Thursday, December 23, 2010

लावा

लगता है कभी कभी
मेरे भीतर 

एक लावा सा
बहता है
खून नहीं
तब ओढती हूँ बर्फ ,
और
सो जाती हूँ
एक ठण्ड का 

एहसास दे कर
अपने दिल को बहलाती हूँ
पर ज्वाला मुखी सा लावा ,
जैसे धधकता ही रहता है
बर्फ होते हुए सीने में ,
बहता ही रहता है
और फिर टूटते हुए

बाँध की तरह
 बह जाने को होता है
तब मैं उस बाँध पर
अपनी ख़ामोशी की 

रोक लगा देती हूँ
और मुस्कराते हुए
हर लावे को 

अपने भीतर समेट लेती हूँ   .............??

यह लिखी गयी पंक्तियाँ कुछ अधूरी सी  है ...........आप सब अपनी राय इस पर आगे लिख कर दे सकते हैं ....

36 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

यह अधूरी कहाँ है .....सब समेट तो लिया ..फिर कुछ बिखरने को बचा कहाँ ?

अच्छी प्रस्तुति

वन्दना said...

अधूरा कहाँ पूरी तो हो गयी .......ये लावा ऐसे ही बहता है

PN Subramanian said...

लावे को बर्फ की मोटी से मोटी परत भी नहीं रोक पाती है. वह तो बहता ही रहेगा जब तक स्वयं शांत न हो जाए.

Domain For Sale said...

बहुत मर्मस्पर्शी रचना -
भाव विभोर कर गयी .

रश्मि प्रभा... said...

पर कहाँ रुकता है लावा ?
ख़ामोशी मुखर
मुस्कान बेबस
बर्फ पिघलता जाता है ...

anjana said...

wah kya baat hai...

fir aati hoo...kuch kahne..

परमजीत सिँह बाली said...

बढ़िया रचना!

रंजना said...

सच है...इसमें अधूरापन कहाँ है...

यही तो है पूरी कहानी...

Sonal Rastogi said...

man ke bhaav ..aise hi umadte hai

Suman Sinha said...

बर्फ ओढ़ लिया है मैंने
जो बूंद बूंद बह चला है
इस लावे का मैं क्या करूँ
यह तो बुझता ही नहीं

rashmi ravija said...

हमेशा बहुत कुछ कहने के बाद बहुत कुछ रह जाता है....लिखने वाले को हमेशा ऐसा लगता है..वरना हमें तो बढ़िया अभिव्यक्ति लगी...

sada said...

बहुत खूब ...सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मुझे यह अधूरी तो नहीं लगी थी ....फिर भी कुछ लिखा है आगे तो फिर से आ गयी ...



इस समेटने में
अंदर कितना
कुछ जलता है
कभी कोई चिंगारी
छिटक आती है
बाहर तक
और हो जाता है
सब स्वाहा
मेरे सारे प्रयास
हो जाते हैं व्यर्थ ,
बर्फ भी जाती है पिघल
और बन जाती है
अंश लावा का ,
फिर भी मैं निरंतर
प्रयत्नरत हूँ कि
हिमशिखा बन सकूँ ...

फ़िरदौस ख़ान said...

अति सुन्दर अभिव्यक्ति...

chirag said...

kaavi emotional lines hain and sab kuch aa gaya in lines main

its been a long itme aap mere blog par nahi aaye ..meri kuch rachnao ko jara padh kar bataiye kaha galat hu main
taki sudhar saku
http://iamhereonlyforu.blogspot.com/

is blog main MY POEM tab par ja kar meri kavitaye aap padh sakti hain

रंजना [रंजू भाटिया] said...

इस समेटने में
अंदर कितना
कुछ जलता है
कभी कोई चिंगारी
छिटक आती है
बाहर तक
और हो जाता है
सब स्वाहा
मेरे सारे प्रयास
हो जाते हैं व्यर्थ ,
बर्फ भी जाती है पिघल
और बन जाती है
अंश लावा का ,
फिर भी मैं निरंतर
प्रयत्नरत हूँ कि
हिमशिखा बन सकूँ ...

@ वाह संगीता जी बहुत बढ़िया लिखा है आपने ..कोशिश वाकई जारी रहती है हिमशिखा बनने की ,पर .....बेहतरीन शुक्रिया

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

अपनी भावनाओं को सलीके से बयां करना कोई आपसे सीखे।

---------
मोबाइल चार्ज करने की लाजवाब ट्रिक्‍स।

shikha varshney said...

रंजना जी ! एक तो आपकी कविता कमाल उस पर संगीता जी का पूरा करना डबल कमाल ..
बेहतरीन हैं दोनों भाग .मजा आ गया.

अनामिका की सदायें ...... said...

ek soch ye bhi ..


him shikha to banna he sabhi ko
lekin kya yahi ban jana
zindgi hai ?
kyu na aao chalo
ham apne vikaro ko mitaye
kyu na antas ki jwala ko
pyar ki chaashni me duboye
tabhi to hoga is kupit jeewan
ka ant
tabhi to hoga ek naye path ka srijan.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर जी.

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी रचना।

Kajal Kumar said...

जितना है अच्छा है (मैं तो यूं भी इसमें कोई दखल नहीं रखता सिवाय इसके कि हां कविता पढ़कर मन को अच्छा लगता है)

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

deep creation.

Arvind Mishra said...

कतई अधूरी नहीं ,आपने बल्कि अधूरे होने को पूर्णता दे दी है यहाँ!

सतीश सक्सेना said...

संगीता स्वरुप से सहमत हूँ ! बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति .....
शुभकामनायें !

Kunwar Kusumesh said...

आप तो बहुत अच्छा लिखती हैं. ज़बरदस्त भाव पिरोये हैं आपने .बधाई

Rahul Singh said...

''एक आस की तरह''

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीया रंजू भाटिया रंजना जी
नमस्कार !

कविता लावा मुझे तो पूर्ण ही लगी… जितनी मेरी समझ है
जब, मिले हुए को स्वीकार कर लिया … अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं कहते की तर्ज़ पर, … और विरोध की आदत और असंतुष्टि की प्रवृति नहीं ; फिर आगे और क्या हो ?!

आदरणीया संगीता स्वरूप जी ने आगे इसी संतुष्टिपूर्ण समर्पण को ही तो विस्तार दिया है
अच्छी भावपूर्ण रचना है , अभार स्वीकर करें !

नव वर्ष ज़्यादा दूर नहीं …
~*~नव वर्ष 2011 के लिए हार्दिक मंगलकामनाएं !~*~

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

usha rai said...

लावा ने अगर राह पा ली तो फिर रुकने वाला नही ! यह कवि है जो उसे धारण करता है ! बधाई !

Er. सत्यम शिवम said...

laazwaab bhut bhi sundar.....

Patali-The-Village said...

ये लावा ऐसे ही बहता है| अति सुन्दर अभिव्यक्ति|

अल्पना वर्मा said...

तब मैं उस बाँध पर
अपनी ख़ामोशी की
रोक लगा देती हूँ
और मुस्कराते हुए
हर लावे को
अपने भीतर समेट लेती हूँ...
-बेहद भावपूर्ण पंक्तियाँ.
कविता तो अधूरी कहीं नहीं बल्कि पूर्ण ही लगी..

अंतिम पंक्तियाँ ही तो पूर्णता दे रही हैं इस कविता को और उसके अर्थ को.
मन को गहरे छूने जाने वाले अहसासों को बड़ी ही कुशलता से आप ने कविता में बाँधा हैं. बहुत अच्छी रचना.

KAMAL said...

LAVA RAH MIL JAYE TO DEKHNE MAIN SUNDAR LAGTA HAI
RAH NA MILE TO KAHAR DHA JATA HAI

AAPKO AAPKIE RAH MILE WO ITNI SUNDAR HO KI HAR VYKTI US PAR CHALNE KO CHAHE AUR CHALE

JAI HIND
KAMAL SINGH BISHT

दिगम्बर नासवा said...

इंसान जीता जागता लावा ही तो है ... यादों का ... टूटे हुवे सपनों का ... निरंतर प्यास का ... बहुत ही अच्छा लिखा है ...
आपको और आपके समस्त परिवार को नव वर्ष मंगलमय हो ...

ecstasies said...

speechless.. so amazing ‘n pure !!

man na vicharo said...

मै गुजराती हु..पर हिन्दी पढ़ना लीखना बहूत पसन्द है..हां गलतियाँ करती हु..पर कोशीश भी करती हु..ठीक करके पढिएगा..

बहोत कुछ सिमटे हुवे थे हम पहेले ही, चलो और थोडा भार बढ़ गया..
लावा हो, बर्फ हो, चाहे गम का हो दरिया..
रखना तो हमें ही है खुद में..
तो वो आखिर हमारा ही हुवा..

नीता कोटेचा ..