Saturday, February 20, 2010

लेडिज कूपे (पुस्तक समीक्षा )

पिछले बीते दिन कुछ स्वस्थ ठीक नहीं था ,पर दिल शुक्रिया करता है इस तरह बीमार पड़ने का भी ..इसका भी एक अलग ही सुख है जब डाक्टर बेड रेस्ट के लिए कह दे और आपके आस पास दवाई के रेपर के साथ बिस्तर पर कुछ किताबे बिखरी हुई हो और कोई आपको अधिक डिस्टरब नहीं करता :) बस खुद और किताबें और बस इन्ही में गुम ......इन्ही दिनों में अनीता नायर का लेडिज कूपे पढा ...दिल को छू लिया इस उपन्यास ने अखिला के सफ़र के साथ साथ हर भाव अपने दिल का भी साथ साथ बहता रहता है ,और अनीता के लिखे लफ़्ज़ों में गुम हो जाता है .....इसी उपन्यास के कुछ अंश आपको यहाँ अपने साथ ले जायेंगे और शायद आपको भी इसको पढने के लिए मजबूर कर दे ....

अखिलंदेश्वरी से मिलें, संक्षेप में अखिला, पैंतालीस साल की, अकेली, इंकम टैक्स क्लर्क, और एक औरत जिसे कभी अपनी ज़िंदगी जीने की इजाज़त नहीं मिली– हमेशा किसी की बेटी, बहन, मौसी, पालिता रही। फिर एक दिन वह समंदर किनारे बसे शहर कन्याकुमारी के लिए एक ओर का टिकट ले आती है, ज़िंदगी में पहली बार शानदार ढंग से अकेली रहती है और निश्चय करती है कि वह खुद को हर उस बंधन से आज़ाद कर लेगी जिससे रूढ़िवादी तमिल ब्राह्मण ज़िंदगी ने उसे बांध रखा है।

लेडीज़ कूपे में पांच अन्य महिलाओं के साथ अंतरंग वातावरण में, अखिला अपनी साथी यात्रियों को जानती है : जानकी, लाड़ली बीवी और परेशान मां; मारग्रेट शांति, कैमिस्ट्री टीचर जिसकी शादी तत्वों के काव्य और गैरजज़्बाती तानाशाह से होती है; प्रभादेवी, एक पूर्ण बेटी और पत्नी, जिनका जीवन स्विमिंग पूल की झलक देख कर बदल जाता है; चौदह साल की शीला जो वह देख सकती है जो दूसरे नहीं देख पाते; और मारीकोलंतु, जिसकी मासूमियत को हवस की एक रात नष्ट कर देती है।
जब अन्य महिलायें उस से उसके बारे में पूछती है तो अखिला कहती है वह शादी शुदा नहीं है और फिर सोचती है कि वह इन्हें खुले रूप से बता सकती है कि उसकी शादी क्यों नहीं हुई है .अपने राज ,ख्वाईशें ,और डर ,और बदले में जो चाहे वह इनसे पूछ सकती है ,क्यों कि वह दुबारा तो कभी मिलेंगी नहीं ..और वह उनसे पूछती है कि मैं अकेले रहना चाहती हूँ पर सब कहते हैं कि औरत अकेले नहीं रह सकती है |आप सब क्या कहती है ?
और फिर उस कूपे में जाने वाली हर स्त्री की अपनी ही एक कहानी है जिसको वह पूरे उपन्यास में अपने साथ साथ सफ़र में हमें भी लिए चलती है ....

दूसरी स्त्रियों की कहानी सुनते हुए अखिला उनकी ज़िंदगी के अंतरंग पहलुओं से जुड़ती है, उनके भीतर अपने सवाल का जवाब ढूंढ़ती है जो उसके साथ ज़िंदगी भर जुड़ा रहा है : क्या एक औरत अकेली और खुश रह सकती है, या औरत को पूर्ण महसूस करने के लिए पुरुष की ज़रूरत है ?

अखिला अकसर ये सपना देखती है कि वो भी उस लहर का हिस्सा है जो डिब्बों में भरती है, सीटों पर बैठती है, अपने सामान को संभालती, टिकट को हाथ में भींचे। अपनी दुनिया की ओर से पीठ फेर कर बैठी, आंखें भविष्य को देखतीं। सपना छोड़ देने का। दूर चले जाने का। बाहर निकल आने का। भाग जाने का।
पर सच तो ये है, अखिला ने इससे पहले कभी एक्सप्रेस ट्रेन का टिकट नहीं खरीदा था। पहले कभी वह किसी अनजान शहर को जाने वाली रात की रेलगाड़ी में नहीं बैठी थी।

अखिला इसी किस्म की औरत थी। वह वही करती, जिसकी उससे अपेक्षा की जाती थी : बाकी के सपने देखा करती थी। इसलिए वह आशाओं के कंचे जमा करती थी, जैसे बच्चे टिकट के टुकड़े जमा करते हैं। उसके लिए, आशा अपूर्ण इच्छाओं के जाल में गुथी थी।
नीला आकाश, सुनहरी चमक, बादलों का छंटना, अखिला को पता है ये सब गुलाबी छटाओं द्वारा रचे सम्मोहन मात्र हैं। उसने तो बहुत पहले ही अपने गुलाबी कांच के चश्मे को तोड़ कर किरच-किरच कर दिया था और मैटल के फ़्रेम का चश्मा बनवा लिया था जो घर के अंदर सादा और बाहर फ़ोटो-क्रोमेटिक हो जाता है। अखिला के चश्मे के भूरा पड़ते ही सूरज की चमक तक खो जाती है।

ये है अखिला। पैंतालीस साल की। बिना गुलाबी चश्मे की। बिना पति, बच्चों, घर और परिवार की। भागने और अपनी जगह तलाशने का सपना देखती। जीने और ज़िंदगी को अनुभव करने के लिए व्याकुल। जुड़ाव के लिए तरसती।
अखिला सपना देखती है : एक रेलगाड़ी धड़धड़ाती, धुकधुकाती स्टेशन पर आ खड़ी होती है। अखिला खिड़की के पास बैठी है। रेलगाड़ी के अलावा सब कुछ शांत है। उसके कंधे पर टंगा चांद साथ-साथ चल रहा है। वह रात की अनेक तस्वीरों के सामने से गुजरती है, सब की सब खिड़की में जड़ी हैं। किसी घर में रोशनी। आग को घेर कर बैठा एक परिवार। कुत्ता भौंकता हुआ। दूरदराज़ का कोई शहर। नदी का काला तेलिया पानी। जोखिम भरी पहाड़ी। घुमावदार सड़क। एक रेलवे क्रॉसिंग जिसकी स्ट्रीट लाइट की चमक शांत स्कूटर पर सवार एक आदमी के चश्मे पर पड़ रही है। हाथ साइड में झूल रहे हैं, पंजे ज़मीन पर हैं, गर्दन उचकाए, देखता हुआ, इंतजार करता कि रेलगाड़ी गुज़रे। स्टेशन पर, तस्वीरों की जगह भाव-भंगिमा ने ले ली है। पुनर्मिलन, विदाई, मुस्कुराहट, आंसू, गुस्सा, चिढ़, चिंता, ऊब, तटस्थता।

अखिला वहां होने का सपना देखती है। और वहां नहीं। उस पल की यादों को समेट लेने का।
अखिला आवेगी नहीं थी। पूरा समय लगा कर हर काम करती थी। रात भर उस पर सोचती, समझती, और जब हर कोण और नज़रिए से देख लेती, तभी किसी फ़ैसले पर पहुंचती।

यहां तक कि उसके साड़ियों के चुनाव में भी यह झलकता था। कलफ़ लगी सूती साड़ियां जिनके लिए पहले से ही बहुत योजनाबद्ध हो कर सोचना पड़ता है। महीन शिफ़ॉन, या धोओ और पहनो वाली सिंथेटिक साड़ियों की तरह नहीं। वे तो उन लोगों के लिए हैं जो कपड़े चुनने से पहले हर सुबह कम से कम छह बार मन बदलती हैं। वे लापरवाह और अस्थिर बुद्धि वाली महिलाएं होती हैं। कलफ़ लगी साड़ियां व्यवस्थित दिमाग की मांग करती हैं और अखिला को अपने व्यवस्थित होने पर फ़ख़्र था। पर जब उस सुबह वह सो कर उठी, पारदर्शी पंखों वाली काली नन्ही सी मक्खी ने उसे नींद से जगा दिया था, आवारा, बेचैन सी वह अखिला के मुंह पर मंडराती हुई भिनभिन किए जा रही थी जैसे खो गई हो। अखिला ने अपने भीतर एक अजीब सी चिढ़ महसूस की। उसे लगा इसकी वजह शायद पिछली रात देखा सपना होगा।
अखिला के अंदर किसी रेलगाड़ी में सवार हो जाने की हुड़क जग उठी। चले जाने की। कहीं भी जाने की। धरती के अंतिम छोर तक, शायद कन्याकुमारी।

कन्याकुमारी में तीन समंदर मिलते हैं। बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर। शांत पुरुष महासागर दो अशांत स्त्री समंदरों से घिरा। अखिला ने सुना था कि किस प्रकार कन्याकुमारी में, पर तब इसका नाम केप कोमोरिन था, विवेकानन्द ठाठें मारते जल में कूद पड़े थे और तैरते हुए एक चट्टान पर पहुंचे, जिस पर संकल्पपूर्ण ध्यान लगा कर उन्होंने उन प्रश्नों के उत्तर खोजे जो अब तक उन्हें छलते रहे थे। उसने यह भी पढ़ा था कि देवी कन्याकुमारी ने उसकी तरह ही त्यागपूर्ण जीवन जिया था। वहां के समुद्र तट की रेत कई रंगों की है, उस विवाह-भोज के अवशेष की तरह जो कभी परोसा और खाया नहीं जा पाया।

अखिला अपने पलंग पर लेटी खिड़की के बाहर देखती रही, उसने तय किया कि वह जाएगी। आज रात ही।
पद्मा को यह अच्छा नहीं लगेगा, अखिला जानती थी। इन दिनों जो भी वह कहती है या करती है, उसकी बहन को उस पर संदेह होता है। अखिला को लगा उसके चेहरे पर लकीर खिंच गई है। पद्मा इसे चिरकुमारी का मुंह कहती
है। अक्का का मुंह : संजीदा, दृढ़, कोई दखलंदाज़ी बर्दाश्त न करने वाला।

वह उठी और दीवार पर लटके कलैंडर को देखने गई। उसने तारीखों पर नज़र डाली। 19 दिसंबर 1997। जल्द ही साल खत्म हो जाएगा, अखिला ने सोचा, और फिर बेवजह ही कैलेंडर के किनारे पर खुंसी सुई को तलाशने लगी, उसकी आदत थी सुई वहां लगाने की। सफेद धागा पड़ी, ताकि किसी भी पल ज़रूरत पड़ने पर तुरंत मिल जाए-कोई हुक ढीला हो या तुरपाई उधड़ रही हो....। सुई नदारद थी। कोई लड़की ले गई होगी और वापस लगाना भूल गई। वे अकसर यही करती हैं, भले ही वह कितनी बार टोक चुकी हो कि सुई वापस लगा दिया करो। यह और वाशबेसिन के शीशे पर चिपकने वाली मैरून बिंदियों के घेरे, अपने चिपचिपे माथे से उतार कर अगले दिन लगाने के लिए वे लोग बिंदी शीशे पर चिपका देती हैं–इन दोनों बातों ने उसके निश्चय पर मोहर लगा दी। वह जाएगी। उसे जाना ही होगा, वरना वह पागल हो जाएगी, इस घर की चारदीवार में बंद, अपने से अपेक्षित जिंदगी को जीते हुए।

अखिला ने अपनी अलमारी खोली और एक काली और लाल मदुरै चुंग्डी साड़ी निकाली। यह थी तो कलफ़ लगी सूती साड़ी, पर इसके रंग और सुनहरी ज़री को देख पद्मा हैरान हो गई। बहुत समय हुआ अखिला ने चटख रंग पहनना छोड़ दिया था, उसने खुद को शलभ के से नीरस फीके रंगों में छुपा दिया था। पर आज सुबह तो अखिला तितली सी हो रही थी। जादुई रंगों और उमंगों से भरपूर। शलभ कहां है ? तुम्हारे पंख बंद क्यों नहीं हैं ? तुम यह क्यों नहीं दिखाने की कोशिश करतीं कि तुम्हारा और लकड़ी का रंग एक है ? तुम खुद को परदों के पीछे क्यों नहीं छुपा रहीं, पद्मा की आंखों में सवाल थे।
तब पद्मा जान ले कि आज का दिन बाकियों से अलग है, उसके चेहरे पर हैरत उभरते देख अखिला ने सोचा। यह न कहा जाए कि मैंने उसे चेताया नहीं था।

‘‘पर पहले तो कभी तुम्हें काम के सिलसिले में बाहर नहीं जाना पड़ा,’’ नाश्ता करते हुए जब अखिला ने अपने जाने के बारे में बताया, तो पद्मा ने कहा। अखिला ने पहले अपना नाश्ता–तीन इडली, एक छोटी कटोरी सांभर, और एक कप गर्मागर्म कॉफ़ी–खत्म किया, उसके बाद ही उसने अपनी यात्रा का ज़िक्र किया। यह तो तय था कि पद्मा आपत्ति करेगी : बावेला मचाएगी और तमाशा खड़ा करेगी, यह सब देख कर अखिला की भूख मर जाती। अखिला जानती थी और अच्छी तरह जानती थी कि संदेह से पद्मा आंखें सिकोड़ लेगी।

अखिला ने जवाब नहीं दिया, तो पद्मा ने फिर पूछा, ‘‘यह जाना कुछ अचानक नहीं है ?’’
एक पल के लिए, अखिला को होंठों तक झूठ फिसल आया : दफ़्तर का काम है। मुझे कल ही बताया गया।
पर क्यों ? उसने खुद से पूछा। मैं इसे जवाब क्यों दूं ? ‘‘हां, अचानक है,’’ उसने कहा।
‘‘कितने दिन के लिए जाओगी ?’’ अखिला को सामान पैक करते देखती पद्मा की आंखों में संदेह टिमटिमा रहा था। अखिला जानती थी पद्मा क्या सोच रही है। वह अकेले जा रही है या उसके साथ कोई है ? कोई पुरुष, शायद। पद्मा के नथुने फड़के जैसे कि वह किसी अवैध संबंध की बू सूंघ रही हो।
‘‘कुछ दिन के लिए, ‘‘उसने कहा। अस्पष्ट रहने में अलग ही सुख है, पद्मा का चेहरा देख कर अखिला ने तय किया।

दो दिन से अखिला कन्याकुमारी के एक होटल में रह रही है |यह होटल समुन्द्र के किनारे हैं जहाँ से वह रोज़ टहलने जाती है और लोगों की अजीब नजरों का सामना करती है ..वह महसूस करती है कि पैंतालिस साल की अविवाहित स्त्री की अपनी ही एक छवि होती है .ठंडापन ,चेहरे पर कठोरता ,और ऐसी आत्मलीनता जो सनकी पन के नजदीक होती है और हर साफ़ चीज में भी कोई न कोई नुक्स देखती है ..अखिला को महसूस होता है कि उसको अकेले रहना अच्छा लग रहा है,अब उसको शक नहीं कि अकेले रहने पर ज़िन्दगी कैसी होगी,वैसी तो नहीं होगी जैसी वह उसके सपने देखती है ,पर कम से कम वह इसको जानने की और समझने की कोशिश तो करेगी ...और जीत के दिखाएगी
बाकी कैसे वह जीत पाती है इसको आप इस उपन्यास को पढ़ कर जाने ...

लेडिज कूपे (अनीता नायर )
प्रकाशक पेंगुइन बुक्स
मूल्य १९० रूपये

:

33 comments:

Arvind Mishra said...

जबरदस्त समीक्षा-आशा है अब स्वस्थ होंगी -शुभकामनायें !

Mithilesh dubey said...

देखता हूं मै भी कैसा लगता है ।और आप कैसी हो , उम्मीद है कि बढ़िया होंगी..............

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

bahut he achha likha hai ranju ji...

aasha karta hoon aap abhi swasth hongi...

Pankaj Upadhyay said...

अब तो हमे भी पढनी है.. वैसे सही कहा आपने कभी कभी बीमार होना भी अच्छा लगता है..उस वक्त आप सारे लम्हो को धीरे धीरे स्लो मोशन मे चलते देख सकते हो.. काफ़ी कुछ पढ सकते हो और उनमे डूब सकते हो.. जैसे आप डूब गयी अखिला के साथ..

मै भी आजकल ’नीला’ के साथ हू :) तसलीमा जी की ’फ़्रेन्च लवर’ पढ रहा हू...

आशा करत हू कि आप बहुत ही जल्दी एकदम ठीक हो जायेगी... ऐसी ही चरित्रो से हमे मिलवाते रहिये.. मुझे तो इन सबसे मिलना बहुत अच्छा लगता है.. :)

संगीता पुरी said...

संक्षेप में सारी जानकारी मिल जाने से पोस्‍ट रोचक लगा .. वैसे तो आजकल पुस्‍तकें पढ नहीं पाती .. अब स्‍वास्‍थ्‍य कैसा है आपका ??

राज भाटिय़ा said...

जल्दी जल्दी स्वस्थ हो जाये, शुभकामनाये

रश्मि प्रभा... said...

badhiyaa samiksha

वन्दना said...

achchi samiksha ki hai..........ant tak baandhe rakha ............padhne kiichcha hone lagi hai.........aap jaldi se swasthya labh karein ......shbhkamnayein.

अभिषेक ओझा said...

आभार इस समीक्षा के लिए, कभी बीमार पड़ा तो पढता हूँ :) आपके स्वस्थ होने की शुभकामनायें... बीमार होने का ये फायदा कभी कभी मैं सोचता हूँ. वैसे तो इतनी व्यस्तता होती है कि कई काम हो नहीं पाते. अभी गोवा गया था तीन दिन... किसी से अनबन हुई और तीन दिन तक वही सोचता रहा... परेशान. फिर अचानक ख़याल आया कि सारी व्यस्तता थम सी गयी है ! अजीब है न... पर व्यस्तता अच्छे कारणों से थामे तो ज्यादा अच्छा है.

सुशील कुमार छौक्कर said...

इतनी अच्छी समीक्षा के बाद लगता है किताब पढनी ही होगी।

अनिल कान्त : said...

पढ़नी पड़ेगी !

वन्दना अवस्थी दुबे said...

शानदार समीक्षा. ऐसी कि किताब पढने का दिल करे. ज़रूर पढूंगी इस उपन्यास को. आपका स्वास्थ्य अब बेहतर होगा, पूरी तरह ठीक हो जायें जल्दी ही. शुभकामनायें.

डॉ. मनोज मिश्र said...

अच्छी समीक्षा है,किताब पढ़नी पड़ेगी.

डॉ .अनुराग said...

लगता है किताब पढनी होगी।

कंचन सिंह चौहान said...

maine bhi kabhi beemari ka sadupayog yun hi kiya hai...

har pal ka apna alag mahatva hai

कंचन सिंह चौहान said...

maine bhi kabhi beemari ka sadupayog yun hi kiya hai...

har pal ka apna alag mahatva hai

sangeeta swarup said...

आपने समीक्षा इतनी सुन्दर लिखी है की इस उपन्यास को पढने का मन हो रहा है....जानकारी के लिए शुक्रिया

Priya said...

Get well soon...Acchi book se introduce karwaya aapne . thank you

rashmi ravija said...

आपने तो उत्सुकता इतनी जगा दी...पहले भी काफी नाम सुना है इस किताब का...अब बस खोज में हूँ...

अल्पना वर्मा said...

अच्छी समीक्षा है.
मौका मिलेगा तो ज़रूर पढ़ूँगी.
[आप जल्दी स्वस्थ हो जाएँ .शुभकामनाएँ.]

अनूप शुक्ल said...

आपकी समीक्षा पढ़कर किताब पढ़ने का मन कर आया। सुन्दर! आपके अच्छे स्वास्थ्य के लिये मंगलकामनायें।

उन्मुक्त said...

आशा है अब आप ठीक होंगी।

संजय भास्कर said...

bahut he achha likha hai ranju ji...

श्रद्धा जैन said...

ary bimaar nahi padha kariye
kitaab aise hi padh le ............

kitaab ki sameeksha ne kitaab padhne ki utsukta paida kar di hai
zarur padhungi

jaldi se swasth ho kar loute
apna khyaal rakhiyega

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बहुत शुक्रिया आप सब का ,अब तबियत पहले से बहुत बेहतर है .धन्यवाद

रंजन said...

अच्छी पुस्तक है.. शुक्रिया..

दिगम्बर नासवा said...

आपने बहुत ही कमाल की समीक्षा लिखी है इस किताब की .... अब इसे पढ़ना ही पढ़ेगा ....

मथुरा कलौनी said...

समीक्षा के लिये बधाई। किताब पढ़ने की उत्‍सुकता जगा दी आपने।

प्रकाश पाखी said...

बहुत अच्छा लगा पढ़कर...अब तो पूरी पुस्तक पढनी पड़ेगी..आभार!

रंजना said...

आपने तो जबरदस्त उत्सुकता जगा दी....अब तो पुसतक खरीद कर पढनी ही पड़ेगी...
बहुत बहुत आभार इस लाजवाब समीक्षा के लिए...

mayamrig said...

लेडिज कूपे.... यानी स्‍त्री की अपनी दुनिया..जहां बाकी दुनिया नजरों से ओझल हो जाती है...वह दुनिया जो दुनिया में रहते हुए सदैव धुंधली दिखाई देती है स्‍त्री के निजी संसार में प्रवेश करते ही चटख रंगांे से सजी नजर आती है...अनुभव के रंग। अनीता नायर की यह रचना वास्‍तव में अदभुत है। आपने इस पर विस्‍तार से लिखकर श्रेष्‍ठ कार्य किया, बधाई।

Rajendra said...

धन्यवाद ! नारी की निजता और स्वाभिमान के पन्ने पलट्ती पुस्तक की विषयवस्तु आपने अंतरजाल पर प्रस्तुत की .... ऐसी पुस्तक पढ़ने से आपको जल्दी स्वास्थय-लाभ होगा ...

मोहिन्दर कुमार said...

समीक्षा करना वो भी एक पुस्तक की अपने आप में एक चुनौती भरा कार्य है जिसे आपने कुशलता से निभाया है...

आपकी स्वास्थय कामना के साथ