Monday, July 14, 2008

ऐसा कुछ भी तो नही था जो हुआ करता था ....

रोज़ जब अखबार पढने बैठो तो एक ख़बर जैसे अखबार का अब हिस्सा ही बन गई है , कभी १२ साल की लड़की का रेप कभी घर में ही लड़की सुरक्षित नही है |क्यूँ बढता जा रहा है यह सब ? क्या इंसानी भूख इतनी बढ़ गई ही कि वह अपनी सोच ही खो बैठा है ...और वही बात जब रोज़ रोज़ हमारी आँखों के सामने से गुजरे तो हम उसके जैसे आदि हो जाते हैं |फ़िर वही गंभीर बात हमें उतना प्रभावित नही करती है जितना पहली बार पढ़ कर हम पर असर होता है और हम उसको अनदेखा करना शुरू कर देते हैं|कुछ दिन पहले अनुराग जी की एक पोस्ट ने जहन को हिला के रख दिया .कैसे कर सकता है कोई ऐसे मासूम बच्ची के साथ |
क्यूँ आज अपने ही घर में लड़की सुरक्षित नही है ? यह प्रश्न कई बात दिलो दिमाग पर छा जाता है और फ़िर दूसरी ख़बरों की तरफ़ आँखे चली जाती है .|.अब यदि अरुशी हत्याकांड का जो सच बताया जा रहा है वह भी अपने ही घर में असुरक्षित मामले से ही जुडा हुआ है यदि वह सच है तो शर्मनाक है |यह सब सोच कर गुलजार की एक कविता याद आ जाती है ..

ऐसा कुछ भी तो नही था जो हुआ करता था फिल्मों में हमेशा
न तो बारिश थी ,न तूफानी हवा ,और न जंगल का समां ,
न कोई चाँद फ़लक पर कि जुनूं-खेज करे
न किसी चश्मे, न दरिया की उबलती हुई फानुसी सदाएं
कोई मौसीकी नही थी पसेमंजर में कि जज्बात हेजान मचा दे!
न वह भीगी हुई बारिश में ,कोई हुरनुमा लड़की थी

सिर्फ़ औरत थी वह, कमजोर थी
चार मर्दों ने ,कि वो मर्द थे बस ,
पसेदीवार उसे "रेप "किया !!!

14 comments:

Abhishek Ojha said...

थोडी देर पहले ही अनुराग जी की पोस्ट पढ़ी और अब आपकी... क्या कहें ! :(

सरस्वती प्रसाद said...

kuch kahne ko nahi......

रश्मि प्रभा... said...

ek vyathaa......

कंचन सिंह चौहान said...

kya kahe.n...:(

नीरज गोस्वामी said...

अनुराग जी की पोस्ट पढने से पहले ऐसी ही अपने मानव होने पर घृणा मुझे मंटो की कहानी "खोल दो" पढ़ कर हुए थी...इंसान और हैवान में कौन कहता है की फर्क है?
नीरज

शोभा said...

रंजू जी
आज ये घटनाएँ आम हो गई हैं। पढ़कर बहुत दिल दुखता है। बस इतना ही कर सकते हैं कि नारी सशक्त रहे और दूसरी नारी का साथ दे।

kavita malaiya said...

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...आजकल अख़बारपढने का मन ही नहीं होता..शायद दुनिया ऐसी ही है..कुछ सुंदर कुछ बदसूरत ..बहुत सारी बातें मन में आती हैं..लगता है की हमारे न्याय प्रनाडी में बहुत सुधर की आवश्यकता है...अजीब बात है देश एक और तरक्की कर रहा है दूसरी और पाशविक प्रवृत्तियां भी जहाँ की तहां है...और इनको सुधार पाना लम्बा प्रोग्राम हो सकता है भयभीत करके फिरभी कण्ट्रोल किया जा सकता साथ ही लड़कियों को ये शिक्षा दे पाना कि ये सिर्फ एक हादसा था जिसमे उनका कोई दोष नहीं ..और उस लड़की को घूर कर न देख्ने कि चेष्ठा.उस-से सामान्य व्यवहार ..ताकि वो इस आघात se जल्द se जल्द बाहेर निकल सके...और इन ख़बरों को सहानुभूति ke लिबास mei लपेट कर सनसनीखेज न बनाया जाए..

डॉ .अनुराग said...

vo ek adhura sach tha ranjna ji...sach ka ek hissa aor bhi hai jo maine aaj likha hai...

Udan Tashtari said...

सिर्फ़ औरत थी वह, कमजोर थी
चार मर्दों ने ,कि वो मर्द थे बस ,
पसेदीवार उसे "रेप "किया !!!


--Bus!! Kuch kahne ko nahi hai!

ललितमोहन त्रिवेदी said...

रंजू जी ! बकौल अमृता प्रीतम " लड़की तो आटे की लोई जैसी है घर में रखो तो बुस जाय , बाहर रखो तो चील कौए नोंच खाएं " ! कैसी विडंबना है ये ? मरती हुई संवेदना के लिए क्या हम जिम्मेदार नहीं हैं ?

राज भाटिय़ा said...

ना वो मर्द थे, ना वो इन्सान थे, बस राक्षस ही हे,ओर कुछ नही कहना

Pragya said...

sach mein aurat aaj bhi sirf aurat hai... ghinn aati hai aise samaj se.. un logon se...

कुश said...

पता नही कोई कैसे इतना नीचे गिर सकता है

Anonymous said...

ranjana ji..bahut acche vichar hain, kintu aapke blog ke side per jo kavita hai 'chalna chahte ho jo mere sangg'..mein dil ki bhaavnaayein chhipi hain..sundar hain..woh adhik sparshi lagi..