Wednesday, April 21, 2010

लफ्ज़ बिखरे हुए ...




१)सपने देखना
बंद पलकों में
क्यों कि उन में उड़ने के
कुछ पर होंगे
दुनिया देखना
तो आँख खोल के
यहाँ उन
सपनो के टूटे पर होंगे



२)रात के घने अंधेरे
कैसे सब फ़र्क
मिटा जाते हैं
अलग अलग वजूद
अलग राह के
मुसाफिर की परछाई को
एक कर जाते हैं
रोशन होते ही
हर उजाले में
यह छिटक कर
अलग हो जाते हैं



रंजना (रंजू ) भाटिया















23 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

सपने तो बंद आखों से ही देखे जाते हैं पर हकीकत........खुली आंखों से कठोर धरातल पर ।

मुसीबत में सब इन्सान बराबर हो जाते हैं पर उसके
टलते ही उनका अलग अलग वजूद उन्हें अलग कर देता है ।
सुंदर रचनायें ।

अल्पना वर्मा said...

ख्वाब में जीना जीने के पल दे जाता है..तो हकीकत वो पल छीन लेती है...आप के दोनों रचनाएँ येही भाव लिए लगीं..प्रभावी अभिव्यक्ति.

आभार.

अनामिका की सदाये...... said...

waah pahli kshanika bahut damdaar aur bahut gahri rahi. badhayi.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लगी आप की दोनो कवितये

M VERMA said...

यहाँ उन
सपनो के टूटे पर होंगे

आसपास नज़र उठाकर देखिये
वहाँ कुछ वहशी इंसानों का घर होगा

sangeeta swarup said...

दुनिया देखना
तो आँख खोल के
यहाँ उन
सपनो के टूटे पर होंगे

इन पंक्तियों पर आह और वाह साथ साथ ही मन से निकली .

रात के घने अँधेरे ....बहुत उम्दा सोच...

सुमन'मीत' said...

रात के मुसाफिर दिन में अजनबी बन जाते हैं
है ना

डॉ. मनोज मिश्र said...

दोनों रचनाएँ बेहद खूबसूरत.

अनिल कान्त : said...

aapki rachna padhnaek alag sa ehsaas de jata hai

वन्दना said...

dono hi rachnayein beshkimti..........alag alag bhav liye magar phir bhi ek doosre se judi huyi.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर रचना है जी!
राम-राम!

Udan Tashtari said...

दोनों ही रचनाएँ बहुत गहरे भाव लिए हुए..अच्छी लगीं.

अभिषेक ओझा said...

सपनों और दुनिया देखने का नजरिया पसंद आया...

ePandit said...

बहुत खूब, यह दुनिया भी तो एक स्वप्न ही है, एक लंबा (या छोटा) स्वप्न

Shekhar Kumawat said...

रोशन होते ही
हर उजाले में
यह छिटक कर
अलग हो जाते हैं


बहुत सुंदर


bahut khub


shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

महफूज़ अली said...

प्रभावशाली अभिव्यक्ति के साथ.... बहुत सुंदर रचनायें...

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... क्या बात कही है .. सपने देखना आँखें बंद कर के .. सपनों के पर होते हैं ... आपकी कल्पना बहुत डोर तक जाती है ... शब्दों का चयन बहुत ही कमाल का होता है ...

rashmi ravija said...

दुनिया देखना
तो आँख खोल के
यहाँ उन
सपनो के टूटे पर होंगे
बहुत ही मर्मस्पर्शी बात कह दी...और बिलकुल सच्ची...

अरुणेश मिश्र said...

अन्दर तक छू गयी ।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

दोनों रचनाएँ बहुत सुन्दर है ! हकीक़त बड़ी बेदर्द होती है ... और सपना और हकीक़त में बहुत अंतर होता है ।

kshama said...

Behad sashakt rachnayen hain dono..wah!

जितेन्द़ भगत said...

सुंदर मनोभाव।

Akanksha~आकांक्षा said...

वाह! बहुत खूब! लाजवाब! हर एक शब्द दिल को छू गयी! बेहद सुन्दर और भावपूर्ण रचना!