Wednesday, September 24, 2014

वक़्त की रफ़्तार

यह सर्द रातो में
 सिमटी हुई सी कोई नाज़ुकी
दिल में जैसे कोई पिघल के शमा जले

कोई शोला सा भड़के जैसे बदन में
आज फिर से
कोई इश्क़ का जाम नज़रो में ढले


कर प्यार बढ़ते चाँद की रोशनी में
मुझे चुपके से
तेरी   बाहों  में  आज सहम् का घूँघट फिसले

महक रहा है आज यह   ठंडी हवाओ का धुआँ
मिले आज कुछ ऐसे की वक़्त की रफ़्तार कुछ रुक रुक के चले!!
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