Wednesday, November 02, 2011

कई सदियों से ...

कई सदियों से ...
बंद पलकों में
ठिठके पड़े हैं कुछ आंसू के मोती
लरजते लबों पर ..
थरथरा रही है
कोई बात अनकही...
अपनी कांपती उँगलियों पर
महसूस कर रही हूँ
तेरे उँगलियों की गर्माहट
एक हलकी सी जुम्बिश
तेरे लबों की
जो आ  कर थमी  है
गर्दन के कोने पर  ..
लगता है आज ....
कई सदियों से एक हिम नदी
जिसमें जमे हुए थे
कुछ पुराने लम्हों  के अवशेष
वो तेरे इस कद्र करीब होने से
अपनी बात तुझ तक रिस कर
अपनी मंजिल पा ही जायेंगे
और सागर जैसे तेरे दिल  में
समां जायेंगे ...........

31 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कई सदियों से एक हिम नदी
जिसमें जमे हुए थे
कुछ पुराने लम्हों के अवशेष
वो तेरे इस कद्र करीब होने से
अपनी बात तुझ तक रिस कर
अपनी मंजिल पा ही जायेंगे

खूबसूरती से लिखे एहसास ..

सदा said...

कुछ पुराने लम्हों के अवशेष
वो तेरे इस कद्र करीब होने से
अपनी बात तुझ तक रिस कर
अपनी मंजिल पा ही जायेंगे
वाह ....बहुत खूब कहा है ।

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , आभार.


कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें.

Kailash C Sharma said...

कई सदियों से एक हिम नदी
जिसमें जमे हुए थे
कुछ पुराने लम्हों के अवशेष
वो तेरे इस कद्र करीब होने से
अपनी बात तुझ तक रिस कर
अपनी मंजिल पा ही जायेंगे
और सागर जैसे तेरे दिल में
समां जायेंगे ...........

....बहुत कोमल अहसास...बहुत सुंदर अभिव्यक्ति..

shikha varshney said...

एहसासों की खूबसूरत बयानगी..

प्रवीण पाण्डेय said...

बस सब कुछ होने सा है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 3 - 11 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज ...

Dr.Nidhi Tandon said...

बेहतरीन भावाभिव्यक्ति!!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बेहतरीन!

सादर

वाणी गीत said...

पुराने लम्हों के एहसासों की खूबसूरत बयानगी !

वन्दना said...

बर्फ़ को पिघलना होगा सागर मे समाने को।

Human said...

बहुत अच्छी कविता !

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

खुबसूरत एहसास....
सादर...

sushma 'आहुति' said...

बहुत खुबसूरत अभिवयक्ति.....

डॉ. मनोज मिश्र said...

बेहतरीन पोस्ट,आभार.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

again a beautiful composition...!!!

आशा जोगळेकर said...

बेहद सुंदर रंजू जी । भावों की पुरानी हिमनदी का स्पर्श की गरमाहट पाकर पिघलना और सागर में मिलना वाह ।

सुमन'मीत' said...

bahut sundar...

daanish said...

मन में छिपे जज़्बात की
बहुत शानदार तर्जुमानी
अच्छी और असरदार नज़्म ... !

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

रंजना जी मजा आ गया ..कोमल रचना प्यार के सुनहरे पल ...बधाई
भ्रमर ५

अपनी कांपती उँगलियों पर
महसूस कर रही हूँ
तेरे उँगलियों की गर्माहट
एक हलकी सी जुम्बिश
तेरे लबों की
जो आ कर थमी है
गर्दन के कोने पर ..

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

अनुपमा पाठक said...

कोमल अहसास!

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

bahut marmsparshi rachnaye .aapko hardik dhanyavaad,bahut sunder blog,badhiya likhti hai aap.
dr.bhoopendra
rewas
mp

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

bahut marmsparshi rachnaye .aapko hardik dhanyavaad,bahut sunder blog,badhiya likhti hai aap.
dr.bhoopendra
rewas
mp

दिगम्बर नासवा said...

किसी के प्यार की तपिश हिम खंड को पिघला सकती है ... भावनाओं को दिशा दे सकती है ... लाजवाब रचना ...

Prabodh Kumar Govil said...

aisa lagta hai ki safed sangmarmar ki koi moorti saamne khadi hai aur ve bhangimayen badal kar bataa rahi hai, jo aap kavita men kah rahin hain. achchha laga.

Santosh Kumar said...

बहुत खूबसूरत जज्बात.

आभार !

संजय कुमार चौरसिया said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति..

निर्झर'नीर said...

कई सदियों से एक हिम नदी
जिसमें जमे हुए थे
कुछ पुराने लम्हों के अवशेष

बहुत सुन्दर बहुत खुबसूरत एहसास....

Arvind Mishra said...

एक गहरा अहसास और उसके प्रति ईमानदार लगाव की कवितामय प्रस्तुति !

Rajput said...

पढते वक्त अपने इर्द गिर्द एक अजीब सा अहसास कराती कविता |
बहुत सुन्दर .