Monday, March 15, 2010

ज़िंदगी का सच


क्यों खिले गुल ,
इस चमन में
दे के सुगंध ..
फिर क्यों मुरझाए?
शमा जली तो रोशनी के लिए
पर परवाना क्यों
संग जल के मर जाए?

गुनगुन करते भंवरे,
क्यों सब पराग पी जाए?
क्यों फूल भी हँस के अपना
सब कुछ उस पर लुटाए ?

झूमती गाती हवा
क्यों एक दम शांत हो जाए
धीमे धीमे बहते दिन रात
वक़्त को कैसे मिटाए ?

झरनों में बह कर पर्वत की
सब कठोरता क्यों बह जाए
अपना सब कुछ दे के भी
प्रकति हर दम क्यों मुस्कराये ?

इन्ही तत्वों से बना मानव
सब कुछ लूटा के जीने का
यह भेद क्यों समझ न पाए
इस राज़ का राज़ है गहरा
जो जीए सही अर्थ में ज़िंदगी
वही इसको समझ पाए !!
Post a Comment