Friday, August 03, 2012

शब्दों के अरण्य में


शब्दों के अरण्य में (कविता-संग्रह)
संपादन- रश्मि प्रभा
60 कवियों की श्रेष्ठ रचनाएँ
मूल्य- रु 200
प्रकाशक- हिंद युग्म,
1, जिया सराय,
हौज़ खास, नई दिल्ली-110016
(मोबाइल: 9873734046)
फ्लिकार्ट पर खरीदने का लिंक


शब्दों के अरण्य में ...शब्दों के जंगल में ...हर रंग  में बंधे हुए शब्द ,रश्मि प्रभा जी का संपादन हिंद युग्म का प्रकाशन जब मैंने पढा तो अनायास यह सवाल दिल में आया कि कौन कहता है कि ....हिंदी कविता का वजूद अब कहीं गुम हो रहा है ..?जब तक इतने लिखने वाले हैं तो हिंदी कविता का पढना कहाँ खो सकता है ? हिंदी कविता ने एक  लंबी यात्रा तय की है.. आदिकवि से आज तक |बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक आते आते दुनिया ने अपना चोला तेज़ी से बदला है और नेट की दुनिया में "ब्लॉग क्रांति" ने इस विधा को और भी मुखर कर दिया है ..वह भावनाएं ,वह कलम वह जज्बात जो कहीं  डायरी के पन्नो में या रसोई घर के चूल्हे की  आंच में खो रहे थे उन्हें एक नया रास्ता दिया ..अपने दबे हुए शब्दों को मुखर होने का..और रश्मि प्रभा ,हिंद युग्म के प्रकाशक शैलेश भारतवासी (जिन्होंने हिंदी को घर घर पहुंचाने का एक सपना देखा है )जैसे लोगों ने एक उत्साह भर दिया है कविता में अपनी भावनाओं को कहने का और सब तक पहुँचाने का और यह सिलसिला अब थम नहीं सकता .जैसा कि रश्मि प्रभा जी ने शब्दों के अरण्य की  भूमिका में कहा है कि यह अरण्य हम सब का है ..आगे बढ़ने का प्रयास जारी है |
            अरण्य ,जंगल लफ्ज़ ध्यान में आते ही
कई तरह के वृक्षो ,पौधो ,और अलग अलग फूलों की खुशबु का एहसास होने लगता है ..दिल खोने सा  लगता है उस के उस वातावरण में और जानने  की जिजीविषा और भी बढ़ जाती है ..अब आगे क्या ....?ठीक उसी तरह से जब आपके हाथ में यह शब्दों का अरण्य आयेगा तो पढने वाला भी इसी एहसास से रूबरू होगा ...|
               कविता साहित्य की आत्मा कही जा सकती है ..अपने मन के भावों को सही तरह से कहने का एक सशक्त  माध्यम ..हर किसी का दृष्टिकोण इस में अलग अलग हो सकता है जो पढने वाले को अलग अलग मायने दे जीवन की तरह .जैसा अंजू अनन्या ने अपनी कविता दृष्टिकोण में कहा और कविता विधा भी साहित्य में उस सच की आत्मा की तरह है ..जो कभी मर नहीं सकती खत्म नहीं हो सकती ..इसी सच और झूठ के अंतर को अपनी कविता में अनुलता ने बखूबी  ब्यान किया है ..जब भावनाएं मुखरित हुई तो कहाँ वह थम पाती है और वह कह उठती है अवन्ती सिंह के लफ़्ज़ों में कि अब मैं कविताओं के प्रकार बदलने लगी हूँ इनका संसार बदलने लगी हूँ ... ..........बदलिए बदलिए बस उन्हें दिल में दबा कर नहीं रखना है .पर कविता हमेशा गंभीर हो यह कैसे हो सकता है ..अश्वनी कुमार से कविता मिल कर कहते  है कि आ ही गए अब तो बातें कर लो दो चार ....पर  मुस्कराना मत छोड़ना ...और यही मुस्कान फिर उडान भरने लगती है डॉ विजय कुमार के लफ़्ज़ों में ...उनकी कविता में मेरी उडान के माध्यम से ..इन्ही लफ़्ज़ों की उडान में हम मुखातिब होते हैं डॉ जयप्रकाश तिवारी की कविता से जहाँ उनका सवाल है कि इंसान ने बादलों को बनाया या बादल ने इंसान को ?सवाल अहम् है यह |         और अभी इसी में मन उलझा है कि निखिल आनंद गिरी को जो सजा मिली है माँ से बहुत दिनों बाद लौटने की वह बरबस दिल को छू लेती है उनके लफ्ज़ काश ! कागज के इस पुल पर /हम तुम मिलते रोज़ शाम को .बिना हिचक .बिना बंदिश के साथी ..और वह नज्म अधूरी ही थी जो अन्य समान के साथ  माँ के हाथो अनजाने में बिक गयी  ..दिल अभी  उसी सजा से उदास ही है   कि प्रत्यक्षा के लिखे शब्द अपने अन्दर के जंगल में वहां खड़ा कर देते हैं जो हमारे अन्दर ही अन्दर पनप रहा है कंटीली झाड़ियों की बाड़ में जहाँ बाहर की  धूप भी अन्दर आने से बहिष्कृत हो चुकी है ..पर मन की उडान ,भावनाओं की उडान को कहाँ कोई रोक पाया है ..वह तो बाबुषा कोहली की रचना के जूते   फाह्यान की आत्मा के पैरों  में कहीं अटके  है जिसका चलना ही धर्म था  ..इसी गहरे दर्शन में बंधा मन अजीब तरह से छटपटा उठता है और तलाश करता है खुद को मुकेश कुमार सिन्हा की कविता हाथो की  लकीरों के दर्शन में  जहाँ वह कह रहे हैं कि जहाँ चाह है वहीँ राह है और कोशिश करने से मेहनत करने से इंसान तकदीर से ऊपर उठ सकता है |ईश्वर को हर बात का दोषी बनाना ठीक नहीं है क्यों कि रब भी उलझता है करवटें बदलता है आपकी हर पीड़ा में हर मानसिक द्वन्द में ...........रश्मि प्रभा की यह रचना तथास्तु और सब ख़त्म में यह बात बखूबी समझाती है |
       हिंदी कविता के ब्लॉग युग में महिलायें अपनी पुरजोर भावनाओं के साथ अपनी कलम चलाती नजर आई है |यही बात इस शब्दों के अरण्य में भी देखने को मिली ....महिलाओं के लेखन में उनसे जुडी बातें उनकी ज़िन्दगी का रूबरू होना इस  जगंल में बखूबी  दिखाई दिया है |   गार्गी चौरसिया उस रिश्तों को अनमोल बता रही है जो सच्ची मुस्कराहट से आत्मा से जुड़े हो .और डॉ जेन्नी शबनम अपने लफ़्ज़ों से ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत श्राप दे रही है यह कहते हुए कि जा तुझे इश्क हो ...ताकि उस दर्द को महसूस करो तुम ...वहीँ निधि टंडन व्यस्त हैं प्यार में क्यों कि प्यार हमेशा व्यस्त रहने का नाम है |पल्लवी त्रिवेदी के लफ़्ज़ों में बचपन हमेशा हर इंसान में जीवित रहता है और यह रहना भी चाहिए क्यों कि यही बचपन यदि खो गया तो इंसान अपनी मासूमियत खो देगा .|
       महिलाओं की कलम बखूबी समाजिक विषयों पर भी बखूबी चली है ..ऋतू शेखर मधु वृक्षों के संहार पर चिता व्यक्त करते हए कहती है कि अगली पीढ़ी जब जीवन के मूल आधार छीन लेने का जवाब मांगेगी तो क्या जवाब होगा तब ...?वहीँ वंदना गुप्ता औरत को सिर्फ नुमाइश का विषय बनाए जाने पर श्राप दे रही है |वाणी शर्मा औरत को मिले हुए वरदान से खुद को सम्पूर्ण   पा रही है जब उनकी गोद में नन्ही कली आ कर मुस्करायी तब जैसे ब्रहमांड उनकी गोद में समा गया | इन्हीं रचनाओं के बीच में शिखा वाष्णेय मीनाक्षी धन्वन्तरी ,रश्मि रविजा ,रमा द्विवेदी  और हरकीरत हीर की  रचनाये अपने विशिष्ट अंदाज़ से अपने होने का एहसास करवाती है |जहाँ हम उनके साथ उन्हें पढ़ते हुए "काली काफी में उतरती सांझ "और "रात के साए में कुछ पल "तलाशते हुए ,व्यक्तित्व को समझते समझाते हुए "शून्य की यात्रा" पर निकल पड़ते हैं और इस यात्रा को समाप्त करते हुए कहते हैं "मुक्त करते हैं तुम्हे हर रिश्ते से" ...यह अंदाज़ है ऊपर लिखी रचनाओं की  लेखिकाओं की उन विशेष भावनाओं का जिन से आप खद भी खुद जुड़ना चाहेंगे|
              माला के मोती की तरह इस शब्दों की माला में भी हर रचना अपने आप में मुक्कमल है |हर मोती को यहाँ इस समीक्षा में समेटना बहुत ही कठिन कार्य है पर यह तय है कि रश्मि प्रभा जी ने जो यह शब्दों के अरण्य में शब्दों को पिरोया है वह बहुत ही हरा भरा है जिस में हर रंग के फूल पत्ते समेटे हुए हैं |कहीं कहीं कोई कविता अधिक बोझिल हुई भी है तो अगले ही पल दूसरी कविता ने उसको संभाल लिया है |  शब्दों के जंगल में शब्दों का यह पहला पडाव हैं .और कहीं कहीं उलझा हुआ  भी दिखाई देता है  पर अपनी मंजिल की और आगे बढ़ने को प्रयत्नशील  है |इन्ही अरण्यों में रची गयी हैं कई गाथाएँ .पंचतंत्र .रामायण ,वेद आदि की और इस  शब्दों के जंगल में रची गयी हैं यह रचनाएँ जो हर भाव से आपको परिचित करवाएंगी |
            इस संग्रह में  आज की कवितायें हैं जो आज के समाज को दर्शाती है ..इन रचनाओं में  भोलापन और प्रकृति से निकटता देखने को मिलती है वहीं  बदले हुए इस समाज की आवाज़ भी सुनाई पड़ती है |जहाँ नयी पीढ़ी जैसे नित्यानंद ,अमित आनन्द पाण्डेय ,डॉ कौशलेन्द्र मिश्र ,आदि भी सजग है अपने समाज के प्रति पर्यावरण के प्रति|वहां ब्लॉग जगत के चर्चित नाम समीर लाल जी ,दिगम्बर नासवा ,लावण्या शाह ,संगीता स्वरूप ,साधना वेद आदि के साथ साथ बहुत से नाम और भी शामिल है ,जो अपनी कलम से उतरे जज्बातों और भावनाओं से अपनी बात कहते नजर आते हैं जिन्हें आप अवश्य -अवश्य पढना चाहेंगे| इस किताब में सबसे ख़ास बात जो लगी वह यह कि हर लेखक /लेखिका का परिचय बहुत सुन्दर ढंग से उनकी लिखी हर रचना के साथ दिया गया है जो उनके परिचय के साथ साथ रचना के अक्स को भी ब्यान कर देता है |साथ में ही नीचे सुन्दर ढंग से लिखे शब्द "शब्दों के अरण्य" में आपको वहीँ ठहरने का जैसा निमंत्रण देते नजर आते हैं |
       आवरण चित्र अपराजिता कल्याणी का है|अपने सुन्दर रंग रूप सज्जा से सुज्जित यह शब्दों का अरण्य --
साठ लेखक /लेखिकाओं का साथ आपको शब्दों के जंगल में खो देने पर मजबूर कर देगा, और अपने अगले सफ़र में आपसे खुद से इसका हमसफर बनने का वायदा भी ले लेगा ..और यदि मेरी की गयी इस समीक्षा से आप उत्सुक हो गए हैं शब्दों के इस अरणय में खोने के लिए तो इसको आप फ्लिप्कार्ट से ले सकते हैं |

इसको  समीक्षा को आप यहाँ भास्कर भूमि में  भी पढ़ सकते हैं .................

20 comments:

Mukesh Kumar Sinha said...

"शब्दों के अरण्य में" को संक्षिप्त रूप से शब्दों में जो सजाया है आपने..... मैं तो मुरीद हो गया आपका:)
हर एक लिए शब्द हैं आपके झोली में और फिर भी एक पेज में सिमटा दिया..... !!
SIMPLY SUPERB!!

expression said...

बहुत सुन्दर समीक्षा रंजना जी......
वाकई बहुत सुन्दर संकलन है...
आभारी हूँ रश्मि दी और शैलेश जी की,जो उन्होंने मुझे इस संकलन का हिस्सा बनाया.

अनु

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर और संक्षिप्त समीक्षा।

pallavi trivedi said...

सभी कविताओं का सार आपकी समीक्षा में उतर आया... बहुत अच्छी समीक्षा,

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर समीक्षा रंजना जी......बधाई..

सदा said...

आपकी कलम का साथ पाकर ''शब्‍दों के अरण्‍य में'उतरा हुआ हर रचनाकार स्‍वयं को सम्‍मानित महसूस कर रहा है ... आभार इस उत्‍कृष्‍ट समीक्षा के लिए

RamaDwivedi said...

Dr.Rama Dwivedi....

रंजू जी ,
`शब्दों के अरण्य में ' की संक्षिप्त समीक्षा किन्तु बहुत सधे हुए शब्दों में बहुत सार्थक समीक्षा लिखी है...बहुत -बहुत बधाई एव शुभकामनाए

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

शब्दों के अरण्य पुस्तक की गहन और सटीक समीक्षा .... इस अरण्य में खुद भी शामिल हूँ और हर दरख्त की महक समा लेना चाहती हूँ अपनी भावनाओं में ॥ आभार

रश्मि प्रभा... said...

शब्दों के अरण्य की समीक्षा में आपकी कलम अर्जुन के लक्ष्य भेद सी चली है ... इस अरण्य की सहयात्री हैं आप - जिसकी पहचान ने ब्लॉग जगत को एक पहचान दी है और आज निःसंदेह मेरे प्रयास में मुखरित हँस , खरगोश , हिरण , पलाश , कोयल , अमलतास , देवदार ....... सबकी पहचान को रेखांकित कर दिया ...

वन्दना said...

सारगर्भित समीक्षा

dheerendra said...

बेहतरीन सारगर्भित संक्षिप्त समीक्षा,,,बधाई

RECENT POST काव्यान्जलि ...: रक्षा का बंधन,,,,

Nityanand Gayen said...

बहुत सटीक विश्लेषण के बाद लिखी गई समीक्षा है . बहुत -बहुत आभार के साथ .

सादर

Dr.Nidhi Tandon said...

शैलेश जी .........रश्मि जी को हार्दिक आभार कि उन्होंने मुझे संकलन में सम्मिलित किया.
रंजना जी...आपकी समीक्षा अच्छी लगी.आपको बधाई!!

वाणी गीत said...

"शब्दों के अरण्य में "की बेहतरीन समीक्षा .
इस अरण्य की एक शाखा बनना और आपकी समीक्षा में स्थान पाना अभिभूत करता है !
आभार !

निर्मला कपिला said...

बेहतरीन समीक्षा। धन्यवाद।

दिगम्बर नासवा said...

आपने अलग ही अंदाज़ से समीस्कः की है ... बहुत ही रोचक और दिलचस्प अंदाज़ ... आभारी हूँ रश्मि जी का जिन्होंने मुझे इस संकलन का हिसा बनाया ...

शैलेश भारतवासी said...

रंजना जी,

आपने पुस्तक की वो खूबियाँ देख लीं, जो हमें नहीं दिखीं। आपने बहुत ही मोहक ढंग से पुस्तक की समीक्षा की है और इन श्रेष्ठ रचनाओं की श्रेष्ठता को रेखांकित किया है।

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

निखिल आनन्द गिरि said...

अभी तो कवि ने भी पूरी पुस्तक नहीं पढ़ी...और समीक्षा पढ़ने को मिल गई..बहुत-बहुत शुक्रिया, इस विस्तृत समीक्षा के लिए...

rashmi ravija said...

बहुत ही सुन्दर और सार्थक समीक्षा..
कितनी खूबसूरती से सबकी कविताओं का सार समेट लिया है..पोस्ट में.
आपका बहुत बहुत आभार

मीनाक्षी said...

आपकी समीक्षा पढ़ने के बाद महसूस होता है कि प्रकृति की खूबसूरती का आनन्द लेते हुए जंगल में खो जाने पर शायद डर लगे लेकिन 'शब्दों के अरण्य में'खो जाने को जाने को बार बार जी चाहेगा...प्रभावशाली समीक्षा है..