Monday, December 17, 2012

मुक्ति की भाषा

"सुनो .."
तुम लिखती हो न कविता?"
"हाँ " लिखती तो हूँ
चलो आज बहुत मदमाती हवा है
रिमझिम सी बरसती घटा है
लिखो एक गीत प्रेम का
प्यार और चाँदनी जिसका राग हो
मदमाते हुए मौसम में यही दिली सौगात हो
गीत वही उसके दिल का मैंने जब उसको सुनाया
खुश हुआ नज़रों में एक गरूर भर आया,

फ़िर कहा -लिखो अब एक तराना
जिसमें इन खिलते फूलों का हो फ़साना
खुशबु की तरह यह फिजा में फ़ैल जाए
इन में मेरे ही प्यार की बात आए
जिसे सुन के तन मन का
रोआं रोआं महक जाए
बस जाए प्रीत का गीत दिल में
और चहकने यह मन लग जाए
सुन के फूलों के गीत सुरीला
खिल गया उसका दिल भी जैसे रंगीला

वाह !!....
अब सुनाओ मुझे जो तुम्हारे दिल को भाये
कुछ अब तुम्हारे दिल की बात भी हो जाए
सुन के मेरा दिल न जाने क्यों मुस्कराया
झुकी नज़रों को उसकी नज़रों से मिलाया
फ़िर दिल में बरसों से जमा गीत गुनगुनाया
चाहिए मुझे एक टुकडा आसमान
जहाँ हो सिर्फ़ मेरे दिल की उड़ान
गूंजे फिजा में मेरे भावों के बोल सुरीले
और खिले रंग मेरे ही दिल के चटकीले
कह सकूं मैं मुक्त हो कर अपनी भाषा
इतनी सी है इस दिल की अभिलाषा..


सुन के उसका चेहरा तमतमाया
न जाने क्यों यह सुन के घबराया
चीख के बोला क्या है यह तमाशा
कहीं दफन करो यह मुक्ति की भाषा
वही लिखो जो मैं सुनना चाहूँ
तेरे गीतों में बस मैं ही मैं नज़र आऊं...

तब से लिखा मेरा हर गीत अधूरा है
इन आंखो में बसा हुआ
वह एक टुकडा आसमान का
दर्द में डूबा हुआ पनीला है.....

11 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

गीत पूरे हों सभी के,
मन करे उन्माद मद में।

सदा said...

कह सकूं मैं मुक्त हो कर अपनी भाषा
इतनी सी है इस दिल की अभिलाषा..
गहन भाव लिये उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति

vandana gupta said...

ये इतनी सी अभिलाषा ही चिर अभिलाषा बन ह्रदय को बींधती रहतीहै।

Akhil said...

waah...bahut sundar aur marmsparshi rachna...bahut bahut badhai aapko

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...


चाहिए मुझे एक टुकडा आसमान
जहां हो सिर्फ़ मेरे दिल की उड़ान
गूंजे फिजा में मेरे भावों के बोल सुरीले
और खिले रंग मेरे ही दिल के चटकीले
कह सकूं मैं मुक्त हो कर अपनी भाषा
इतनी सी है इस दिल की अभिलाषा…

बहुत सुंदर कविता है
आदरणीया रंजना जी !
बहुत खूबसूरत !

दुआ है आपको आपके हिस्से का एक टुकड़ा आसमान हासिल हो … आमीन !

शुभकामनाओं सहित…

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

mukti ki bhaasha pehli baat suni aur samjhee hai...sundar.!!

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

गीत, कविता होते हैं, हृदय के उदगार ।
किसी के रोके रुके नहीं, भावनाओं की धार ।।

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (19-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | अवश्य पधारें |
सूचनार्थ |

rashmi ravija said...

आवाज़, सोच, सब पर तो पहरा है.. गीत कैसे पूरा हो।
मार्मिक कविता

Maheshwari kaneri said...

सभू गीत पूरे हो..शुभकामनाएं

Neelima said...


तब से लिखा मेरा हर गीत अधूरा है
इन आंखो में बसा हुआ
वह एक टुकडा आसमान का
दर्द में डूबा हुआ पनीला है.....बहुत खूबसूरत !

Anonymous said...

ranjanaji,aapki kavita dil ko chhu lene vali hai,stree ko koi nahi samjhta ,uski zindagi shayad ek KATHHPUTLI ki tarah hai...