Saturday, February 07, 2015

बिन तेरे

बिन तुम्हारे
मैं और मेरा जीवन रीता
हर युग से यह
प्रेम हमारा
जैसे पावन गीता
सतयुग में
तुम लक्ष्मी थी मेरी
द्वापर में राधा बन आई पास मेरे
त्रेता मैं बनी तुम मेरी सीता
पर एक बात पुछू में तुमसे
कलयुग क्यों बिन तेरे जाए बीता ?

3 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 8-2-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1883 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Onkar said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

Digamber Naswa said...

बहुत ही भावपूर्ण ... युग युग के साथी कलयुग में भी क्यों न मिलें ...
सुन्दर कल्पना ...