Tuesday, October 02, 2012

अकेला और बेबस


अपने मैं होने का
दंभ क्यों
कैसे
जहन पर
छा जाता है

सोते जागते
हँसते गाते
हर वक़्त बस
मैं ,मैं
का राग
यह दिल
अलापता है

किंतु मैं
सिर्फ़ ख़ुद के
होने से कहाँ
पूर्ण हो
पाता है
तुम शब्द का
इस में
शामिल होना ही
इसको
सार्थक  हम बना
पाता है....

जैसे रात का
अस्तित्व भी
चाँद,तारों
जुगनू से
जगमगाता है

पर शायद
 चाँद भी
समझता है
ख़ुद को अहम
अपनी ही धुन में
खोया सा
घुलते घुलते
बस सिर्फ़ एक
लकीर सा
रह जाता है

और ........
तब चाँद
कितना अकेला
और बेबस सा
हो जाता है !!



20 comments:

Arvind Mishra said...

जी! कहते भी तो कुछ नहीं बनता :-(

expression said...

वाह....
बेहद सुन्दर !!!
नाज़ुक से जज़्बात...
"मैं" के दंभ को नकारते...

सस्नेह
अनु

Dheerendra singh Bhadauriya said...

और
तब चाँद
कितना अकेला
और बेबस सा
हो जाता है !!,,,,,,उत्कृष्ट प्रस्तुति ,,,,

RECECNT POST: हम देख न सके,,,

Meenakshi Mishra Tiwari said...

मैं और तूके इस अंतर्द्वन्द्व का शायद कोई अंत नहीं....

बहुत सुन्दर रचना

रंजू जी

सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मैं ...अकेला कर देता है ...बहुत खूबसूरती से लिखा है

Amit Srivastava said...

चिर परिचित द्वन्द , मैं और तुम का |

somali said...

main akela kar deta hai or hum dilata hai purnta ka abhas....bahut sundar rachna mam

Neelima sharrma said...

किंतु मैं
सिर्फ़ ख़ुद के
होने से कहाँ
पूर्ण हो
पाता है
तुम शब्द का
इस में
शामिल होना ही
इसको
सार्थक हम बना
पाता है..मैं और तुम मिलकर हम बनते हैं तभी सम्पूरण होती हैं कायनात हमारी ......... बहुत खूब रंजू जी

Maheshwari kaneri said...

वाह....
बेहद सुन्दर !!!

सदा said...

वाह ... बहुत खूब

Udan Tashtari said...

गज़ब- अद्भुत!

Rajput said...

और
तब चाँद
कितना अकेला
और बेबस सा
हो जाता है ....
बहुत गहन भावों के साथ लिखी रचना

वन्दना अवस्थी दुबे said...

किंतु मैं
सिर्फ़ ख़ुद के
होने से कहाँ
पूर्ण हो
पाता है
तुम शब्द का
इस में
शामिल होना ही
इसको
सार्थक हम बना
पाता है....
सुन्दरम...सुन्दरम...

प्रवीण पाण्डेय said...

एक अकेला, सब ताके हैं,
जगती रातें, सब जागे हैं।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 04-10 -2012 को यहाँ भी है

.... आज की नयी पुरानी हलचल में ....बड़ापन कोठियों में , बड़प्पन सड़कों पर । .

ashish said...

अहम् को खाद पानी मिलता रहता है और हम उसका तुष्टिकरण करते रहते है .. अहम् ब्रम्हास्मि भी तो "मै " का प्रतीक है . भावनाएं उबाल पर है .

Sriprakash Dimri said...

किंतु मैं
सिर्फ़ ख़ुद के
होने से कहाँ
पूर्ण हो
पाता है
तुम शब्द का
इस में
शामिल होना ही
इसको
सार्थक हम बना
पाता है....
गहन अभिव्यक्ति ..निश्चित ही दंभ और अहंकार हमें बहुत अकेला बना देता है ....

प्रतिभा सक्सेना said...

'मै'-के लिये तुम भी तो चाहिये ,अकेला रहेगा कहाँ !

उपासना सियाग said...

बहुत सुन्दर कविता

Mamta Bajpai said...

बहुत सुन्दर रचना आभार