Saturday, December 20, 2014

इंतज़ार


लम्हे वही थे ज़िंदगी के हसीन
जो बिताए हमने तेरे इंतज़ार में
फिर वक़्त कैसे बदल गया
रही ख़बर ना फिर मेरी ज़िंदगी की बहार में
कैसा मिलन था यह हमारा तुम्हारा
तुम पास थे मेरे इतने और
उस वक़्त मैं.... मैं नही थी
एक खुदा के नूर की तरह
तुम मुझे में समा गये
मेरी आँखो की चमक में
मेरी सांसो की रफ़्तार में
मोहब्बत के इज़हार में
ज़िंदगी के एहसास में
मंदिर की किसी घंटी की तरह मन में
और हवा की ख़ुश्बू की तरह बस गये मुझी में

ईश्वर का स्वरूप खुद में ही है तलाश है खुद की खुद में। सफर" मैं से मैं की तलाश में यह रचना सच है न :)

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