Friday, March 15, 2013

कुछ दोस्तों की कलम से .....७


 लिखते रहे शब्द और वह दिलो में यूँ दस्तक देंगे यह मालूम नहीं था ...लिखते हुए तो बस दिल की बात लिख दी थी ..पर जब यह संग्रह में ढलेंगे और पढ़े जाने के बाद अपनी बात यूँ मुझ तक पहुंचाएंगे ..सच में सपने में भी नहीं सोचा था .....पर यह हुआ और हो रहा है ...बहुत से दोस्त जिन्हें सिर्फ ब्लॉग में पढ़ा ..उनसे जब मिलना हुआ तो बहुत से लोगों से मिलना वाकई सुखद अनुभव रहा ...सरस जी  उन में से एक वही शख्सियत रही .
 पहले भी जब जब उन्होंने मेरे लिखे पर कोई भी टिप्पणी करी तो मैं बहुत ख़ुशी महसूस करती थी ....और जब उनसे मिलना हुआ तो बहुत बहुत अच्छा लगा ..उनका मुझसे इतने प्यार ,इतने आत्मीय तरीके से मिलना वाकई बहुत दिल को छु गया ....और अब जब उन्होंने कुछ मेरी कलम से पढ़ कर अपने विचार व्यक्त किये तो आँखे गीली हो गयी ...आखिर इतने मिले स्नेह से भी आँखे भीग जाती है न ....सरस जी के के शब्दों में कुछ मेरी कलम से संग्रह की बात 


' कुछ मेरी कलम से '...एक अविस्मर्णीय अनुभव

एक एक कर रचनायें पढ़ती जा रही हूँ और डूबती उतराती जा रही हूँ ...
कहीं कुम्भलाये अहसासों की टीस-
कहीं उम्मीदों से अंकुआती खुशियाँ -
कहीं बेपनाह अकेलेपन का दर्द -
तो कहीं गदराई रात की रानी की खुशबू -
मानो हर औरत के अहसासों को साँस देदी !
एक एक रचना -
एक एक ज़ख्म सी खुलती जा रही है
ज़ख्म -जो अपनों से मिले
उन्हें सौगातों की शक्ल देकर ...मानो पोंछे हैं अपने ही आंसू.
यह हर उस औरत की टीस है -
जो सब कुछ निछावर कर ..बदले में चाहती है -
सिर्फ मोहब्बत !!!!

पल पल छूटते ज़िन्दगी के सिरे ...हर दर्द के साथ उभरते हैं ...
'कहा-सुना', 'शौक ', ' सजे हुए रिश्ते', 'खुदे हुए नाम', 'चाँद कुछ कहता है '......
यह महज़ कवितायेँ नहीं
शब्दों में भिंचा..गहरा अवसाद है,
बिछोह का ...इंतज़ार का ..मायूसियों का ..
एक रचना पढ़ी थी कभी ..
" कागा सब तन खइयो , चुन चुन खइयो मांस ,
दो नयना मत खइयो , मोहे पिया मिलन की आस "
वही दर्द इन रचनाओं को पढ़कर उभरा !
' ज़िन्दगी का रुख' 'अस्तित्व' , 'एक आस' ...
इनमें उपेक्षाओं की किरचें चुभतीं हैं ..
कोई रचना हौले से कन्धा थपथपाती है ...
तो कोई आँचल का कोना लगभग खींचती हुई सी-
अपने साथ चलने को कहती है ...और पाठक खिंचा चला जाता है ...
यही है इसकी मिलकियत!!!!

आपकी किताब के माध्यम से आपको जाना ...
कभी भावनाओं के सुन्दर स्वच्छ आकाश में -
एक स्वछन्द परिंदे सी उड़ान भरते हुए ..
और दूसरे ही क्षण -
लहूलुहान परों की चोट से
ज़मीन पर छटपटाते हुए
यह दर्द भेद जाता है इस कद्र
की छितरे और अस्तव्यस्त वजूद के साथ जीना बेमाने लगने लगता है ...
कभी थके हारे मनकी पीड़ा तो कभी उम्र की सीढियां चढ़ता थका शरीर
उस दर्द के जाने की बाट जोहता हुआ
जो एक अनचाहे मेहमान सा जम गया है जोड़ो में ...
लगा जैसे मेरे ही दर्द को, अहसासों को मेहसूसकर लिख दिया ....
और शायद हर पाठक के ..!!!
एक बात और -
आपकी किताब का यह गहरा नीला आवरण
उस भोर के आगमन का प्रतीक लगा ....जिसका इस किताब की हर रचना को इंतज़ार है ....
मेरे लिए 'कुछ मेरी कलम से' एक अविस्मर्णीय अनुभव रहा ...
शत शत नमन आपको रंजू जी..


और एक बार फिर से तहे दिल से आपका शुक्रिया सरस जी ..:)
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