Sunday, October 21, 2012

"एक लड़की "

 
 
हर "स्त्री "में रहती है
"एक लड़की "
जो हर पल
जिंदा रहती है
"बाबुल" के घर में
हर पल चहकती यह "गुडिया "
पिया के घर में
अपने ही रचे संसार में
कहीं खो जाती है
पर जब वह अकेले में
करती है खुद से बातें
अपनी भूली हुई यादों से
यूं ही कुछ पढ़ते पढ़ते
मिलती है ...
कुछ लिखे हुए लफ्जों से
और तब वह जाग कर
वही "चंचल नदी "सी
बन जाती है...
हंसती है ,मुस्कराती है
अपनी की कही बातों पर
अपनी ही किसी
पुरानी यादों पर
हाँ सही है यह
हर स्त्री में होती है
एक "नन्ही बच्ची"
जो बीतते वक्त के साथ भी
कभी "बड़ी "नही हो पाती है !!..

रंजू .......डायरी के पन्नो से एक पन्ना
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