Monday, November 11, 2019

नारी का सबसे सुंदर रूप " माँ" ( भाग 1 )

नारी के सब रूप अनूठे हैं ,पर माँ का रूप सबसे अदभुत है कोई भी स्त्री माँ बन कर  अपनी संतान से कितना प्यार कर सकती है बदले में कुछ नही चाहती,यही  नारी का सबसे प्यारा रूप  होता है बस वो सब कुछ उन पर अपना लुटा देती है और कभी यह नही सोचती की बदले में उसका यह उपकार बच्चे उसको कैसे देंगे ! नारी का रूप माँ के रूप में सबसे महान है इसी रूप में वो स्नेह , वात्सलय , ममता मॆं सब उँचाइयों को छू लेती है | उसके सभी दुख अपने बच्चे की एक मुस्कान देख के दूर हो जाते हैं! 

तभी हमारे हिंदू संस्कार में माँ को देवता की तरह पूजा जाता है माँ को ही शिशु का पहला गुरु माना जाता है सभी आदर्श रूप एक नारी के रूप में ही पाए जाते हैं जैसे विद्या के रूप में सरस्वती ,धन के रूप में लक्ष्मी, पराक्रम में दुर्गा ,सुन्दरता में रति और पवित्रता में गंगा ..वो उषा की बेला है, सुबह की धूप है ,किरण सी उजली है इस की आत्मा में प्रेम बसता है| और जब माँ नहीं रहती तो सब कुछ सुनसान हो जाता है 

माँ लफ्ज़ ज़िंदगी का वो अनमोल लफ़ज़ है ... जिसके बिना ज़िंदगी, ज़िंदगी नही कही जा सकती ...अपनी माँ के जाने पर मुझे यह सूनापन आज तक महसूस होता है और मेरे पास अब सिर्फ शब्द है उनके दिए स्नेह को समझने के लिए



मेरा बचपन थक के सो गया माँ तेरी लोरियों के बग़ैर
एक जीवन अधूरा सा रह गया माँ तेरी बातो के बग़ैर

तेरी आँखो में मैने देखे थे अपने लिए  सपने कई
वो सपना कही टूट के बिखर गया माँ तेरे बग़ैर..... 

माँ जन्म देने वाली हो या पालने वाली ,दोनो ही दिल के करीब होती हैं। जन्म देने वाली से पालने वाली माँ की अहमियत भी कम नहीं समझ सकते । अपने पर्सनल अनुभव से मैं यही कह सकती हूँ। 


माँ हर पल तुम साथ हो मेरे, मुझ को यह एहसास है
आज तू बहुत दूर है मुझसे, पर दिल के बहुत पास है।

तुम्हारी यादों की वह अमूल्य धरोहर 
आज भी मेरे पास है,
ज़िंदगी की हर जग को जीतने के लिए,
अपने सर पर आज भी मुझे महसूस होता तेरा हाथ है।

कैसे भूल सकती हूँ माँ मैं आपके हाथों का स्नेह,
जिन्होने मुंह में मेरे डाला था पहला निवाला,
लेकर मेरा हाथ अपने हाथों में,
दुनिया की राहों में मेरा पहला क़दम था जो डाला
जाने अनजाने माफ़ किया था मेरी हर ग़लती को,
हर शरारत को हँस के भुलाया था,
दुनिया हो जाए चाहे कितनी पराई,
पर तुमने मुझे कभी पराया नही किया था,
दिल जब भी भटका जीवन के सेहरा में,
माँ की प्रीत ने एक नयी रहा जीवन को दिखाई।

ज़िंदगी जब भी उदास हो कर तन्हा हो आई,
माँ तेरे आँचल के घने छांव की बहुत याद आई।

आज नही हो तुम जिस्म से साथ मेरे,
पर अपनी बातो से , अपनी अमूल्य यादो से
तुम हर पल आज भी मेरे साथ हो..........
क्योंकि माँ कभी ख़त्म नही होती .........
तुम तो आज भी हर पल मेरे ही पास हो.........

शेष अगले भाग में ....

4 comments:

Kavita Rawat said...

माँ से बढ़कर कोई नहीं
बहुत सुंदर प्रस्तुति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (12-11-2019) को    "आज नहाओ मित्र"   (चर्चा अंक- 3517)  पर भी होगी। 
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
-- 
हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई।  
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रंजू भाटिया said...

शुक्रिया जी

रंजू भाटिया said...

धन्यवाद