Tuesday, May 05, 2009

अधूरी ज़िन्दगी ....


ज़िंदगी को पूरी तरह से जीने की कला
भला किसे आती है ?
कहीं ना कहीं हर किसी की ज़िंदगी में ,
कोई न कोई तो कमी रह जाती है ....

प्यार का गीत गुनगुनाता है हर कोई,
दिल की आवाज़ो का तराना सुनता है हर कोई
आसमान पर बने इन रिश्तो को निभाता है हर कोई.
फिर भी हर चेहरे पर वो ख़ुशी क्यों नही नज़र आती है
पूरा प्यार पाने में कुछ तो कमी रह जाती है
हर ज़िन्दगी अधूरी सी नजर आती है .....

दिल से जब निकलती है कविता
पूरी ही नज़र आती है
पर कागजों पर बिछते ही..........
वह क्यों अधूरी सी हो जाती है
शब्दो के जाल में भावनाएँ उलझ सी जाती हैं
प्यार ,किस्से. कविता .कहानी ..
यह
सिर्फ़ दिल को ही तो बहलाती हैं
अपनी बात समझाने में कुछ तो कमी रह जाती है

हर किसी की निगाहें मुझे क्यों ......
किसी नयी चीज़ो को तलाशती नज़र आती हैं
सब कुछ पा कर भी एक प्यास सी क्यों रह जाती है
ज़िंदगी में कही ना कही कुछ तो कमी रह जाती है
संपूर्ण जीवन जीने की कला भला किसे आती है ???

रंजना ( रंजू ) भाटिया २६ . .००७
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