Tuesday, July 29, 2008

आख़िर कब तक ?

एक वक्त वह भी था जब सारे भारत वासियों ने अपने सारे भेदभाव मिटा कर भूलकर एक जुट हो कर अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था |ऐसा करने के लिए उन्होंने अहिंसा मार्ग को अपनाया था और सारी दुनिया ने यह देखा था | हम लोगों ने तो सिर्फ़ सुना ही है कैसे उस समय आजादी के मतवाले थे |क्या स्त्री, क्या पुरूष और क्या बच्चे सब अपनी संस्कृति और मानवता को बचाने में लगे थे |हम सब को अपने नैतिक मूल्य और अपने बनाए आहिंसा के नियमों पर नाज़ था| उस वक्त सिर्फ़ एक ही दुश्मन था हमारा अंग्रेजी शासन |
और आज हमारी हालत क्या हो चुकी है ,? हम आज अपना संतुलन क्यूँ खो बैठे हैं ? धर्म ,जातीवाद को लेकर सब तरफ़ तांडव हो रहा है | इस वक्त में याद आते हैं मदर टेरेसा जैसे नाम जिन्होंने कभी हिंदू .मुस्लिम ,सिख इसाई में कोई भेद भाव नही किया | बाहर दूर देश में जन्मी यह सिस्टर ने लोगो के दुःख दर्द को इस तरह से अपनाया कि वह सबकी मदर बन गयीं | उनके जुड़ी के घटना पढ़ी थी वह इस प्रकार है..

एक रात को किसी ने दरवाजे पर दस्तक दे कर कहा कि पास में ही एक आठ बच्चों वाले हिंदू परिवार ने कुछ दिनों से बिल्कुल खाना नही खाया है |मदर ने यह सुना तो थाली में थोड़ा सा चावल ले कर उस घर कि तरफ़ चल पड़ी |जैसे ही उन्होंने घर जा कर वहां औरत को वह चावल दिए उसने उन चावलों को आधा कर के बाहर गयीं और कुछ देर बाद वापिस आ गई |मदर ने पूछा कि क्या हुआ ? कहाँ गई थी ? तो उस औरत ने जवाब दिया कि वह पड़ोस के घर में गई थी वहां भी मुस्लिम परिवार ने बहुत दिन से कुछ नही खाया है |मदर यह सुन कर स्तब्ध रह गई और कुछ क्षण तक कुछ न बोली | मदर का मनाना था कि उस स्त्री ने थाली में उस थोड़े से चावल को अपने पड़ोसी के साथ बाँट कर वास्तव में ईश्वर के असीम प्रेम को दूसरों के साथ बांटा | मदर का उस परिवार के लिए जो प्रेम का प्रगटीकरण था वह भी ईश्वर के प्रेम का प्रतीक था और उस औरत का भी प्रेम यही था | यह थी हमारी प्रेम भावना जो न जाने अब बम के धमाकों में कहाँ गुम हो कर रह गई है |

अगर हम ईश्वर से प्रेम करते हैं विश्वास करते हैं तो उस प्रेम को जरुर हम दूसरो के साथ बाँटेंगे और जब सभी लोग उस ईश्वर के प्रेम को सदा एक दूसरे के साथ बाँटेंगे तो एक प्रेम की कड़ी मानवीय और इश्वरिये प्रेम की कड़ी अपने आप जुड़ती चली जायेगी और फ़िर सब तरफ़ सिर्फ़ शान्ति होगी ..पर सवाल तो वहीँ है अडिग खड़ा हुआ कि कुछ लोगों के स्वार्थ कि खातिर आख़िर कितने निर्दोष लोग यूँ इन बम के धमाकों में मरेंगे और कितने लोग यूँ अपनी घिनोनी हरकत से देश को यूँ दहलाते रहेंगे ??


क्या हुआ है मेरे वतन को
न जाने किस आग में यह
हर पल सुलगता ही रहता है
जब भी लगता है कि ..
सब तरफ़ है अमन के बादल
वो बादल कोई चुरा लेता है
बढ़ते हुए क़दमों को
फ़िर से ...
कोई क्यों थाम लेता है

जी में आता है कि ...
फ़िर से वही एक जुट हो के
लड़ने की मशाल जला दूँ
अमन और शान्ति का पाठ
फ़िर से हर जहन में
चिपका दूँ ......
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