Wednesday, October 28, 2020

एक क़तआ अमृता के नाम ( पुस्तक समीक्षा)

इस क़िताब में जहां क्यों है ,वहां ही मेरा दख्ल है , वरना मैं कहीं हूं ही नहीं ,यह कहानी अमृता की है ।"

  बिल्कुल सच है कि कुछ रूहें हमेशा साथ रहती हैं ,वरना अमृता प्रीतम को सौवीं जन्मशताब्दी पर डॉ उमा त्रिलोक जी द्वारा लिखित " एक क़तआ  ...पढ़ कर आंखे नम नहीं हो जाती और पढ़ कर दिल बेचैन न हो उठता । अमृता जैसी शख्सियत की मौजदूगी जिस्म से जान निकल जाने के बाद भी आबाद रहती हैं और मोहब्बत करने वालों को इसी क्यों में उलझाए रखती है। 

   अमृता,जिन्होंने कच्ची  उम्र 16 साल से ही अपने सपनों की इबारत लिखनी शुरू कर दी थी, जिंदगी के पन्ने  पर रोशनाई कभी जिगर का खून था तो कभी आँसू। अमृता ने जो भी लिखा पूरी तरह डूब कर लिखा था। पर वक़्त से इतना आगे लिखने वाली लेखिका इतनी अकेली क्यों महसूस करती रही , यही सवाल उमा जी की लिखी इस क़िताब का मर्म है ।
    इस क़िताब की शुरुआत में लिखी आस्कर वाईल्ड के शब्दों की पंक्तियाँ "उदासी को लिबास बना कर पहने रखा और जिस दहलीज़ के अंदर पांव रखा,वह घर वैराग्य का स्थान बन गया ।"अमृता ने ख़ुद कहा  हैं-"मेरा सोलहवां वर्ष आज भी मेरे हर वर्ष में शामिल है",शायद इसीलिए उनकी नज़्में और कहानियाँ प्रेम को इतनी पूर्णता से, सच्चाई से परिभाषित कर पाती हैं।

अमृता अपने समय से बहुत आगे की सोच रखने वाली लेखिका थीं। अपनी आत्मकथा में उन्होंने ख़ुद लिखा है कि "मेरी सारी रचनाएं, क्या कविता, क्या कहानी और क्या उपन्यास, मैं जानती हूं, एक नाजायज बच्चे की तरह हैं। जानती हूं, एक नाजायज बच्चे की किस्मत इसकी किस्मत है और इसे सारी उम्र अपने साहित्यिक समाज के माथे के बल भुगतने हैं।

अमृता के मुक्त व्यक्तित्व को उस वक्त का न समाज पचा पाया था न साहित्य जगत। लेकिन अमृता ने न कभी अपने आप को बदला न अपनी कलम को रोकने की कोशिश की। शायद इसलिए वो अमृता कहलाईं। माँ की मौत के बाद पिता को फिर वैराग्य अपनी ओर खींचने लगा मगर अमृता का मोह उन्हें संसार से जोड़े रखता।अमृता कभी-कभी रो पड़ती थीं कि वे पिता को स्वीकार थीं या नहीं...अपना अस्तित्व एक ही समय में उन्हें चाहा और अनचाहा लगता था।एक काल्पनिक प्रेमी "राजन" से शुरू हुई कहानी उनकी साहिर और आगे के सफर को तय करती रही । अमृता का मन एक पंछी की तरह था जो उड़ना चाहता था खुले आसमान में,एकदम स्वच्छंद,मगर एक तीखा दर्द लिए...ये दर्द उनकी कविताओं में खुल के नज़र आता है।

    उमा जी ने इन्हीं हालात को बखूबी लिखा है कि "अमृता एक टूटे हुए गीत की तरह हालात की आग में भस्म हो गयी फिर उसी भस्म से उभर कर अमर पक्षी फीनिक्स की तरह उगी,उड़ी और लम्बी दूरियां तय करती हुई वहां पहुंची जहां औरत की मर्ज़ी नहीं पूछी जाती,बस अनचाहे रिश्ते में उसको यूँ ही धकेल दिया जाता है। "
   कई बार यह प्रश्न दिल में आया कि साहिर न होते तो अमृता भी न होती और अमृता न होती तो साहिर पर इन दोनों के बीच जो इमरोज़ आज बन कर चलते रहे वह  उमा जी की लेखनी ने बखूबी इस में लिखा है साहिर से वो इश्क, वो दीवानगी जो एक साए से शुरू हुई, उनके साथ ताउम्र रही मगर सिर्फ एक साया बनकर। इमरोज़ कहते हैं कि इतने लम्बे सफ़र के दौरान साहिर नज़्म से बेहतरीन नज़्म तक पहुंचे,अमृता कविता से बेहतरीन कविता तक पहुँचीं,मगर ये जिंदगी तक नहीं पहुंचे।अमृता ने इसे ख़ामोशी के  हसीन रिश्ते का नाम दिया।
   उमा जी की लिखी इस क़िताब के एक पन्ने पर अमृता के जीवन के सफ़र में अपनी मानसिक हालात के अनुसार चार पड़ावों का जिक्र किया है ,पहला पड़ाव --- अचेतनता ,बाल बुद्धि जैसा , जिज्ञासापूर्ण दूसरा पड़ाव है --चेतनता ,जिसमे होता है रोष... एक दम प्रचण्ड,गलत मूल्यों से लड़ मरने वाला --- तीसरा पड़ाव है -दिलेरी--जो हारता नहीं, जो जीत की आशा बनाए रखता है और चौथा पड़ाव है -- अकेलापन ।यही अकेलेपन का उमा जी की किताब में प्रश्न चिन्ह है । हर इंसान की ज़िंदगी कभी भी मुक्कमल नहीं होती है , एक खालीपन जो कच्ची उम्र से मन पर छा जाए तो वो भरपूर जी लेने पर पर भी अकेला ही रखता है। फिर चाहे वह आसपास कितने ही लोगों से घिरा हुआ क्यों न हो । इस खामोशी को अकेलेपन को समझना वाकई आसान नहीं है।
   अपने वक़्त से आगे लिखने वाली अमृता की कलम जिन जिन विषय पर चली है उमा जी ने उनकी उन सभी खूबियों को इस क़िताब में फिर से याद दिलाया है ,जो अमृता प्रीतम को समझने वाले ,पढ़ने वाले के लिए एक उनकी सौवीं जयंती पर एक यादगार सहेज कर रखने लायक तोहफ़ा है। जैसे जैसे इस को पन्ना दर पन्ना पढ़ते जाएंगे अमृता के करीब खुद को और पाएंगे।
   यह क़िताब मुझे पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे अमृता प्रीतम के जीवन को नज़्म शैली में लिखा गया है ,जो उनके लिखे हुए हर उपन्यास ,कविता कहानी ,ख़त आदि के उन पलों के करीब ले आती है जो हम प्रत्यक्ष रूप में तो शायद इतना ध्यान नहीं रखते पर हमारे अवचेतन मन में उनकी लिखी वह हर सोच मौजूद रहती है ,फिर चाहे वह 36 चक हो ,गुलियाना हो ,साहिर हो ,सज्जाद हो या आज का वर्तमान इमरोज़ हो ।
   इतनी सुंदर क़िताब को लिखने के लिए उमा जी को बधाई ।

एक क़तआ अमृता के नाम
उमा त्रिलोक
सभ्या प्रकाशन
अभिनव इमरोज़
  

रंजू भाटिया



2 comments:

Onkar said...

बहुत बढ़िया

डॉ. जेन्नी शबनम said...

बहुत सुन्दर समीक्षा। अमृता जी की लेखनी तब लोगों के लिए नागावार रहा हो पर अब उनके लेखनी के दिवानों की कमी नहीं। अमृता को पढ़कर ही मैं बड़ी हुई। उनकी लेखनी उनका जीवन बहुत प्रभावित करता है मुझे। उमा जी को इस पुस्तक के लिए बधाई।