Sunday, June 26, 2011

इन्तजार



रिमझिम बरसी
बारिश की बूंदे
खिले चाहत के फूल
और नयी खिलती
कोपलों सी पातें
और न जाने
कितनी स्वप्निल शामें
मौसमों के
बदलते रुख में
अपने रंग बदल गयीं
और अब तो ……
उम्र के पडाव की
आखिरी गाँठ भी
धीरे धीरे
खुलने लगी है
पर …..
तुम्हारे आने का
इन्तजार अभी भी
न जाने क्यों
बाकी है …………….
इंतज़ार क्यूँ न हो …………….
सच तो यही है न
जीवन के हर पल में
बारिश की रिमझिम में ,
चहचहाते परिंदों के सुर में ,
सर्दी की गुनगुनी धूप में ,
हवाओं की मीठी गंध में
तुम ही तुम हो ….
दिल में बसी आकृति में
फूलों की सुगन्ध में ….
दीपक की टिम -टिम करती लौ में
मेरे इस फैले सपनो के आकाश में
बस तुम ही तुम हो …..
पर…..
नहीं दिखा पाती हूँ
तुम्हें वह रूप मैं तुम्हारा
जैसे संगम पर दिखती नहीं
सरस्वती की बहती धारा॥
सच तो यह है ….
ज़िंदगी की उलझनों में
मेरे दिल की हर तह में
बन के मंद बयार से
तुम यूं धीरे धीरे बहते हो
मिलते ही नजर से नजर
शब्दों के यह मौन स्वर
तुम ही तो हो जो ……
मेरी कविता में कहते हो !!
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