Monday, November 02, 2009

बदली हुई फ़िज़ा


बदली हुई रुत ..
बदली हुई फिजा ..
जाग रही है ...
दो रूहों की
एक ही हलचल
मद्धम मद्धम ..

रात की गहरी चुनरी ओढे
चाँद भी मुस्कराया ..
और .............
लबों पर तैरता
चाँदनी के मुख पर
वो हल्का सा तब्बसुम
या फ़िर रुकी हुई है
कोई शबनम की बूंद ..

परियों के अफ़साने हैं
या फ़िर से कोई सपना
उतर आया है ..
मेरी आँखों में ..
वह खामोशी ...
अब फ़िर से
जागने लगी है
जिसे बरसों पहले
थपकी दे के सुलाया था !!

रंजना (रंजू ) भाटिया
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