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Tuesday, April 15, 2008

विडंबना



दिख रहा है ......
जल्द ही दिल्ली का नक्शा बदल जायेगा
खेल कूद के लिए ख़ुद रहा है
दिल्ली की सड़कों का सीना
हर तरफ़ मिटटी खोदते
संवारते यह हाथ
जाने कहाँ खो जायंगे

सजाती दिल्ली को
यह प्रेत से साए
गुमनामी में गुम हो जायेंगे

घने ठंड के कुहरे में
दूर गावं से आए यह मजदूर
फटे पुराने कपडों से ढकते तन को
ख़ुद को दे सके चाहे एक छत
पर आने वाले वक्त को मेट्रो और सुंदर घरों का
एक तोहफा सजा संवार के दे जायेंगे !!

रंजना