Tuesday, July 31, 2012

गुजरती ट्रेन


घर के
सामने से
गुजरती ट्रेन
कर देती है
नींद का क़त्ल
और क्षत-विक्षित
मन की उलझनों को,.....
जिन्हें सुलाया था
मुश्किलों से......
दर्द से कहराता
और फिर भटकता
रहता है
उनींदा से ख्वाब लिए
मेरा बंजारा मन
सुबह होने तक
फिर से एक नयी जंग के लिए...

मेरे घर के सामने से हर वक़्त ट्रेन जाती रहती है ..दिन में तो अधिक नोटिस नहीं लिया जाता आदत है ..पर रात को गुजरती ट्रेन अक्सर कई कवितायें लिखवा देती है :)

14 comments:

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढिया!!

सदा said...

वाह ... बेहतरीन

वन्दना अवस्थी दुबे said...

मेरे घर के सामने से भी ट्रेन गुज़रती है रंजना जी, स्टेशन भी इतने पास, की रात के सन्नाटे में सभी गाड़ियों के आगमन-प्रस्थान की सूचना घर बैठे ही मिल जाती है :) लेकिन इस स्थिति पर कोई कविता नहीं रच पाई...कवि जो नहीं हूँ... :) सुन्दर कविता है .

अल्पना वर्मा said...

बहुत खूब!
आप की कई कविताओं की प्रेरणा' ट्रेनों '' को बधाई!

Maheshwari kaneri said...

बहुत खूब बढिया!!

शिवनाथ कुमार said...

एक पीड़ा जिसने कई कविताएँ रच दी !!

प्रवीण पाण्डेय said...

रेलवे में बहुतों को बिना ट्रेन की आवाज सुने नींद ही नहीं आती है..

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

:) कविता अच्छी लगी

Arvind Mishra said...

न घर और न ही रेलवे ट्रैक विस्थापित हो सकता है -एक छुपा हुआ वरदान हम सभी के लिए कि ऐसी रचनाएं मिलती रहेगीं मगर आपकी नींद का क्या किया जाय ..??
कोई गाता मैं सो जाता वाली व्यवस्था करवाईये न ! या लोरी ??

राजेन्द्र अवस्थी said...

मन के भावों को प्रकट करने का बेहतरीन प्रेरणी श्रोत तलाश लिया आपने....अति सुंदर।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

:):) नींद में खलल डाल कर कुछ सृजन ही करवा देती है रेल :):)

अच्छी प्रस्तुति

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

humein to train mein bhee neend nahee aatee!!!

दिगम्बर नासवा said...

कई बार ओस कुछ होता है जो उघाड़ देता है धागों को और शब्द बहने लगते हैं ... गुज़रती ट्रेन भी यही करती है अक्सर ...

Sanju said...

Very nice post.....
Aabhar!
Mere blog pr padhare.