Thursday, December 27, 2012

शहरो के इस जंगल में हर शख्स बेगाना है

आज यह कैसा
अजब सा फ़साना है
  उनके होंठो  पर
ख़ामोशी   का ज़माना है

शहरो के इस जंगल में
हर शख्स बेगाना है
मौसम अक्सर भटका है यहाँ
तूने भी भटक जाना है

मुझ में तो ताप है सूरज का
हर पल जलते जाना है
चाँद समझ कर तूने कभी
 दिखना कभी छिप जाना है

कब काम आया
पेडो का साया ही ख़ुद पेडो के
हर मुसाफ़िर ने यहाँ
 पल दो पल ठहर के चले जाना है

तेज़ हवा है यहाँ
वक़्त का बदलता हर साया
इस तेज़ बहती हवाओं में भी
एक उम्मीद का दीप जलाना है

हम तुम दोनो
 शब्द भी हैं और अर्थ भी
एक गीत में ढल कर
हमने इस ज़िंदगी को गुनगुनाना है!!

13 comments:

sandhya jain said...

इस तेज़ बहती हवाओं में भी
एक उम्मीद का दीप जलाना है......behad sunder :-)

shivendra sagar said...

तेज़ हवा है यहाँ
वक़्त का बदलता हर साया
इस तेज़ बहती हवाओं में भी
एक उम्मीद का दीप जलाना है

बाह! क्या बात हे,

विपरीत परिस्थतियो में भी खुद को सछम बनाये रखने के लिए प्रेरित करती पंक्तियाँ!!!!

shivendra sagar said...


तेज़ हवा है यहाँ
वक़्त का बदलता हर साया
इस तेज़ बहती हवाओं में भी
एक उम्मीद का दीप जलाना है

बाह! क्या बात हे,

विपरीत परिस्थतियो में भी खुद को सछम बनाये रखने के लिए प्रेरित करती पंक्तियाँ!!!!

shivendra sagar said...

तेज़ हवा है यहाँ
वक़्त का बदलता हर साया
इस तेज़ बहती हवाओं में भी
एक उम्मीद का दीप जलाना है

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत नज़्म ... बस ज़िंदगी को यूं ही गुनगुनाते रहिए ।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

एक गीत में ढल कर
हमने इस ज़िंदगी को गुनगुनाना है!!सुंदर प्रस्तुति,,,,

recent post : नववर्ष की बधाई

Kailash Sharma said...

हम तुम दोनो
शब्द भी हैं और अर्थ भी
एक गीत में ढल कर
हमने इस ज़िंदगी को गुनगुनाना है!!

...बहुत सुन्दर भावमयी रचना..

मैं और मेरा परिवेश said...

सुंदर बिंबों में छिपी करुण सच्चाई

rajeev bhutani said...

http://www.dil-punjab.com/entries/general/ranjna-bhatia
ranjna ji apki rachna.......

rajeev bhutani said...

http://www.dil-punjab.com/entries/general/ranjna-bhatia
ranjna ji apki rachna.......

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरे भाव व्यक्त करती कविता।

rashmi ravija said...

इस तेज़ बहती हवाओं में भी
एक उम्मीद का दीप जलाना है

बस यही ज़ज्बा कायम रहे
ख़ूबसूरत कविता

Gajendra Patidar said...

गिरा अरथ जल विची सम कहियत भिन्न न भिन्न