Wednesday, August 22, 2012

कुदरत के जैसे जितने रंग -वैसे ही हर रंग कस्तूरी में

कस्तूरी (कविता-संग्रह)
संपादक : अंजु (अनु॒) चौधरी एवं मुकेश कुमार सिन्हा
24 कवियों की प्रतिनिधि कविताएँ
मूल्य- रु 350
प्रकाशक- हिंद युग्म,
1, जिया सराय
हौज़ खास, नई दिल्ली-110016
(मोबाइल: 9873734046)
फ्लिकार्ट पर खरीदने का लिंक

इक झलक जो मिली उसकी आँखों की चमक बढ़ गयी
सुनहरा सा रूप था उसका और महक कस्तूरी सी ..............यह लफ्ज़ उभरे जब कस्तूरी हाथ में आई .. कस्तूरी महकती हुई ..उस महक से जो खुद से अनजान है ...जो उसके अन्दर खुद महक रही है ..और खुशबु अपनी से अपने आस पास भी एक महक से गुलजार है .ठीक वैसे ही ..जब यह कस्तूरी मेरे हाथ में आई तो इसकी खुशबु से मैं दिल के अन्दर तक महक गयी .एक ऐसा काव्य संग्रह जो महक रही महका रहा है अपनी कही गयी रचनाओं से .उनमें लिखे लफ़्ज़ों से .| जैसे जैसे पन्ने पलटते जाते हैं उसकी महक से सरोबार होते जाते हैं .लहर दर लहर परत दर परत अनेक रंग छिपे हैं इस खुशबु में इस संग्रह में दिल की बातें है जो रूमानी है और पढने वाले को रूमानी कर देती है .जज्बात है ..दर्द है और शिकायते भी ..हर रंग अनूठा ,हर रंग अपने में डुबो देने वाला .चौबीस कवि,कवियत्रियों ..द्वारा लिखा यह संग्रह वाकई में बहुत ही अनूठा है ..अलग है .इस में छन्दमुक्त रचनाये हैं गजल है ..गीत है ...क्षणिकाएं हैं हर रंग में हर तरह से यह अपनी बात कहती नजर आती है ....
कुदरत के जैसे जितने रंग
वैसे ही हर रंग कस्तूरी में .......
         आज का युग नेट का युग है ..हर भाषा ,हर भाव में कविता लिखी जा रही है और पढ़ी जा रही है .पर फिर भी उसको यूँ संग्रह के रूप में पढने की इच्छा कम नहीं हुई है ...हाथ में आई पुस्तक की महक भी किसी कस्तूरी से कम नहीं आंकी जा सकती है जो खुद में डुबो लेती है इस लिए जहाँ तक यह पहुँच जाए वहीँ थाम लेती है रोक लेती है ..कुछ ऐसा ही अनुभव मैंने इस संग्रह को पढ़ते हुए किया ...
 पहली कविताएं ही उस सूफियाना रंग में महकी हुई है ...अजय देवगिरी की रचनाये सूफी अंदाज़ से अपनी बात कुछ यूँ कहती है ..
इक मुद्दत से ज़माने से बेखबर हूँ
ख्वाबो ख्यालों में शुमार तू ही तू है
और वही ख्याल जब उनकी नजर बदल कर रूमानी हो जाते हैं तो कम कयामत नहीं करते उनके लिखे लफ्ज़ .
इस सर्द रात में हम दोनों
बंदिशे सारी तोड़ देते
अपने लम्स की गर्मी में
एक दूसरे को हम ओढ़ लेते
अगर तुम होते ..
रूमानी एहसास की खुशबु में खोये खोये से दिल रुक जाता है
अगले पडाव पर जहाँ अमित आनंद पाण्डेय जी अपना परिचय ही इस अंदाज़ से दे रहे हैं कि उनको पढ़े बिना अगला सफ़र तय नहीं किया जा सकता है .."मैं खुद चकित हूँ /कौन हूँ /मैं मुखर हूँ .मौन हूँ "
और जिस मैं से वह खुद हैरान हैं वही उनको अस्तित्व देने वाली माँ जब माँ के हाथ की बुनी हुई लोई आती है तो ठंड का एहसास भी आता है और यह ख्याल भी कि ठण्ड तो हर साल आएगी पर तुम माँ ?भावुक कर देता है यह प्रश्न |
आनंद जी की लिखी रचनाएं रंगमंच ,हमारी दुनिया, हारसिंगार की महक से हमें परिचय करवाती है ...और खुद से जैसे रूबरू करवाती है
कुछ इस तरह से नजारों की बात की उसने
मैं खुद को छोड़ के उसके ही साथ दौड़ गया
कुमार राहुल तिवारी कृष्ण के घर आने की ख़ुशी में गुनगुना उठे हैं
सपने जो बुने थे ,राहें जो चुनी थी | ..
सब सफल हैं तेरे कारण मेरे कृष्णा
बाकी उनकी लिखी रचनाओं में चाँद ने पूछा बादल से विशेष रूप से प्रभावित करती है
  गुंजन अग्रवाल जो परी की तरह पली है और अपने अस्तित्व को "मैं हूँ हाँ मैं हूँ .क्यों कि मैं गुंजन हूँ "..और गूंजी इस संग्रह में अपनी लिखी बहुत ही सुन्दर रचनाओं से .और उनकी रचना "सुन पगली कब्बी इश्क ना करना !"
ऐ लड़की !
सच बता
तुझे कहीं इश्क तो नहीं हो गया ?
इत्ते सारे रंग तो बस
इश्क होने पर ही खिला करते हैं
महबूब से मिलने पर ही उड़ा करते हैं
और एक पाती पांचाली के नाम विशेष रूप से उलेखनीय है ..
तुम्हारे मन की भाषा .तुम्हारे मन की लाज
उसके मौन को पढा है मैंने
यह तो बस तुम ही कर सकती हो
प्रेम बलिदान मांगता है ...
       गुरमीत सिंह के परिचय में एक यथार्थ है कि इस में और कल्पना की उडान के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहता है और मन भावनाओं के माया जाल में भटकता रहता है ...और भटकता हुआ ह्रदय कुछ तूफ़ान पैदा न करे यह हो ही नहीं सकता .
"आओ कुछ तूफानी करते हैं "..रूह तक कांप जाए काफ़िरो की /आओ आज कुछ रूहानी करते हैं रचना और" मरीचिका "ने विशेष रूप से मन को हर लिया
जानता हूँ आसमान के चाँद की ख्वाइश कर बैठा हूँ
शायद ,मैं तेरे ख्वाबों के लायक भी नहीं
पर क्या करूँ/दिल है कि मानता ही नहीं !
           इक अजीब किस्म की किताब को /हम दोनों ने अपने नाम किया मैं उसकी लिख न सका ,वह मेरी पढ़ न सकी ...यह जबरदस्त अंदाज़ है जेस्बी  गुरजीत सिंह जो अपनी सरल भाषा में अपनी बात कह गए हैं इस संग्रह में ,इनकी सभी रचनाये मुझे विशेष रूप से बहुत पसंद आई ..किसी दो का चुनना बहुत मुश्किल लगा ..फिर भी यहाँ सब के बारे में नहीं लिखा जा सकता ..".मैं तेरे अनलिखे खत सा "..और "मेरी मजबूरियां "न भूलने वाली रचनाएँ है
एक दिन सुबह जब आंख खुली
तो तकिये के नीचे एक खत पाया
न लफ्ज़
न कागज़
न लिफाफा
इस में ही ज़िन्दगी के मायने तलाशते हुए वह मज़बूरी भी ब्यान कर गए
मेरी मजबूरियां
वो सब हक है
जो मैंने तुझे जताए ही नहीं कभी
ये सोच के
कि इनकी बंदिशों में
इश्क भी इक दिन रो पड़ेगा ..
     डॉ वंदना सिंह की रचनाओं में "आँखे" और "याद आये "रचनाएं बेहतरीन है
अपने घर में वो इक लड़की
डरती है क्यों सोती सोती
और याद आये कि यह पंक्तियाँ
कहते थे खुद को आईना जो
इक बार न अक्स दिखा पाए
       मेरे लफ्ज़ मुझसे बातें करते हैं /कभी मेरी मुश्किलें बढ़ा देते हैं /तो कभी मरहम लगा देते हैं /लफ़्ज़ों से बात करती नीलिमा शर्मा के लिखे का परिचय स्वयं ही दे देते हैं और "संबोधन" की ओपचारिकता में क्यों पड़े कहते हुए कि आप तुम और तू की बजाये
मैं तुम्हे और तुम मुझे
मेरे ही नाम से पुकारेंगे
अपना अपना वजूद लिए हम
एक दूसरे के रहेंगे उम्र भर
इनकी रचनाओं में दूसरी रचना "कविता का जन्म" मासूम सी रचना है ..
एक अक्स लकीरों का
कुछ आड़ी है कुछ सीधी सी
कुछ बिलकुल सपाट
एक छोटी सी नन्ही सी
एक प्यारी सी कविता मेरी अपनी
       शब्द कहाँ से लाते हो ..यह प्रश्न है नीलिमा पुरी का बातें तो मेरी सब मेरी होती है इन में /तुम उनको शक्ल कैसे दे पाते हो /कहते हो खुद को मासूम और मुझे नीलम बताते हो ये प्यार में डूबे शब्द कहाँ से लाते हो .....और उनको जवाब मिलता है
मैं कुछ भी लिखूं ,तुम उसे गुनगुनाती रहो
राह -ऐ ज़िन्दगी में कदम से कदम मिलाती रहो
मैं रूठ जाऊं तुम मानती रहो ....वाह क्या दिलकश अंदाज़ है यह गुफ्तगू का ..जो बन के कविता नीलम पुरी की कलम से उतरा है और सरल भाषा में अपनी बात कहने वाली "पल्लवी सक्सेना "भी "सत्यम शिवम् सुन्दरम "और "सागर एक रूप अनेक में "ज़िन्दगी के नए अर्थो से पहचान कराती नजर आई
"बोधमिता" की रचनाएं माँ बेटी के प्रेम से अभिभूत है ..वहीँ "मीनाक्षी मिश्रा तिवारी "की रचनाओं में "समाकलन "और "विरह "रचनाओं को श्रेष्ठ कहा जा सकता है |
मुकेश गिरी स्वामी आत्मचिंतन में लीन हैं ..सोच में डूबे हुए कि चिंतन की शुरुआत कहाँ से करूँ /देश की चिंता करूँ या खुद की चिंता करूँ ....कहीं से तो शुरुआत करें मुकेश जी ..अच्छी लगी आपकी रचनाएं |
रजत श्रीवास्तव "मौन "से रिश्तों को निभाने का आग्रह कर रहे हैं .और देख ले गजल के माध्यम से बहुत ही बढ़िया बात कह गए हैं ..."तूने इबादत का नाम क्या दिया मेरी मोहब्बत को
सजदे में है तेरी जुस्तजू आठों पहर देख ले "
         रश्मि प्रभा जी की रचनाएं गहरा अर्थ लिए होती है ..इस संग्रह में भी वह "परेशानियां तो दरअसल समझदारी में है "और "क्या करूँ" से जीवन दर्शन के नए रंग नए अर्थ में है |वंदना गुप्ता ,रिया ,राहुल सिंह ने ज़िन्दगी के उन पहलुओं पर लिखा है जो आम ज़िन्दगी से ताल्लुक रखते हुए भी ख़ास है वंदना की रचना
इन्तजार की सिलाई खत्म नहीं होती
औत यूँ ही डिग्रियां नहीं मिलती मोहब्बत की बहुत ही बेहतरीन रचनाये हैं उनके दी हुई इन रचनाओं में
रिया ख़ामोशी को सुनते हुए कहती हैं उसकी दीवानगी को कहते हुए सुना है
उसकी दीवानगी को समझा है
उसका अपनापन महसूस किया है
        राहुल सिंह जी की रचनाएं नियम में बन्ध कर नहीं रह सकती है और वह पढने में भी हर तरह से आज़ाद ख्याल की ही लगीं
भाग्य -कर्म के खेल करो तुम
मेरा क्यों अपराध बने ?
और संताप नहीं दिखलाऊं मैं
कष्ट लिखूं या हर्ष लिखूं
लेखन पूरा न हो पाए
वाणी शर्मा की कविता "गर्भ हत्या का अपराधबोध "बहुत ही मार्मिक है
यह वह युग नहीं कि हर कन्या महामाया बन कर जन्म ले
और यहाँ कंस जैसे मामा का होना जरुरी है
जब बन रहे हो माँ बाप ही हत्यारे
यह आज के समय का सबसे बड़ा सच है ..और बहुत ही मार्मिक ढंग से वाणीं जी की कलम से उतरा है
      शिखा वैष्णव जी का लेखन किसी की तारीफ का मोहताज नहीं है उनका लेखन अक्सर नए नए बिम्बों से सजा हुआ होता है जो पढने में बहुत रोचक लगता है "तेरी मेरी ज़िन्दगी" उस रसीली जलेबी की तरह है जिसको देख कर हर कोई ललचाता है .शुरुआत जिस तरह से इस रचना की रोचक ढंग से हुई है अंत तक आते आते यह एक कडवे सच में तब्दील हो गया और यही उनके लेखन की विशेषता है |"निरीह "और "पुरानी कमीज "उनकी इस संग्रह में उल्लेखेनीय रचनाएं हैं |
     मैं शख्स बड़े काम का था /कुछ मोहब्बत ने लूटा/कुछ सपनों ने /सफ़र अपना कुछ लगा ही था /वाकई अलग ही लगा इस काव्य संग्रह में हरविंदर सिंह सलूजा का जिन्होंने अपना परिचय ही इतने दिलकश अंदाज़ में दिया है "जाने कौन परी आएगी " मेरी कलम ही मुझे पहचान दिलाएगी अब ..और
पलकों पर मोती और नींद का रूठना
ख़्वाबों के बनने से पहले ही टूटना
यह धड़कन अधूरी ये ज़िन्दगी अधूरी
कोई जवाब नहीं कोई सवाल नहीं ..आज नहीं जैसी रचनाएँ उनकी बेहतरीन रचनाएँ हैं
अंजू अनु चौधरी की कलम से निकले शब्द बोलते हैं और जब बोलते हैं तो खूब अच्छे से सुनाई देते हैं आपकी बात कहते और प्रतिध्वनि की तरह गूंजते हुए
मेरे मन के बच्चे की वही प्रतिध्वनि
कि हाँ यहाँ सब अच्छे हैं
सबके अपने विचार हैं
और इस तरह यह मेरे मन और मष्तिष्क को जीवन को नया अर्थ दे देते हैं
अपने लिए में कुछ पंक्तियाँ बहुत ही अर्थपूर्ण लगी कि वो क्या सोचती है .क्या चाहती है /रात की तनहाइयों में /ग्रीष्म में मेघ ,बसंत में बहार /और कि हे नर क्या तेरे ह्रदय में मेरे लिए कोई भाव नहीं क्या अब इस जीवन में ..........
मुकेश कुमार सिन्हा के लफ्ज़ हमेशा अपनी बात बहुत ही सरल तरीके से कह देते हैं पर उनका मर्म उनका असर बहुत गहरा होता है उनके इस संग्रह में मुझे" यूटोपिया "और "एक नदी का मरसिया "बेहद पसदं आई ....
सपने पूरे होंगे तब न
जब समझदारी की छींटें ड़ाल कर
जागते हुए उन्हें जीएगा
मिलेगा तभी ,प्यार का नजराना
खुशियों का खजाना
फिर बच के जाएगा कहाँ
यूटोपिया ...और "एक नदी का मरसिया" दिल्ली की नदी यमुना की मौत का मातम है जो हम सब लोग पल पल खुद ही उसको दे रहे हैं जहाँ मर चुकी है /वहां कर रहे हैं कोशिश /लाश नोचने की /लगे हैं हम /एक नया रेगिस्तान बनाने में ../एक प्यारी सी नदी का मरसिया पढने में ..
         कस्तूरी बहुत से फूलों का गुच्छा है ..जिस में हर फूल का अपना रंग और अपनी खुशबु है .मुझे जो फूल अच्छा लगा जिसकी सुंगंध अच्छी लगी वह मैंने अपनी कलम से आप तक पहुंचा दी ..हर किसी की पसंद अपनी है खुशबु की भी और फूल की भी ...आपको वह इस काव्य संग्रह को पढ़ कर खुद चुनना होगा ..कविताओं से सजे इस पुष्प गुच्छे को सजाया है संवारा है अंजू (अनु )चौधरी और मुकेश कुमार सिन्हा ने ...हाथ में आते ही उस मेहनत की खुशबु जो इस संग्रह को हम तक पहुँचाने में हुई है वह आपकी सुंगध से आपको अपने घेरे में ले लेती है | अनेक लोगों का एक साथ एक संग्रह में होना इस बात से भी बहुत सहज लगता है कि आप अपनी इच्छा से अपनी मर्ज़ी से अपनी पसंद को पढ़ सकते हैं ..जो नहीं पसंद उस पर अधिक ध्यान नहीं देते क्यों कि अगले ही पल अगली आपकी मनपसन्द रचना आपको अपने में समेट लेती है ...यही इसी काव्य संग्रह के साथ भी है ...कुछ बहुत दिल को भा लेने वाली हैं और कुछ कहीं कहीं भटकती हुई .बेमकसद सी ...सफ़र में निकले उस समूह की तरह जो अपने अपने विचार लिए सफ़र कर रहा है ..पर नाम कस्तूरी है तो महकेगी ही ..और वह महक रही है अपने सूरजमुखी आवरण के साथ पीले रंग में और हाथ में आते ही उकसाती है हर अगले पृष्ठ को पढने के लिए .पढने के बाद मैं तो यही कहूँगी ....कस्तूरी सी यह नशीली महक ...महक रही है मेरे दिल के ,जहन के हर कोने में फ्लिप्कार्ट पर यह उपलब्ध है दस % डिस्काउंट के साथ ..इस समीक्षा को पढ़ कर आप इसको मिस नहीं करना चाहेंगे ..मुझे तो आप लोगो से यही उम्मीद है ..:)और आज इस संग्रह का विमोचन है ..आप सभी का स्वागत है इस कस्तूरी की महक को लेने के लिए आप आज यहाँ ४.३० हिंदी भवन में आमंत्रित हैं ..इंतजार रहेगा आप सभी का ....मुझे भी और कस्तूरी को भी ...


Post a Comment