Wednesday, October 31, 2012

अमृता की पुण्य तिथि पर ..मेरी कलम से

अमृता की पुण्य तिथि पर ..मेरी कलम से

अमृता इमरोज़ ...प्यार के दो नाम ..जिनके बारे में जब जाना तब मेरी उम्र सपने बुनने की शुरू हुई थी ,और प्यार का वह हल्का एहसास क्या है अभी जाना नहीं था | बहुत याद नहीं आता कि कब किताबें पढने की लत लगी पर जो धुंधला सा याद है कि घर में माँ को पढने का बहुत शौक था और उनकी "मिनी लाइब्रेरी "में दर्ज़नों उपन्यास भरे हुए थे ...माँ तो बहुत छोटी उम्र में छोड़ कर चली गयी और सौगात में जैसे वह अपनी पढने की आदत  मुझे दे गयी ...यूँ ही एक दिन हाथ में "अमृता प्रीतम की रसीदी टिकट" हाथ में आई और उसको पढना शुरू कर दिया .
.उसका एक एक अक्षर दिल में एक मीठा सा एहसास बन कर धडकने लगा ,उनका लिखा हुआ उस में कि कोई साया उनको दिखता है जिस को उन्होंने "राजन "नाम दिया और अपने पिता से छिप कर वह उस से बाते करती मिलती है ,वही एहसास जैसे मेरे अन्दर भी जाग गया .. और वह साया अमृता की रसीदी टिकट से उतर कर मेरे ख्यालों में समां गया | जिस से  मैं भी अमृता की तरह ढेरों बातें करती और सपने बुनती ....पर साया तो साया ही होता है ,कभी कभी लगता है अमृता इमरोज़ के बारे में पढना मुझे बहुत अधिक स्वप्निल बना गया ....अमृता की तलाश साहिर से निकली तो इमरोज़ को पा कर खत्म कर गयी ..पर अमृता इमरोज़ तो एक ही हैं इस विरले जगत में ...न अमृता बनना आसान   है और न ही इमरोज़ को पाना ...जब भी इमरोज़ से मिली अमृता के लिए उनकी नजरों में बेपनाह मोहब्बत देखी ...सच कहूँ तो एक जलन सी हुई ...कि कोई इंसान इस समय में भी किसी से इतना प्यार कैसे कर सकता है ...
अमृता ही थी जिसने मुझे यह एहसास दिया कि चाँद में   अपने राजन से बाते करना और वही थी जिसने बताया कि पानी का परसना क्या होता है ...३६ चक उपन्यास में जहाँ अनीता नदी में नहा रही है और वह उसी धार की तरफ हो जाती है जो कुमार की तरफ से आ रही है ...प्रेम का इस से सुन्दर रूप और क्या हो सकता है ....यही सच था ...अमृता की ज़िन्दगी का ...जिसने मुझे भी प्रेम के इस सुन्दर एहसास से परिचित करवाया ....आधी रोटी पूरे चाँद का सही अर्थो में अर्थ समझाया ....

    एक बार किसी ने मुझसे पूछा आखिर आपको किन किताबों ने बिगाड़ा और मैंने बहुत गर्व से कहा अमृता के लिखे ने ...असलियत में कोई इमरोज़ नहीं मिलता क्यों कि इमरोज़ तो एक ही था ,जिसने न उम्र को देखा न ही अमृता के अतीत को ..बस अमृता के साथ रहा एक लोकगीत की तरह जिसका मीठा स्वर आज भी रूह को मीठा सा एहसास देता है अपने रंगों से प्रेम का सही उजाला दिखा देता है |
कभी कभी सोचती हूँ ..जिसने भी कभी दिल से प्यार किया होगा ,उसने एक बार इमरोज़ ,अमृता के से प्यार की कल्पना जरुर की होगी ...मेरे दिल की तरह उस दिल ने भी चाह होगा ..कि सामने वाला उसके कहने से पहले उसके दिल की बात समझ जाए और उस बात को पूरा कर दे ..जैसे इमरोज़ अमृता की हर बात उसके कहने से पहले समझ जाते हैं ....और न जाने कैसे घंटो पहरों घर में रह कर  ढेरों बातें किया करते थे जिस में लफ्ज़ भी होते ,रंग भी और गहरी ख़ामोशी भी ... और फिर आखिर तंग आ कर दुनिया पूछती आखिर तुम दोनों  घर में रह कर करते क्या हो ...और फटाक से जवाब आता ..बातें ..............उफ़ यह एहसास ही रोमांचित कर जाता है ....इमरोज़ की पेंटिंग और अमृता  की कविताओं में, किरदारों में एक ख़ास रिश्ता जुडा हुआ दिखायी देता है ..एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे सामाजिक   मंजूरी की जरुरत नही पड़ती है ...और दिल को हर पल यही एहसास कराता है कि यदि अमृता इमरोज़ का रूहानी प्यार सच्चा है तो कहीं ज़िन्दगी में सच्चाई और भी बाकी होगी ...इस प्रेम की ..इन्तजार तो जारी है और जारी रहेगा ..
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