Thursday, August 19, 2010

गीत की जुबान

नही .नहीं
याद नही ....
मुझे कुछ भी 
उस पहली मुलाकात का
सिर्फ़ इसके सिवा,
जो तेरी आंखो से ..
मेरी आंखो तक ..
कुछ कौंध के आया था ..
देखा था बेशुमार प्यार
और साथ में ....
कई सवालों को मैंने
पर न जाने क्यों,
कहा दिल ने ,
यह कोई ख्वाब का साया था ,
सोचा फ़िर रात के अंधेरे में
तुझे कई बार मैंने
जैसे कोई अजनबी खुशबु  सी आ कर
बदन को सिहरा जाती है 
आता  है हाथो में एक हाथ यूँ  ही ख्यालों में
और मुद्दतों से जमी कोई बर्फ पिघल जाती है .......
तब सुलग उठता है तन और मन
और ..........
जैसे इस बदन का अँधेरा 
किसी की  बाहों में उलझ के
बस अपना आखिरी   दम
तोडना चाहता है
या जैसे कोई
बरसों से मांगी मुराद का
सपना अब सच होना चाहता है
पर तभी न जाने किस ख्याल से
रूह  जिस्म तक कांप जाता है
लगता है यूं मुझे  जैसे मैंने
अनजाने में कोई वर्जित फल
चख लिया है ....
 तब मेरे बेजुबान बदन से
स्पर्श  करते तेरे हाथ जैसे
एक चाँदनी का साया बन जाते हैं
प्यार के एहसास में डूबे यह हाथ भी
 मेरे दिल के साथ सिसक जाते हैं
और तब यूं ही बहती हवा
ले जाती है उस रिश्ते  की राख को
उन आखरों तक ...
जो दुनिया की नज़र में
आज तेरे मेरे लिखे
गीत की जुबान कहे जाते हैं !!

रंजना (रंजू ) भाटिया
(साया किताब से )


::::

Tuesday, August 10, 2010

बहाना


कविता में उतरे
यह एहसास
ज़िन्दगी की टूटी हुई
कांच की किरचें हैं
जिन्हें महसूस करके
मैं लफ्जों में ढाल देती हूँ
फ़िर सहजती हूँ
इन्ही दर्द के एहसासों को
सुबह अलसाई
ओस की बूंदों की तरह
अपनी बंद पलकों में
और अपने अस्तित्व को तलाशती हूँ
पर हर सुबह ...........
यह तलाश वही थम जाती है
सूरज की जगमगाती सी
एक उम्मीद की किरण
जब बिंदी सी ......
माथे पर चमक जाती है
एक आस ,जो खो गई है कहीं
वह रात आने तक
जीने का एक बहाना दे जाती है...