Thursday, June 08, 2017

मैं से मैं तक की यात्रा

अमृता प्रीतम से एक साक्षात्कार में पढ़ा कि ----उनसे किसी ने  पूछा उनकी नज्म मेरा पता के बारे में .... जब उन्होंने मेरा पता जैसी कविता लिखी तो उनके मन की   अवस्था कितनी विशाल रही होगी ..
 आदम को या उसकी संभावना को खोज ले तो यही पूर्ण मैं को खोजने वाली संभावना हो जाती है ....यथा ब्रह्मांडे तथा पिंडे को समझने वाला मनुष्य कहाँ खो गया है ,सारा सम्बन्ध उस से से है ...

आज मैंने अपने घर का पता मिटाया है ..
और हर गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है ....

इस में हर यात्रा "मैं से शुरू होती है और मैं तक जाती है "..तंत्र के अनुसार यह यात्रा दोहरी होती है ,पहली अहम से अहंकार तक और दूसरी अहंकार से अहम तक ....आपके अहम की और जाने वाली अवस्था के रास्ते में   आज कोई सज्जाद नही ,कोई साहिर नही कोई इमरोज़ नही ...
अमृता प्रीतम से एक साक्षात्कार में पढ़ा कि ----उनसे किसी ने  पूछा उनकी नज्म मेरा पता के बारे में .... जब उन्होंने मेरा पता जैसी कविता लिखी तो उनके मन की   अवस्था कितनी विशाल रही होगी ..
 आदम को या उसकी संभावना को खोज ले तो यही पूर्ण मैं को खोजने वाली संभावना हो जाती है ....यथा ब्रह्मांडे तथा पिंडे को समझने वाला मनुष्य कहाँ खो गया है ,सारा सम्बन्ध उस से से है ...

आज मैंने अपने घर का पता मिटाया है ..
और हर गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है ....

इस में हर यात्रा मैं से शुरू होती है और मैं तक जाती है ..तंत्र के अनुसार यह यात्रा दोहरी होती है ,पहली अहम से अहंकार तक और दूसरी अहंकार से अहम तक ....आपके अहम की और जाने वाली अवस्था के रास्ते में   आज कोई सज्जाद नही ,कोई साहिर नही कोई इमरोज़ नही ...

अमृता ने कहा कि आपने मेरी नज्म मेरा पता नज्म की एक सतर पढ़ी है -----यह एक शाप है .एक वरदान है ..इस में मैं कहना चाहती हूँ कि  यह सज्जाद की दोस्ती है ,और साहिर इमरोज की मोहब्बत जिसने मेरे शाप को वरदान बना दिया आपके लफ्जों में  अ शिव का प्रतीक है और ह शक्ति का ..जिस में से शिव अपना प्रतिबिम्ब देख कर ख़ुद को पहचानते हैं और मैंने ख़ुद को साहिर और इमरोज़ के इश्क से पहचाना है .वह मेरे ह है मेरी शक्ति के प्रतीक ...

और यह पढ़ कर जाना की अमृता के इश्क उनके मन की अवस्था में लीन हो चुका है .और यही लीनता उनको ऊँचा और ऊँचा उठा देती है ...


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