Saturday, September 15, 2012

प्रेम न हाट बिकाय.........



प्रेम न हाट बिकाय (उपन्यास ) 
 लेखक रविन्द्र प्रभात
मूल्य रूपये 
२७०
प्रकाशक- हिंद युग्म,
1, जिया सराय,
हौज़ खास, नई दिल्ली-110016
(मोबाइल: 9873734046)
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प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय।।

प्रेम के ढाई आखर हर किसी के दिल में एक मीठी सी गुदगुदी पैदा कर देते हैं। कभी ना कभी हर व्यक्ति इस रास्ते से हो कर  ज़रूर निकलता है पर कितना कठिन है यह रास्ता। कोई मंज़िल पा जाता है तो कोई उम्र भर इस को जगह-जगह तलाशता रहता है। किसी  एक व्यक्ति के संग बिताए कुछ पल जीवन को एक नया रास्ता दे जाते हैं तब जीवन मनमोहक रंगो से रंग जाता है और ऐसे पलों को जीने की इच्छा बार-बार होती है।
प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं।।

रवीन्द्र प्रभात , हिन्दी साहित्य में एक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने साहित्यक ब्लॉगस को बड़ी गंभीरता से लिया और ब्लॉग के मुख्य विश्लेषको के रुप में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया ।  रवीन्द्र जी द्वारा लिखित  उनका दूसरा उपन्यास “ प्रेम न हाट बिकाय” पढा अभी जो प्रेम संबंधो पर आधारित हैं । इससे पहले उनका उपन्यास “ ताकि बचा रहे लोकतन्त्र” भी चर्चित रहा ।वह भी मैंने पढा था ..वह दलित विमर्श पर आधारित था| यह प्रेम न हाट बिकाय विशुद्ध रूप से प्रेम पर आधारित है| प्रेम के विषय में जितना कहा जाए उतना ही कम है .यह इतना व्यापक क्षेत्र है कि कुछ भी कहना इस पर मुझे तो कम लगता है | एक बार इस पर लिखी थी कुछ पंक्तियाँ
प्रेम एकांत है
नाम नही
जब नाम बनता है
एकांत ख़त्म हो जाता है !! प्रेम  जब यह हो जाए तो कहाँ देखता है उम्र ,,कहाँ देखता है जगहा ,और कहाँ अपने आस पास की दुनिया को देख पाता है बस डूबो  देता है ख़ुद में और पंहुचा देता है उन ऊँचाइयों पर जहाँ कोई रूप धर लेता है मीरा का तो कही वो बदल जाता है रांझा में .....पर सच्चा प्रेम त्याग चाहता है ,बलिदान चाहता है उस में दर्द नही खुशी का भाव होना चाहिये| बस यही कहानी इस उपन्यास की है ...आपने नाम के अनुसार  यह उपन्यास प्रेम की धुरी पर स्थापित दो समांतर प्रेम वृतों की रचना करता है, जिसके एक वृत का केंद्र प्रशांत और स्वाती का प्रेम-प्रसंग है तो दूसरे वृत की धुरी है देव और नगीना का प्रेम । एक की परिधि सेठ बनवारी लाल और उनकी पत्नी भुलनी देवी है तो दूसरे की परिधि देव की माँ राधा । इन्हीं पात्रों के आसपास उपन्यास का कथानक अपना ताना वाना बुनता है । पूरी तरह से त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग पर आधारित है यह उपन्यास । रविंदर जी ने इस उपन्यास में प्रेम के स्वरूप को देह से निकाल कर अध्यात्म तक पहुँचाने का प्रयास इसी कहानी के माध्यम से किया है |
         मैंने जो इस उपन्यास में महसूस किया वह यही इसी  अध्यात्म प्रेम को महसूस किया और जाना कि हम सभी ईश्वर से प्रेम करते हैं और साथ ही यह भी चाहते हैं कि  ज्यादा से ज्यादा लोग उस ईश्वर से प्रेम करें पूजा करें वहाँ पर हम ईश्वर पर अपना अधिकार नही जताते !हम सब प्रेमी है और उसका प्यार चाहते हैं परन्तु जब यही प्रेम किसी इंसान के साथ हो जाता है तो बस उस पर अपना पूर्ण अधिकार चाहते हैं और फिर ना सिर्फ़ अधिकार चाहते हैं बल्कि आगे तक बढ जाते हैं और फिर पैदा होती है शंका ..अविश्वास ...और यह दोनो बाते फिर खत्म कर देती हैं प्रेम को ...मीरा को कभी भी श्री कृष्णा और अपने प्यार पर कभी अविश्वास नही हुआ जबकि राधा को होता था अपने उसी प्रेम विश्वास के कारण कृष्णा को मीरा को लेने ख़ुद आना पड़ा प्रेम चाहता है सम्पूर्णता , मन का समर्पण ,आत्मा का समर्पण ....तन शाश्वत है .,.हमेशा नही रहेगा इसलिए तन से जुड़ा प्रेम भी शाश्वत नही रहता जिस प्रेम में अविश्वास है तो वह तन का प्रेम है वह मन से जुड़ा प्रेम नही है जिस प्रेम में शंका है वह अधिकार का प्रेम है........बस वही नजर इसी उपन्यास में नजर आती है |खुद रविन्द्र प्रभात जी के शब्दों में विवाह जैसी संस्था की परिधि में उन्मुक्त प्रेम की तलाश है यह उपन्यास । इसमें कथा की सरसता भी आपको मिलेगी और रोचकता भी । मित्रता, त्याग,प्यार और आदर्श के ताने बाने से इस उपन्यास का कथानक रचा गया है जो पाठकों को एक अलग प्रकार की आनंदानुभूति देने में समर्थ है ।
          इस उपन्यास का मुख्य पात्र प्रशांत और स्वाती है जिनके इर्द-गिर्द उपन्यास से जुड़ी समस्त घटनाएँ हैं जो पूरे उपन्यास को आगे बढ़ाती हैं । प्रशांत ग्रामीण परिवेश मे पला एक निम्न माध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता है जो शादी-शुदा है और स्वाती एक व्यवसायी की पुत्री है जो शहरी परिवेश मे पली बढ़ी है। घर में लड़ाई होने के कारण प्रशांत शहर आ जाता है और स्वाति के पिता के पास नौकरी करते करते स्वाति के प्रेम में पड़ जाता है |स्वाति जानती है कि प्रशांत विवाहित है पर प्रेम पर कब कौन रोक लगा पाया है और नारी शब्द ही प्रेम से जुडा है और जब नारी प्रेम करती है तो फिर सच्चे मन से खुद को समर्पित कर देती है |औरत प्रेम की गहराई में उतर सकती है |औरत के लिए मर्द की मोहब्बत और मर्द के लिए औरत की मोहब्बत एक दरवाज़ा होती है और इसे दरवाज़े से गुज़र कर सारी दुनिया की लीला दिखाई देती   है |और जब यह प्रेम हो जाए तो प्यार का बीज जहाँ पनपता है वहां दर्द साथ ही पैदा हो जाता है और वह दर्द जुदाई के दर्द में जब हो जाए तो इश्क की हकीकत ब्यान कर देता है ..स्वाति प्रशांत से प्रेम करती है और देव स्वाति से ...सब एक दूजे से जुड़े हुए हैं पर सब के अपने रास्ते हैं |......... यह भी एक हक़ीकत है कि  मोहब्बत का दरवाज़ा जब दिखाई देता है तो उस को हम किसी एक के नाम से बाँध देते हैं| पर उस नाम में कितने नाम मिले हुए होते हैं यह कोई नही जानता. शायद कुदरत भी भूल चुकी होती है कि जिन धागो से उस एक नाम को बुनती है वो धागे कितने रंगो के हैं, कितने जन्मो के होते हैं..वही इस कथानक में स्वाति और प्रशांत के प्रेम के लिए कहा जा सकता है |इसी कथा क्रम में नगीना और देव भी  जुड़ जाते हैं और उपन्यास एक रोचक मोड़ ले कर धीरे धीरे अपनी कहानी के गिरफ्त में ले लेता है ..

      पूरे उपन्यास में बनारस की आवोहवा और बनारस की संस्कृति हावी है ।   जिस के लिए रविन्द्र जी कहते हैं कि र्मैंने बनारस मे कई बरस गुजारें है इसलिए बनारसी परिवेश को उपन्यास मे उतारने मे मुझे मेरे अनुभवों ने काफी सहयोग किया । रविन्द्र जी के कुछ लफ्ज़ कहीं पढ़े थे इसी उपन्यास के सम्बन्ध में कि मेरी राय मे यदि विवाह उपरांत आपसी सहमति से प्रेम संबंध बनते हैं तो गलत नहीं है, क्योंकि हर किसी को अपनी पसंद-नापसंद का अधिकार होना ही चाहिए न कि किसी के थोपे हुये संबंध के निर्वहन मे पूरी ज़िंदगी को नीरसता मे धकेल दिया जाया । हो सकता है मेरे विचारों से आप इत्तेफाक न रखें मगर यही सच है और इस सच को गाहे-बगाहे स्वीकार करना ही होगा समाज को, नहीं तो एक पुरुष प्रधान समाज मे स्त्री की मार्मिक अंतर्वेदना के आख्यान का सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा, ऐसा मेरा मानना है ।" यह सबकी अपनी अपनी सोच हो सकती है प्यार की आभा के विस्तार में ना तो दूरी  मायने रखती है ना ही कोई तर्क वितर्क . त्याग भी एक सीमित अर्थ वाला शब्द बन जाता मुहब्बत में. प्यार को किसी शब्द सीमा में बांधना असंम्भव है ...सोलाह कलाएं सम्पूर्ण कही जाती है पर मोहब्बत .इश्क सत्रहवीं कला का नाम है जिस में डूब कर इंसान ख़ुद को पा जाता है |

इस उपन्यास में कहीं कहीं नाटकीय प्रभाव भी देखने को मिला है सच्चाई और कल्पना से बुना यह उपन्यास कहीं कहीं बहुत भावुकता भी बुन देता है जो मुझे पढ़ते हुए इस में अवरोध ही लगी है | इस किताब के प्रथम पन्ने पर प्रताप सहगल के लिखे से मैं भी सहमत हूँ कि यथार्थ और आदर्श मूल्यों के बीच झूलती उपन्यास की कथा कहीं कहीं मेलोड्रेमिक  भी हो जाती है जो हमें भावुकता के संसार से रु बरु करवा देती है और कहानी को जिस तरह से लिया गया है इसको पुरानी तर्ज पर नया उपन्यास कहा जा सकता है |बहुत सही कहा है उन्होंने ..मुझे भी पढ़ते हुए परिवेश और कई जगह इस में लिखे अंश पुरानी तर्ज़ याद दिला गए | रविन्द्र जी के अनुसार इस  उपन्यास को लिखने की खास वजह यह रही कि प्रेम की स्वतन्त्रता और विवाह जैसी संस्था आदि विवादित विषयों पर नए सिरे से पुन: गंभीर बहस हो । और जब तक यह पढा नहीं जायेगा तो बहस कैसे होगी .इस लिए कहूँगी कि पढने लायक है एक बार आप जरुर पढियेगा इसको |

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