Thursday, November 26, 2009

बंधे हुए लफ्ज़ ....


1: )आतंक के हाथ
क़ानून से ज्यादा लंबे हैं
जो ख़ास सुरक्षा मिलने पर भी
मौका मिलते ही
धमाका कर जाते हैं

और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !!




2:)सुनो ,
आज कुछ लफ्ज़ दे दो मुझे
ना जाने मेरी कविता के
सब मायने
...
कहाँ खो गये हैं?
मेरे अपने लिखे लफ्ज़ अब
ना जाने क्यों ....
बेमानी से हो गये हैं

दिखते हैं अब सिर्फ़ इसमें
विस्फोटक ,बलात्कार, भ्रष्टाचार
और कुछ डरे सहमे से शब्द
जो मुझे किसी ,
कत्लगाह से कम नही दिखते
हो सके तो दे देना
अब मुझे

विश्वास और प्यार के वो लफ्ज़
जो मेरे देश की
पावन मिटटी की

खुशबु थे कभी!!


एक सवाल आज एक साल बाद यह सब करने वाले कसाव के दिल में क्या चल रहा होगा ? क्या कुछ शर्मसार होगा ॥? या ..?

28 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

आतंक के हाथ
क़ानून से ज्यादा लंबे हैं
जो ख़ास सुरक्षा मिलने पर भी
मौका मिलते ही
धमाका कर जाते हैं
और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !!

Bahut Sundar !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !

इन चंद शब्दों में आपने बहुत कुछ कह दिया।
मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा पता नहीं ये हालात कब बदलेंगे/

महफूज़ अली said...

सुनो ,
आज कुछ लफ्ज़ दे दो मुझे
ना जाने मेरी कविता के
सब मायने...
कहाँ खो गये हैं?
मेरे अपने लिखे लफ्ज़ अब
ना जाने क्यों ....
बेमानी से हो गये हैं
दिखते हैं अब सिर्फ़ इसमें
विस्फोटक ,बलात्कार, भ्रष्टाचार
और कुछ डरे सहमे से शब्द
जो मुझे किसी ,
कत्लगाह से कम नही दिखते
हो सके तो दे देना
अब मुझे
विश्वास और प्यार के वो लफ्ज़
जो मेरे देश की
पावन मिटटी की
खुशबु थे कभी!!

in sampoorn panktiyon ne man ko chhoo liya.... bahut hi sateek aur saarthak kavita....

Regards....

"अर्श" said...

sundar rachanaa badhaayee aur naman veer saputon ko ... aaj ke din... aur shradhaanjali... sabhi satya aatma ko...


arsh

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सटीक और मार्मिक. शुभकामनाएं.

रामराम.

अजय कुमार said...

कानून व्यवस्था के हाथ छोटे भी हैं और दिशाहीन भी

अनिल कान्त : said...

जब राजनीति और राजनेता तक शर्मसार नहीं तो वो भला क्यों होने लगा

sada said...

लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !

बहुत ही मार्मिक प्रस्‍तुति सच्‍चाई बयां करती हुई रचना ।

रश्मि प्रभा... said...

सार्थक अभिवयक्ति है गहरी सोच की

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

स्वाभाविक प्रतिक्रिया को बहुत सुंदर शब्द दिए हैं यह सच्ची श्रद्धांजलि है।

M VERMA said...

दिखते हैं अब सिर्फ़ इसमें
विस्फोटक ,बलात्कार, भ्रष्टाचार
और कुछ डरे सहमे से शब्द
जो मुझे किसी ,
कत्लगाह से कम नही दिखते
कटु सत्य है ये तो और फिर शब्द भी तो सहमे हुए है
बहुत सुन्दर

Rajey Sha said...

हाथों की बात खूब की।।

श्यामल सुमन said...

और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !

बहुत कुछ न कहते हुए भी कह गयीं आप। सुन्दर।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

शरद कोकास said...

हाँ यह सवाल तो यथावत है ।

ज्योति सिंह said...

आतंक के हाथ
क़ानून से ज्यादा लंबे हैं
जो ख़ास सुरक्षा मिलने पर भी
मौका मिलते ही
धमाका कर जाते हैं
और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !!
behad khoobsurat rachna ek sanket bhavishya ki or

Priya said...

Is post to ham khoobsoorat nahi kahege .....ho haadse dil ko bhed de wo khoobsoorat nahi ho sakte aur..han kasaab ke baare mein ye hai ki jo insaan hi nahi .......wo kya sochega ?

वाणी गीत said...

जिन पर देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी है ...वो ही नहीं हैं शर्मशार तो ...कसाब क्यों होगा ...!!
लिखने वालो के हाथ बंधे है ...
क्या खूब कहा है ...!!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

bas sarkaar aise he kasab ko bachaane mein paisa kharch karti rahegi....

nice reminder...

वन्दना said...

ek prashnchinh aur koi jawab nhi...............sundar abhivyakti.

Devendra said...

विश्वाश और प्यार के लफ्ज़ हैं अभी इस पावन मिट्टी में
सिर्फ कुछ कंटीली झाड़ियाँ उग आई हैं
जिन्हें काट कर देना होगा खाद-पानी
कि फिर से लहलहा सकें
विश्वाश और प्यार के लफ्ज़
हमारी पावन मिट्टी में।
०००चिंतन के लिए विवश कर देने वाली सार्थक कविता के लिए बधाई।

Kamlesh Kumar Diwan said...

aatankbaad par achcha likha hai ,kalam
valo ke hath loktantra me peeche bandh diye gaye jese saara desh ghutna tek ki saja me ho.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

'' मेरे अपने लिखे लफ्ज़ अब
ना जाने क्यों ....
बेमानी से हो गये हैं
दिखते हैं अब सिर्फ़ इसमें
विस्फोटक ,बलात्कार, भ्रष्टाचार
और कुछ डरे सहमे से शब्द ''
..................शब्द और संवेदना के बीच आज
कैसा सम्बन्ध बचा है ? , इसको आपने
सुन्दर तरीके से रखने की कोशिश की है ...
प्यारी कविता के लिए बधाई ... ...

सुशील कुमार छौक्कर said...

गहरा और सार्थक लिखा है आपने इस दिन पर। काश कि इस दुनिया में शांति आ जाए और लोग खुशहाली से जीए।

दिगम्बर नासवा said...

आतंक के हाथ
क़ानून से ज्यादा लंबे हैं ...

YE LUKA CHIPI KA KHEL CHALTA RAHTA HAI ... AUR HAR BAAR AATAANK AAGE MIKAL JAATA HAI ...
AAPNE SACH KAHA GOLI KE AAGE HAR KOI DAR JAATA HAI ... PAR SABR KA BAANDH KABHI TO TOOTEGA ...
ACHEE RACHNA ...

Nirmla Kapila said...

हो सके तो दे देना
अब मुझे
विश्वास और प्यार के वो लफ्ज़
जो मेरे देश की
पावन मिटटी की
खुशबु थे कभी!
रंजना जी बहुत सुन्दर और भावनात्मक अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

अल्पना वर्मा said...

और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !!

bahut sateek likha hai!

हो सके तो दे देना
अब मुझे
विश्वास और प्यार के वो लफ्ज़
जो मेरे देश की
पावन मिटटी की
खुशबु थे कभी!

yahi aaj har kisi bhartiy nagarik ke man mein bhi sawaal uth raha hoga.
sthiti sudharati nazaar to anhin aati haan--umeed rakhani hi chaheye.

panchayatnama said...

आपने apne dard को shabd de diye..

Pankaj Upadhyay said...

और कुछ डरे सहमे से शब्द
जो मुझे किसी ,
कत्लगाह से कम नही दिखते
हो सके तो दे देना
अब मुझे
विश्वास और प्यार के वो लफ्ज़

वाह, विश्वास के दो लफ़्ज़ ही चाहिये जीने के लिये....