Wednesday, September 01, 2010

राधा -मीरा


  • जिस को देखूं साथ तुम्हारेमुझ को राधा दिखती हैदूर कहीं इक मीरा बैठीगीत तुम्हारे लिखती है
    तुम को सोचा करती हैआँखों में  पानी भरती है उन्ही अश्रु की स्याही से लिख के खुद ही पढ़ती है
    यूँ ही पूजा करते करतेकितने ही युग बीत गये बंद पलकों में ही न जाने कितने जीवन रीत गये खोलो नयन अब अपने कान्हा पलकों में तुम को भरना हैपूजा जिस भाव  से तुम्हे उसी से प्रेम अब तुमसे करना है
    आडा तिरछा भाग्य है युगों सेतुम इसको सीधा साधा कर दोअब तो सुधि लो  मेरे कान्हामीरा को राधा कर दोहाथ थाम लो अब तो कृष्णा इस भव सागर से पार तुम कर दो ...


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