Monday, October 20, 2008

उद्धव ज्ञान


छुआ है अंतर्मन की गहराई से
कभी तुम्हारी गरम हथेली को
और महसूस किया है तब
बर्फ सा जमा मन
धीरे धीरे पिघल कर
एक कविता बनने लगता है
देखा है कई बार तुम्हारी आंखों में
सतरंगी रंगो का मेला
मेरी नज़रों से मिलते ही वह
सपने में ढलने लगता है
तब ......
यह भी महसूस किया है दिल ने मेरे
कि उलझी अलकों सी ,उलझी बातें
कुछ और उलझ सी जाती है
प्रेम के गुंथे धागे में
कुछ और गांठे सी पड़ जाती है
खाली सा बेजान हुआ दिल
और रिक्त हो जाता है
दिल के किसी कोने में
ख़ुद से ही संवाद करता
मन उद्धव ज्ञान पा जाता है !!
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