की वह एक हास्य व्यंग पर
संग्रह लिखे ...नीले आवरण से सजा कवर पेज अपनी उड़ान लफ़्ज़ों के माध्यम से
बहुत हद तक सफल रहा है हिंद-युग्म से प्रकाशित इस पुस्तक का कवर पेज़ विजेन्द्र एस बिज़ ने तैयार किया है. ..आगे भी इन्तजार रहेगा इस मन के पखेरू की उड़ान का
..
जो दिल की गहराई में अपनी बात सफलता से कह सके ..चूँकि इस संग्रह के बारे में मैंने इसको होली के अवसर पर ही पोस्ट किया है ..तो उनके संग्रह के आखिरी पन्ने पर दोहे फागुन के मेरे साथ होली खेल गए ...आप सब भी रंग जाइये उनके लिखे इन दोहों में ..

फागुन आया झूम कर .ऋतु वसंत के साथ 
तन मन हर्षित कर रहे मोदक दोनों हाथ ........वाह वाह ..!! इस से अच्छा और क्या हो सकता है ..आया न मुहं में पानी .:)..अगला देखिये ..

मधुकर ले कर आगया , होंठो पर मकरंद 
गाल गुलाबी हो गए .हो गयी पलके बंद .....प्यार की मीठी फुहार से सरोबार है यह दोहा ..:)

गली गली रंगत भरी ,कली -कली सुकमार 
छली छली सी रह गयी ,भली भली सी नार ......छल गया मोहे कान्हा अपने ही किसी रंग से :)
 

तो आप सबको होली मुबारक ...:)
 
पुस्तक: "मन पखेरू उड़ चला फिर"
लेखिका: सुनीता शानू
प्रकाशक: हिंद-युग्म१, जियासराय, हौजखास, नई दिल्ली-110016
मूल्य: 195 रुपये मात्र















12 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज की ब्लॉग बुलेटिन १ अप्रैल से रेल प्रशासन बनाएगा सब को फूल - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

expression said...

बहुत अच्छी समीक्षा रंजू....कल ही वंदना अवस्थी जी की समीक्षा भी पढी....
सुनीता जी को बधाई एवं शुभकामनाएं.

आभार.
सस्नेह
अनु

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर समीक्षा

Anju (Anu) Chaudhary said...

रंजू दी ..खूबसूरत एहसासों से सजी समीक्षा ...सुनीता को बहुत बहुत बधाई उनके इस संग्रह के लिए

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत २ बधाई,सुनीता जी को ,,पुस्तक की जानकारी देने के लिए आभार ,आपका रंजना जी,,,
होली की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाए,,,

Recent post : होली में.

Arvind Mishra said...

उनकी कृति और आपकी समीक्षा -सोने में सुहागा!
होली की रंगारंग शुभकामनाएं!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुंदर पुस्तक परिचय .... यह पुस्तक आज ही मुझे मिली है .... मनन जारी है ।

vandana gupta said...

सुन्दर समीक्षा............सुनीता जी को बधाई एवं शुभकामनाएं.

दिगम्बर नासवा said...

वाह ... आपकी समीक्षा लाजवाब है ...
पढ़ने को मन हो आया ...
होली की बधाई ..

Sarika Mukesh said...

शब्द को मिलती गयीं
नव अर्थ की उंचाइयाँ
भाव पुष्पित हो गए
मिटने लगी तन्हाईयाँ
गीत में स्वर भर दिए हैं
प्यार के अलाप ने
मन पखेरू उड़ चला फिर
आसमाँ को नापने ...

बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आप दोनों को...
सादर/सप्रेम
सारिका मुकेश

Sarika Mukesh said...

शब्द को मिलती गयीं
नव अर्थ की उंचाइयाँ
भाव पुष्पित हो गए
मिटने लगी तन्हाईयाँ
गीत में स्वर भर दिए हैं
प्यार के अलाप ने
मन पखेरू उड़ चला फिर
आसमाँ को नापने ...

बधाई एवं शुभकामनाएं.

संजय भास्‍कर said...

खूबसूरत समीक्षा ...सुनीता को बहुत बहुत बधाई