Monday, May 25, 2009

मौसम ..कुछ यूँ ही ..

मौसम आज कल कई रंग एक साथ दिखा रहा है ...कभी जलती गर्मी और कभी रिमझिम फुहार ..इसी रंग को इन्हीं छोटी क्षणिकाओं के रूप में कहने की एक कोशिश की है ..

१)
गुलमोहर के फूल
जैसे हाथ पर कोई
अंगार है जलता ...

२)
जेठिया आग से
झुलसे है बहार
अमलतास से मिटे
कुछ गर्मी की आस

३)
झूमे पत्ते
डाली डाली
झूम के बरसा मेघ
सावन की ऋतु आ ली

४)
कैसे मदमस्त
हो के छेड़े मल्हार
पत्तियों पर बुंदिया की
पड़े है जब मार.....

५ )
उमड़ी घटा
दीवाने बदरा
शोर मचाये
नाचा मन मोर भी
पर तुम न आये ..
बिखरी जुल्फों को
अब कौन सुलझाए ...

33 comments:

रंजना said...

वाह ! वाह ! वाह ! लाजवाब चित्रण.....इन संक्षिप्त क्षणिकाओं में में आपने पूरे मौसम को ही उतार दिया. वाह !! बहुत बहुत सुन्दर !!

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप ने तो बदलते मौसम और आने वाली राहतों का अहसास करा दिया।

neeraj1950 said...

लाजवाब क्षणिकाएं रंजना जी वाह....शब्द चित्र अद्भुत बनाये हैं आपने...तारीफ के लिए उचित शब्द ही नहीं मिल रहे...
नीरज

Alpana Verma said...

'कैसे मदमस्त
हो के छेड़े मल्हार
पत्तियों पर बुंदिया की
पड़े है जब मार.....'

वाह !बहुत अच्छी लगी ये पंक्तियाँ.
मौसम को खूब कैद किया है इन सभी छोटी कविताओं में.

सभी कवितायेँ पसंद आयीं.

[रंजना जी ,यहाँ तो सिर्फ गुलमोहर खिले हैं..दहकते जलते अंगारे से! :)बरखा रानी तो कभी मेहरबान ही नहीं होती...]

MANVINDER BHIMBER said...

mousam ke bahane bahut achchi baat ho gayee

Abhishek Ojha said...

सुन्दर और सामयिक क्षणिकाएं है, हमें भी मल्हार छिड़ने का इंतज़ार है ! गुलमोहर वाली पहले भी पोस्ट की थी क्या आपने? अगर हाँ तो देखिये कितने गौर से मैं आपका ब्लॉग पढता हूँ :)

Vinay said...

वाक़ई बहुत ख़ूबसूरत!

Unknown said...

sabhi kshnikayen jeevan k komalkant aur samvedansheel pksh ko uurja dene wali toh hain hi,sahityik parakh par bhi paathak ko aatmik santushti pradaan karti hain ....aapko in maasoom rachnaaon k liye
hardik hardik badhaiyan

Arvind Mishra said...

अच्छे शब्द दृश्य !

ताऊ रामपुरिया said...

खूबसूरत चित्रों और उतकृष्ट शब्दावली मे इन क्षणिकाओं ने मौसम का बिल्कुल सटीक एहसास कराया. बेहद सफ़लतम रचना कहुंगा इसको.

विभिन्न मौसमों को एक साथ जीवंत करने के लिये बहुत शुभकामनाएं आपको.

रामराम.

संगीता पुरी said...

गजब ..

Udan Tashtari said...

ये है मौसम का हाल सखे!!

कविता निकलवा डाली मौसम ने.. :)


बेहतरीन रंगारंग प्रस्तुति!!

hem pandey said...

इतने सुन्दर शब्द चित्रों के लिए साधुवाद.

P.N. Subramanian said...

हमें तो कविता से ही राहत मिल रही है. काश इसे दुपहर को पढ़ा होता. लेकिन उस समय बिजली गोल थी. आभार

रंजन said...

बहुत सुन्दर..

रविकांत पाण्डेय said...

अच्छा लगा पढ़कर। जैसे दृश्य जीवंत हो उठा हो।

अनिल कान्त said...

मेरा मन तो मयूर की तरह नाचने लगा ...बहुत अच्छा लगा पढ़कर

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

गौतम राजऋषि said...

बेहतरीन क्षणिकायें मैम..खास कर नंबर ३ वाला सबसे ज्यादा भाया

राजकुमार ग्वालानी said...

बेहतरीन कविताये,बहुत सुन्दर...

दिगम्बर नासवा said...

वाह.लाजवाब..............
छोटी छोटी रचनाओं में........मौसम के इतने बड़े फैलाव को आसानी से उतार दिया आपने.......... हर मौसम शब्दों के माध्यम से अपनी अपनी छठा बिखेर रहा है

vandan gupta said...

चित्रों के साथ मोसम का चित्रांकन ......
बेहद लाजवाब .

डॉ .अनुराग said...

अमलतास का चित्र बेह्द खूबसूरत है .लगा जैसे बड़ा होना चाहिए ..मौसम का असर आप पर भी हो गया ..

सुशील छौक्कर said...

वाह वाह वाह। ऐसा आनंद आ गया जैसे उस बारिश में भीगने पर आया था जो पिछले हफ्ते आई थी। चित्र भी सुंदर।

डॉ. मनोज मिश्र said...

सब के सब बहुत ही बेहतरीन .

मुकेश कुमार तिवारी said...

रंजना जी,

मौसम में बदलाव को क्रमबद्ध या श्रृंखला के रूप में बहुत ही खूबी से उकेरा है।

बूंदो की सुखद अनुभूति से लगाकर बरसते सावन में विरह वेदना की तड़प..... लाजवाब।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Kavi Kulwant said...

bahut khoob.. sundar..

Science Bloggers Association said...

क्षणिकाएं मैंने लिखी भी पढी भी हैं, पर आपकी ये क्षणिकाएं बनावट और बुनावट में अलग होने के बावजूद अर्थ की लयात्मकता के कारण बेहद तमत्कृत करती हैं।
धर्म की व्याख्या के बहाने जीवन के गहरे सूत्र भी आपने उपलबध करा दिये।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अरे अच्छा हुआ कुश के जाल घर पे आपकी पोस्ट देख ली और खीँचे चले आये और इतनी सुँदर रच्नाएँ पढ लीँ वाह वाह ! आनँद आ गया जी
- लावण्या

alka mishra said...

प्रिय बहन ,जय हिंद
आपकी क्षणिकाएं अच्छी लगी ,पर दो जगह कुछ खटक रही हैं ,१ में अंगार है जलता की जगह जलता अंगारा होता तथा ५ में मन मोर भी की जगह मन मयूरा होता तो कितना सुन्दर लगता , खैर पसंद अपनी-अपनी
मैं आपको दिल से धन्यवाद देना चाहती हूँ ,मेरे ब्लॉग का अनुसरण करने के लिए एवं कमेन्ट देकर मेरी हिम्मत बढाने के लिए

Mohinder56 said...

चिंगारीयों (क्षणिकाओं) में दावानल भर दिया आपने.. बधाई

अभिषेक मिश्र said...

झूमे पत्ते
डाली डाली
झूम के बरसा मेघ
सावन की ऋतु आ ली

सभी क्षणिकायें पसँद आईं.

रश्मि प्रभा... said...

har kshanika mausam ki khoobsurat bangi , bahut sundar

प्रिया said...

sabse pahle to sorry for late posting of comment...achchi lagi ye rachna aapki