Monday, December 08, 2008

बिखरे बिम्ब .[.नाटक ]


थिएटर की दुनिया हमेशा मुझे अपनी और आकर्षित करती है ..जो भाव, जो वाक्य उस में बोले गए और उसको करते किरदार जैसे अपने ही बीच में कुछ कहते सुनते प्रतीत होते हैं ..और वह आसानी से भुलाए नहीं जा सकते हैं ..और वह लिखा गया गिरीश कर्नाड का हो और उस के लिखे किरदार को सुषमा सेठ निभा रही हो तो मजा दुगना हो जाता है ..शनिवार की शाम इंडिया हेबिटेट सेंटर के निकट बिखरे बिम्ब देखने का मौका मिला ...गिरीश कर्नाड द्वारा लिखित और निर्देशित राजिंदर नाथ ने बिखरे बिम्ब इस नाटक ने शुरू से अंत तक अपने साथ बांधे रखा ..ख़ुद के साथ बात चीत करते हुए झूठ को सच की तरफ ले जाते हुए इसको "सुषमा सेठ "और" रश्मि वेदलिंगम "ने बहुत अच्छे से प्रस्तुत किया है

.नाटक की मुख्य पात्र मंजुला नायक[ सुषमा सेठ ] एक बहुत सफल कन्नड़ लघु कहानी लेखक नहीं है. पर अचानक, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी में एक उपन्यास लिख कर बहुत प्रसिद्ध अमीर लेखिका बन जाती है. और जब मिडिया उस से सवाल करती है कि उसने कन्नड़ भाषा को छोड़ कर इंग्लिश भाषा में क्यों लिखा ....यह अपनी भाषा के साथ गद्दारी है .दूसरा सवाल यह कि वह ख़ुद पूर्ण रूप से स्वस्थ है पर उसने कैसे एक बिस्तर पर पड़ी बीमार औरत के बारे में इतनी बारीकी से कैसे लिखा है ...मंजुला बताती है कि उसने यह पीड़ा अपनी बहन की जो बहुत बीमार रहीं वह अपने अन्दर तक महसूस की है इसी वजह से वह उसको लिख पायी और रहा सवाल कि अंग्रेजी में क्यों लिखा ..तो वह ख़ुद बा ख़ुद उसी भाषा में लिखता गया ..उसको भी नही पता कि किस तरह वह इतनी सहजता से इसको लिखती गई .....
अपने सवालों का जवाब दे कर वह जाने लगती है तो तभी उसके अन्दर की आवाज़ उस से कुछ सवाल पूछती है .और यही सवाल जवाब का सिलसिला जैसे ख़ुद बा ख़ुद सब सच बुलवा देता है .अपने से रूबरू का अभिनय रश्मि वेदलिंगम ने बखूबी निभाया है .. कर्नाटक में एक छोटे सा अज्ञात चेहरे ने कैसे , एक अंतरराष्ट्रीय छवि का अधिग्रहण कर लिया है और वह किस तरह से ख़ुद अपने से रूबरू होती है जब सच से वाकिफ होती है ..तब वह जान पाती है कि यह शोहरत तो उसने पा ली पर अपना घर .अपना पति वह खो चुकी है ...एक एक भाव जैसे हम अपने सामने देखते हैं ....दोनों पात्र अलग अलग दिखते हुए भी एक दूजे के बिम्ब दिखते हैं ..

अंत क्या होता है वह आप ख़ुद नाटक देख कर जाने ..सुषमा सेठ .रश्मि ने अपने चरित्र के साथ पूरा न्याय किया है ..सिर्फ़ हाथो और आंखों में आए भावों से पूरा दृश्य जैसे सामने देखने वालों के लिए साकार कर दिया है ..बहुत दिनों के बाद एक अच्छा नाटक देखने को मिला ..
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