Friday, December 04, 2009

तरक्की की कीमत..

बचपन के दिन कैसे फुदक के उड़ जाते हैं ,स्कूल की शिक्षा खत्म हुई और आँखो में बड़े बड़े सपने खिलने लगते हैं जैसे ही उमंगें जवान होती है कुछ करने का जोश और आगे ऊँचे बढ़ने का सपना आंखो में सजने लगता है !ठीक ऐसा ही शिवानी की आँखो में था एक सपना कुछ बनने का , कुछ पाने का जिन्दगी के सब खूबसूरत रंगो को जीने का! वह मेघावी थी और सब गुण भी थे उस में , पर वह एक बहुत छोटे से शहर की लड़की थी !अपने सपनो को पूरा करने के लिए उसको शहर जाना पड़ता और घर की हालत ऐसी थी नही की वह आगे पढने जा पाती ..पिता का साया बचपन में ही उठ गया था ,घर में सिर्फ़ माँ थी ...वैसे माँ भी उसके सपनो को पूरा होते देखना चाहती थी पर एक तो पैसे की कमी दूसरा लड़की जात कैसे बाहर जाने दे! ,शिवानी माँ को भरोसा दिलाती कि उस पर विश्वास रखे वह उनको जरुर कुछ बन के दिखायेगी .! बस अब उसको इंतज़ार था अपने रिजल्ट का जिसके अच्छा आने पर उसको स्कालरशिप मिल सकती थी .. और वह अपने सब सपनो को अपनी माँ के सपनो को पूरा कर सकती थी ! और आखिर रिजल्ट आ गया .वह जो उम्मीद कर रही थी वही हुआ ,वह न केवल फर्स्ट क्लास से पास हुई बल्कि उसको स्कालरशिप भी मिल गया था ..अब उसके सपनो को पंख मिल गए और उसने सोच लिया कि वह आगे पढने शहर जायेगी !


अपने सपनो के साथ बड़े शहर मुंबई आ गयी, यहाँ की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी और महंगाई के साथ उस यहाँ रहना बहुत मुश्किल सा लगाने लगा ! इसी शहर में उसके एक दूर की आंटी रहती थी जो शहर की मानी हुई डाक्टर थी ...बहुत मुश्किल से उसको कॉलेज के होस्टल में ही रहने की जगह मिल गयी तो उसने कुछ राहत की साँस ली ...सोचा की चलो पढ़ाई के साथ रहने का बदोबस्त हो गया है अब कोई पार्ट टाइम काम करके अपना ख़र्चा ख़ुद ही निकल लूंगी और अपनी माँ को ज्यादा तकलीफ़ नही दूँगी ....उसकी साथ कमरे में रहने वाली लड़की बड़े शहर से थी और बहुत अमीर परिवार से थी ..ख़ूब शान शौकत से रहती ..पैसे उड़ाना उसका शौक भी था और जनून भी ..रोज़ नये कपड़े मेकअप और ऊपर से सिगरेट और नशे की भी आदत ...शिवानी देख के डरी डरी सी रहती ...पर क्या करती ,रहना तो था ही ना .. !

बला की सुंदर और खूबसूरत शिवानी को जो देखता वो देखता रहा जाता ,हँसती तो गालो के गड्ढे जैसे अपनी और बुलाते थे ,...कालेज के कई लड़के उसको बस देखते ही रह जाते पर एक समान्य सा दिखने वाला लड़का रोहित तो जैसे उस पर अपनी जान देता था !..शिवानी शुरू शुरू में अपनी आंटी के घर चली जाती ..और उनसे कहती की कोई काम साथ साथ मिल जाए तो उसकी पैसों की परेशानी कम हो जाएगी!

परिस्थितियाँ या तो इंसान को बहुत ताक़तवर बना देती हैं या बहुत कमज़ोर! कुछ ऐसा ही शिवानी के साथ हुआ पहले उसके साथ उसके कमरे में रहने वाली लड़की सीमा उसके साथ बहुत प्यार से पेश आई फिर उसने उसका मज़ाक बनाना शुरू कर दिया ,कभी उसके कपड़ों का कभी उसके रहने के ढंग का कि वो यहाँ आ कर भी के कस्बे की लड़की ही बना रहना चाहती है ,,धीरे धीरे शिवानी भी उसके रंग में रंगने लगी , पर उस के पैसे कहाँ से आए... कोई नौकरी अभी मिल नही रही थी ,पहले सीमा के साथ सिगरेट फिर नशा और फिर गए देर रात तक पार्टी ..और उसके बाद सिर्फ़ अंधेरा था जहाँ वो लगातार गिरती चली गयी .. धीरे धीरे उसको वो जीने का ढंग रास आने लगा !
अब वो भी नये महंगे कपड़ों में घूमती ..महंगी कारो में घूमना उसका शौक बन गया .होस्टल उसको बंदिश लगने लगा तो उसने एक नया घर किराए पर ले लिया !रोहित यह सब देख के उसको समझाने की कोशिश करता ..कभी कभी उसकी अन्तरात्मा भी उसको कचोटती पर वो ख़ुद को यह कह कर चुप करा देती कि जीने के लिए सब जायज़ है.. क्या हुआ जो दो घंटे किसी के साथ गुज़ार लिए हँस बोल लिया , ज़िंदगी तो अब जीने लायक लगने लगी है ,उसके सारे सपने हवा में उड़ गये जो वो अपनी आँखो में बसा के आई थी ..रोहित उसको वापस बुला बुला के थक गया पर उसने पीछे मुड़ के उसकी तरफ़ देखा भी नही ....बस एक ही नशा की पैसा कमाना है किसी भी तरीक़े से और सुख से जीना है !

उधर उसकी आंटी भी हैरान परेशान थी की जो लड़की हर सप्ताह के अंत में उस से मिलने को उतावाली रहती थी अब वो महीनो-महीनो अपनी शक्ल नही दिखाती हैं उन्होने जब उसके बारे में सब पता लगाया तो उनके पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन सरक गयी ..बहुत समझाने की कोशिश की ...यह भी कहा कि वो उसके घर में ख़बर कर देंगी पर शिवानी जैसे कुछ सुनने की तैयार ही नही थी !
हार कर उसकी आंटी ने उसकी माँ को फ़ोन पर सब बात बता दी कि मेरे समझाने से वह कुछ नही समझ रही है शायद आपका डर और कुछ शर्म उसको वापस राह पर ले आए ! शिवानी की माँ सुन कर जैसे सुन्न सी हो गई एक अकेली विधवा औरत जिसका बुढापा शिवानी के सहारे गुजरना था आज यह सब सुनते ही शिवानी के साथ सजाये सब सपनों के साथ सब मिटटी में मिल गया ...

कहते हैं विनाश काले विपरीत बुद्धि अब कौन समझाए उस को जो ख़ुद ही ना समझना चाहे सो थक हार के उसकी माँ आंसू बहा के रह गई और उसकी आंटी ने उसको उसके हाल पर छोड़ दिया !


वक़्त का पहिया चलता रहा ...एक दिन आंटी अपने क्लीनिक से घर जा रही थी कि सड़क के एक और उन्हें शिवानी दिखी उसके साथ उसका दोस्त रोहित था ..शिवानी की हालत बहुत बुरी हो रही थी .. सुंदर शिवानी के गाल पिचक चुके थे बाल उलझे हुए कंघी मांग रहे थे और गोरा खिला हुआ रंग काला पड़ चुका था .कमज़ोर इतनी थी कि बोला भी नही जा रहा था .हर चीज की अति बुरी होती है और शिवानी कि हालत उसकी बर्बादी की कहानी सुना रहे थे !
आंटी उसकी यह हालत देख के घबरा गयी और पूछने लगी कि हुआ क्या है ??.. शिवानी अब क्या बोलती ..तब रोहित ने आंटी को बताया कि वो जिस रास्ते पर चल पड़ी थी वहाँ जाने के लिए कितनी बार मना किया पर शायद उस वक़्त यह मेरी बात नही समझ पाई मुझे तो इसका पता अपने एक दोस्त से चला मैं इसको डाक्टर के पास चेकअप के लिए ले के गया था ..इसको एड्स हो गया है और अब वह आखरी स्टेज पर है! यह सुन कर आंटी जैसे स्तब्ध रह गयीं! रोहित ने उसकी रिपोर्ट्स की फाइल आंटी को दिखा दी ..जिसके पन्ने बर्बादी की दास्तान सुना रहे थे ..उन्होंने उसको अपने नर्सिंग होम में एडमिट होने को कहा .वह उसकी सब रिपोर्ट्स देख चुकी थी, कही कोई उम्मीद की किरण नज़र नही आ रही थी !.शिवानी अपनी आंटी से नज़रें नही मिला पा रही थी ,उसने रोहित को कहा कि वह वहाँ से जाए वह अपने आप घर चली जायेगी उसको आंटी से कुछ बात करनी है !रोहित उसको वहाँ छोड़ के चला गया ! उसका दर्द उसके चेहरे से छलक रहा था ,और वो जैसे हर पल अपने इस किए से मुक्ति पाना चाहती थी .पर उसके लिए वह हिम्मत नही संजो पा रही थी .उसने अपनी आंटी से कहा कि मुझे प्लीज नींद की गोलियां दे दो ..मैं जीना नही चाहती ख़ुद मरने का साहस मुझ में है नही और मैं तिल तिल के नही मारना चाहती!

आंटी ने यह सुनते ही उसको डांट लगाई कि बेवकूफी की बातें न करे ..वो उसकी आखरी साँस तक उसको बचाने कि कोशिश करेंगी!जो होना था वो हो गया अब हिम्मत से काम ले ! उन्होंने उसको कुछ खिला के दवा दे दी और सोने के लिए कहा ..अपने कमरे में आ कर आंटी सोचने लगी . कि हमारी यह आने वाली पीढी किस दिशा की और चल -पड़ी है ..इनका अंत इतना भयानक क्यों है ? क्यों आज पैसों कि भूख शोहरत की भूख इतनी बढ़ गई है कि हम अपना सब कुछ गंवाने को तैयार हो गए हैं ...ऐसे कई सवाल शायद जिसका जवाब वक़्त के पास भी नही है ......और कहाँ अब उसकी माँ को तलाश करे जो दुनिया के तानों से घबरा कर न जाने कहाँ गुम हो गई थी !!
उधर शिवानी कि आंखो में नींद कहाँ ? उसका रोम रोम उसको दर्द के साथ साथ गुनाह का एहसास करवा रहा था ,थोडी रात और बीतने पर वह चुपके से नर्सिंग होम से निकल कर वापस अपने घर आ गई रात धीरे धीरे ढल गई !सुबह आते ही आंटी ने जब देखा कि वो कमरे में नही हैं तो रोहित को फ़ोन किया ॥सिर्फ़ रोहित ही उसके नए घर का पता जानता था ,रोहित सुनते ही शिवानी के घर भागा ,और जब वहाँ पहुँचा तो शिवानी अब अपने हर दर्द से छुटकारा पा चुकी थी और घर में फैला सन्नाटा किसी गहरे दर्द में डूब चुका था !!

रंजना (रंजू भाटिया )

23 comments:

आभा said...

विनाश काले विपरीत बुध्दि ......तरक्की की इतनी बुरी कीमत.....

वन्दना said...

bahut hi dukhad aur bhayavah sthiti hai.

संगीता पुरी said...

बहुत दुखद, पर शिक्षाप्रद कहानी .. पर नई पीढी शायद इस कहानी से भी सीख न ले .. क्‍यूंकि उनका कहना है कि दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी .. और आप अभी तक कुंएं के मेढक बने हुए हैं !!

अनिल कान्त : said...

कहानी एक अच्छे उद्देश्य के साथ लिखी है. अच्छी कहानी बुनी है आपने. आजकल का युवा वर्ग हर कीमत पर तरक्की और पैसा चाहता है चाहे उसके लिए उसे शरीर, अपनी आत्मा ही क्यों ना बेचनी पड़े. एक सही राह और सिद्वांत इंसान को सही मंज़िल तक पहुँचाते

अर्शिया said...

बहुत ही दर्दनाक सत्य है।
वास्तव में हम जो कुछ भी अर्जित करते हैं, उसकी कीमत तो हमें चुकानी ही पडती है।

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सांसद/विधायक की बात की तनख्वाह लेते हैं?
अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद कैसे सफल होगा ?

रश्मि प्रभा... said...

बहुत ही अच्छी कहानी....जो बहुत कुछ सीखा गई

sada said...

बहुत ही सत्‍यता के साथ लिखी गई सार्थक कहानी, जिसमें युवा जगत के लिये संदेश छिपा हुआ है, बहुत ही कम समय में बहुत अधिक कामयाब होने की चाहत उन्‍हें कहां से कहां पहुंचा देती है ।

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही मार्मिक पर अपने प्रयास में सफल कहानी ......... दर्द के साथ साथ संदेश भी देती हैं ये कहानी ..............

'अदा' said...

बहुत ही मार्मिक ..आपका लेखन हमेशा की तरह सशक्त...
धन्यवाद...

महफूज़ अली said...

बहत ही मार्मिक कहानी........

Kishore Choudhary said...

संवेदनशील

कहानी बखूबी धरातल को थामे हुए बहती है. मैंने इसे पहली नज़र में ही सार्थक और प्रभावी पाया है. कुछ संवाद मन को छूते हैं गंभीर बहुत गंभीर.

अल्पना वर्मा said...

bahut badi kimat chukaaye Shivani ne---
dukhaant kahani ko aur marmik banaa gaya..
bachhon ko sahi samy par badon ke margdarshan ki bahut avshykta hoti hai lekin vinaashkale viprit buddhee ho to kya kiya jaye.

Arvind Mishra said...

ओह दुखद ! दुखांत कथा इस मामले में ठीक है की यह बहुत पावरफुल सन्देश देती है एक जीवन शैली के विरुद्ध !
मुझे तो लगा की यह यह ब्लागर की ही कथा है मगर अंत ने वहम दूर किया ! इश्वर न करें किसी बलागर का अंत वैसा हो!

rashmi ravija said...

बहुत ही मार्मिक और सशक्त कहानी
है...आज की पीढ़ी,चमक दमक,रास रंग को ही जीवन का सत्य मान बैठी है.....पर जब जीवन अपने असली रंग दिखाता है,तो उनके पास कोई रास्ता नहीं होता बच निकलने का

chandrabhan bhardwaj said...

Ranjana ji,Blogvani aaj jab khol kar dekha to apki kahani padhi is sunder kahani ke liye hardik badhai. Is kahani ke karan aaj apka blog bhi dekha usmen Amritapritam aur Imaroz ke bare men apka lekh padh kaar to man gadgad ho gaya.Isese bhi adhik prasannata aaj hui jab apake blog ki charch Indore se prakaashit dainik sasmachar patra 'Nai Duniya' men Amritapritam aur Imaroz ke sambandh me 'ajkal log tumhen mere pate par talash kar lete hain' shirshak se padane ko mili Apke blog ki charcha samachar patra men padna ek sukhad anubhuti hai. Badhai badhai badhai.
Chandarabhan Bhardwaj

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

'' परिस्थितियाँ या तो इंसान को बहुत ताक़तवर बना देती हैं या बहुत कमज़ोर!'' यह
सही कहा आपने और संग-दोष जाने क्या क्या करवाते हैं . कहानी के प्लाट में अपनी बात
आपने रखी . प्रेरणाप्रद है ये चीजें सभी के लिए . एक टीस अंत में सब पर भारी पड़ती है :
'' खटकत है जिय माहिं किये जो बिना विचारे ''
........................ सुन्दर ... ...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

ओह

गौतम राजरिशी said...

ये कहानी आपकी मैंने पहले भी पढ़ी है क्या?

कलम का प्रवाह और शिल्प दोनों लाजवाब!

निर्मला कपिला said...

बहुत देर से पढी ये मार्मिक कहानी सब ने जो कहा है सही है।इस से प्रेरणा लेनी चाहिये की घर समाज के सुख शान्ति और भविश्य के लिये ये कीमत बहुत बडी है। बहुत अच्छी कहानी बधाई

नीरज गोस्वामी said...

पता नहीं ऐसी कितनी ही शिवानियाँ बंद कमरों में दम तोड़ देती होंगी...बहुत ह्रदय विदारक कहानी...
नीरज

Mrs. Asha Joglekar said...

आपकी कहानी बहुत ही धारा प्रवाह है बावजूद इसके कि पाठक आशा के विपरीत चल रही है। यह उसे बांध कर रखने को सक्षम है । अंत दुखद है पर शिक्षाप्रद भी ।

KK Yadav said...

Gazab ki kahani. Kathya, bhav & shilp par majbut pakad.

Udan Tashtari said...

एक मार्मिक कहानी...बेहतरीन प्रवाह है.