Tuesday, May 05, 2009

अधूरी ज़िन्दगी ....


ज़िंदगी को पूरी तरह से जीने की कला
भला किसे आती है ?
कहीं ना कहीं हर किसी की ज़िंदगी में ,
कोई न कोई तो कमी रह जाती है ....

प्यार का गीत गुनगुनाता है हर कोई,
दिल की आवाज़ो का तराना सुनता है हर कोई
आसमान पर बने इन रिश्तो को निभाता है हर कोई.
फिर भी हर चेहरे पर वो ख़ुशी क्यों नही नज़र आती है
पूरा प्यार पाने में कुछ तो कमी रह जाती है
हर ज़िन्दगी अधूरी सी नजर आती है .....

दिल से जब निकलती है कविता
पूरी ही नज़र आती है
पर कागजों पर बिछते ही..........
वह क्यों अधूरी सी हो जाती है
शब्दो के जाल में भावनाएँ उलझ सी जाती हैं
प्यार ,किस्से. कविता .कहानी ..
यह
सिर्फ़ दिल को ही तो बहलाती हैं
अपनी बात समझाने में कुछ तो कमी रह जाती है

हर किसी की निगाहें मुझे क्यों ......
किसी नयी चीज़ो को तलाशती नज़र आती हैं
सब कुछ पा कर भी एक प्यास सी क्यों रह जाती है
ज़िंदगी में कही ना कही कुछ तो कमी रह जाती है
संपूर्ण जीवन जीने की कला भला किसे आती है ???

रंजना ( रंजू ) भाटिया २६ . .००७

34 comments:

Alpana Verma said...

'दिल से जब निकलती है कविता
पूरी ही नज़र आती है
पर काग़ज़ो पर बिछते ही..........
वह क्यों अधूरी सी हो जाती है '

--यह भी एक सच है..

रंजना जी ,किसी शायर ने भी कहा है न..'कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता..कहीं ज़मीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता....'

प्रिया said...

सब कुछ पा कर भी एक प्यास सी क्यों रह जाती है
ज़िंदगी में कही ना कही कुछ तो कमी रह जाती है

" humko lagta hain ..... kamiyan jaroori hain... perfect kuch bhi nahi hota......aur hum usi perfection ko tarashtey hain umra bhar

" Ragistan ki Marichika hain Jeevan"

Ashok Pandey said...

दिल से जब निकलती है कविता
पूरी ही नज़र आती है
पर काग़ज़ो पर बिछते ही..........
वह क्यों अधूरी सी हो जाती है

बहुत खूब..बहुत सुंदर रचना।

Shikha Deepak said...

हर किसी की निगाहें मुझे क्यों ......
किसी नयी चीज़ो को तलाशती नज़र आती हैं
सब कुछ पा कर भी एक प्यास सी क्यों रह जाती है
............क्यों??.............शायद कोई नहीं जानता!!
........सुंदर रचना।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

हर किसी की जिन्दगी है बस अधूरी जिन्दगी।
बाँध लो बिस्तर यहाँ, से हो चुकी अब बन्दगी।।

इक अधूरी प्यास को सब साथ लेकर जायेंगे,
प्यार के बीते बरस अब लौट कर नही आयेंगे,

काम कुछ अच्छे करो, होगी नही शरमिन्दगी।
बाँध लो बिस्तर यहाँ, से हो चुकी अब बन्दगी।।

महुवा said...

संपूर्ण जीवन जीने की कला भला किसे आती है....शायद किसी को भी नहीं...कोई अगर अपनी पूरी ज़िंदगी जी ले....तो शायद उससे ज्यादा खुशनसीब तो कोई भी नहीं...
शायद सभी के साथ ....एक मुस्लसल तलाश यूंही जारी रहती है...उम्र भर...!!!

ताऊ रामपुरिया said...

ज़िंदगी को पूरी तरह से जीने की कला
भला किसे आती है ?
कहीं ना कहीं हर किसी की ज़िंदगी में ,
कोई न कोई तो कमी रह जाती है ....

बहुत सही कहा आपने. शुभकामनाएं.

रामराम.

रंजन said...

संपूर्ण जीवन जीने की कला भला किसे आती है ???

बहुत खुब..

Abhishek Ojha said...

'जिंदगी-जिंदगी क्या कमी रह गयी.
आँख की कोर में क्यों नमी रह गयी'
ये मुझे बहुत पसंद है... आपकी कविता पढ़ कर याद आगयी.

रश्मि प्रभा... said...

ज़िंदगी को पूरी तरह से जीने की कला
भला किसे आती है ?
कहीं ना कहीं हर किसी की ज़िंदगी में ,
कोई न कोई तो कमी रह जाती है ....
waah,sahi jazbaaton se rachit kavita

डॉ .अनुराग said...

ALPNA JI SE SAHMAT HUN....KAASH KISI KO JEENE KI KALA BHI AATI..

vandan gupta said...

zindagi hi nhi is jahan mein sabhi adhura hai .......samoornta to sirf ek mein hi hai.
bahut sahi kaha aapne..........kamiyan har kisi ki zindagi mein rah jati hain..........poori tarah jeene ki kala to sirf santon ,mahatmaon ko hi aati hai..........insaan to hamesha hi adhura raha hai.

हरकीरत ' हीर' said...

प्यार का गीत गुनगुनाता है हर कोई,
दिल की आवाज़ो का तराना सुनता है हर कोई
आसमान पर बने इन रिश्तो को निभाता है हर कोई.
फिर भी हर चेहरे पर वो ख़ुशी क्यों नही नज़र आती है

बहुत खूब.......!!

रंजना जी सबसे पहले एक सुन्दर और गहरी कविता के लिए आपको बहुत बहुत बधाई........!!
कुछ प्रश्न जो आपने उठाये.......

दिल से जब निकलती है कविता
पूरी ही नज़र आती है
पर काग़ज़ो पर बिछते ही..........
वह क्यों अधूरी सी हो जाती है

कविता कभी अधूरी नहीं होती ...वह अपने अन्दर उन तमाम सवालों -जवाबों को समेटे होती है जो एक कवि समाज से पूछना चाहता है ...जानना चाहता है,.....विरोध करना चाहता है ....तभी तो वह कविता लिखता है .......वह अपने आप में मुकम्बल होती है ....!!

संपूर्ण जीवन जीने की कला भला किसे आती है ???

संपूर्ण जीवन जीने के लिए शायद हमें साधारण मनुष्य से बहुत ऊपर उठाना पड़े ....जो हम नहीं कर पाते ......!!

दिनेशराय द्विवेदी said...

असीम है जीवन
और उस की संभावनाएँ
हम चाहते हैं पूरा
मिलता है बहुत कम
शायद असीम का
करोड़ करोड........करोडवाँ अंश
तो प्यास रहेगी शेष
हमेशा
वह कभी नहीं बुझेगी
प्यास चिरयौवना है, अमर है
प्रेम का असीम स्रोत है
मैं चाहता हूँ
बनी रहे
प्यास अनंत् तक
मेरे साथ

प्रवीण त्रिवेदी said...

सच्ची बात!!
कुछ न कुछ कमी तो रह ही जाती है ........... जीवन में??


प्राइमरी का मास्टरफतेहपुर

Science Bloggers Association said...

सही कहा आपने हम जिंदगी भर जिंदगी जीने की कला ही तो सीखते रहते हैं। इस जीवन से भरी हुई कविता के लिए बधाई।
----------
किस्म किस्म के आम
क्या लडकियां होती है लडको जैसी

सुशील छौक्कर said...

सोचता हूँ कि शायद जिदंग़ी को जीने की कला तो सबको आती है। पर रास्ते में हालात की कुछ रुकावटें आ जाती है और फिर आदमी की राह बदल जाती है। खैर आपकी रचना में जो लय बनी है वो सच में काबीले तारीफ है। पढते हुए लगा जैसे कोई गीत गुनगुना रहा हूँ। बहुत ही बेहतरीन।

सब कुछ पा कर भी एक प्यास सी क्यों रह जाती है
सच क्यूँ रह जाती है? कभी मौका मिले तो इस पर भी लिखना।

मुकेश कुमार तिवारी said...

रंजना जी,

मैं यह समझता हूँ कि जीवन जीने की जद्दोजहद में ही वह सब छिपा हुआ रहता है जिसकी कमी अक्सर लोग महसूस करते हैं।

बहुत अच्छी कविता के लिये बधाईयाँ, मेरी यह प्रार्थना आपके पास रहेगी कि डायरियओं के पन्ने खोल दीजिये और पाठकों को रस में डूबने दीजिये।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

अभिषेक मिश्र said...

दिल से जब निकलती है कविता
पूरी ही नज़र आती है
पर काग़ज़ो पर बिछते ही..........
वह क्यों अधूरी सी हो जाती है

ज़िंदगी में कही ना कही कुछ तो कमी रह जाती है
संपूर्ण जीवन जीने की कला भला किसे आती है ???

Haan, shayad aisa hi hota hai.

कंचन सिंह चौहान said...

दिल से जब निकलती है कविता
पूरी ही नज़र आती है
पर काग़ज़ो पर बिछते ही..........
वह क्यों अधूरी सी हो जाती है
शब्दो के जाल में भावनाएँ उलझ सी जाती हैं

ye to jaise mere man ki baat ho

" kitne geet likhe lekin koi sampurna nahi dikhta,
saare bhav samahit ho itana paripurna nahi dikhata"

अनिल कान्त said...

इस रचना के माध्यम से बहुत सही बात कही आपने ...सच ऐसा ही तो होता है

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Himanshu Pandey said...

द्विवेदी जी की टिप्पणी की संवेदना से अपने को जोड़ रहा हूँ पूर्णतः ।
रचना के लिये धन्यवाद ।

डॉ. मनोज मिश्र said...

सब कुछ पा कर भी एक प्यास सी क्यों रह जाती है
ज़िंदगी में कही ना कही कुछ तो कमी रह जाती है .........
बहुत सुंदर लाइनें .

Arvind Mishra said...

जी सच है !

दिगंबर नासवा said...

सच कहा........कोई भी पूरा मुक्कम्मल इंसान नहीं होता..........कुछ न कुछ कमी रह ही जाती है........और जब इंसान पूरा नहीं तो कविता कैसे पूरी हो सकती है..........गीत कैसे पूरा हो सकता है..........

Ashish Khandelwal said...

ज़िंदगी में कही ना कही कुछ तो कमी रह जाती है
संपूर्ण जीवन जीने की कला भला किसे आती है ???
आपकी यह पुरानी कविता कालजयी कही जाएगी.. हर वक्त हर युग में सर्वथा सच.. आभार

कनिष्क कश्यप said...

ज़िंदगी में कही ना कही कुछ तो कमी रह जाती है
संपूर्ण जीवन जीने की कला भला किसे आती है ???
There were many things left to be done..till i breathed last ...


धूमिल धूमिल यादों से पहचान बनाना बाकि था
फ़िर नए पहचान पे , कुछ उम्र बिताना बाकि था

रात की पलकों पे तेरा चमकना था बाकि
दिन के रूखे निशां पे, तस्वीर बनाना बाकि था

रौशनी रंगने की खातिर, एक चाँद बनाया था हमने
थोड़ा सा तुम जैसा हो , मुस्कान बनाना बाकि था

अ़ब तो दीवारों-दर भी अपने दोस्त हो गए
घर की तलाश में , कुछ मकान बनाना बाकि था

हम लम्हा दो जहाँ के, तेरे नाम कर चुके
एक वसीयत जां थी , उसे लिख जाना बाकि था

गौतम राजऋषि said...

’डायरी के पुराने पन्नों से" नीचे ये इबारत पढ़कार वापस जाता हूँ कविता पर फिर से पढ़ने और इन पंक्तियों पर जाकर अटक जाता हूँ "प्यार ,किस्से. कविता .कहानी ../यह सिर्फ़ दिल को ही तो बहलाती हैं / अपनी बात समझाने में कुछ तो कमी रह जाती है"....
हर कवि का सच

संगीता पुरी said...

हमेशा की तरह ही एक खूबसूरत रचना ..

Gaurav Misra said...

bahut sundar rachna ..jeevan ki sachchayi hai ye...

कडुवासच said...

... बहुत खूब, प्रसंशनीय अभिव्यक्ति।

Prem Farukhabadi said...

इक अधूरी प्यास को सब साथ लेकर जायेंगे,
प्यार के बीते बरस अब लौट कर नही आयेंगे

Mohinder56 said...

हमें आती है ना जीने की कला... हमसे सीखिये..

किस किस की बात कीजिये
किस किस को रोईये
अजी नींद बडी चीज है
मूंह ढक के सोईये

और अगर सोने (नींद) से परहेज हो तो

आरजू ले कर घर से निकलते क्यों हो
पांव जलते हैं तो आग पर चलते क्यों हो

और आरजू के बारे में भी कुछ कह दूं

यारव दुआये-वसल न हर्गिज कबूल हो
फ़िर दिल में क्या रहा जो हसरत निकल गई

अनुपम अग्रवाल said...

ज़िंदगी में कही ना कही कुछ तो कमी रह जाती है
दिल में याद और आँखों में नमी सब कह जाती है