Tuesday, October 02, 2012

अकेला और बेबस


अपने मैं होने का
दंभ क्यों
कैसे
जहन पर
छा जाता है

सोते जागते
हँसते गाते
हर वक़्त बस
मैं ,मैं
का राग
यह दिल
अलापता है

किंतु मैं
सिर्फ़ ख़ुद के
होने से कहाँ
पूर्ण हो
पाता है
तुम शब्द का
इस में
शामिल होना ही
इसको
सार्थक  हम बना
पाता है....

जैसे रात का
अस्तित्व भी
चाँद,तारों
जुगनू से
जगमगाता है

पर शायद
 चाँद भी
समझता है
ख़ुद को अहम
अपनी ही धुन में
खोया सा
घुलते घुलते
बस सिर्फ़ एक
लकीर सा
रह जाता है

और ........
तब चाँद
कितना अकेला
और बेबस सा
हो जाता है !!



Post a Comment