Monday, December 28, 2009

कुछ बिखरे लफ्ज़ (क्षणिकाएँ...)


वक़्त.

क्यों तुम्हारे साथ बिताई
हर शाम मुझे
आखिरी-सी लगती है
जैसे वक़्त काँच के घर
को पत्थर दिखाता है !!

हरसिंगार


लरजते अमलतास ने
खिलते हरसिंगार से
ना जाने क्या कह दिया
बिखर गया है ज़मीन पर
उसका एक-एक फूल
जैसे किसी गोरी का
मुखड़ा सफ़ेद हो के
गुलाबी-सा हो गया !!

तस्वीर


तेरी आँखो में
चमकते हुए
अपने ही चेहरे के अक़्स॥

नदी का पानी

एक बहता हुआ सन्नाटा
धीरे धीरे तेरी यादो का

समझौता


तू सही
मैं ग़लत ,
मैं सही
तू ग़लत ,
कब तक लड़े
यूँ ज़िंदगी से
चलो यूं ही
बेवजह जीने का
एक समझौता कर लेते हैं !!

रंजना (रंजू ) भाटिया
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