Monday, July 07, 2008

भेजा फ्राई एक समीक्षा ...

दिल्ली की एक उमस भरी शाम ..और घर जब ख़ुद को ही अजनबी लगे तो कहीं बाहर निकल जाना चाहिए ..अक्लमंद लोग ऐसा ही करते हैं और यही मैंने भी किया .:).दिल्ली का लोधी गार्डन के पास है एम् एल भारतीय आडोटोरियम एलाइंस फ़्रेन्साइस ..यहाँ पर एक नाटक भेजा फ्राई हिन्दी कामेडी प्ले हो रहा है यह जब पता लगा तो उसी तरफ़ का रुख कर लिया ...और सही में एक उमस भरी शाम हँसते हँसते बीत गई ...यह नाटक निर्देशित किया है अनिल शर्मा ने इसको लिखा है शंकर जी ने .. इस में काम करने वाले कलाकार सभी कलाकार अपनी भूमिका में अच्छे लगे

.नाटक शुरू होता है एक नेता के जन्मदिन से जहाँ कुछ कवि कवियत्री इस शुभ अवसर पर कविता पाठ के लिए आए हैं पर अभी इस कवि सम्मलेन की शुरुआत भी नही हुई होती और ख़बर आ जाती है कि नेता जी नही रहे ..हर कवि अपने अपने दर्द को कविता में पिरो के सुना ही रहा होता है कि कितने पैसे खर्च हो गए इस सम्मलेन के लिए कि तभी खबर आती है कि झूठी अफवाह थी नेता जी जिंदा है और तभी एक मिडिया का जर्नलिस्ट इस झूठी अफवाह फैलाने पर सरकार तक गिराने कि धमकी देता है ..फ़िर कहानी आती है स्टेज पर एक ऐसे परिवार की . जहाँ घर का हर सदस्य ख़ुद को बहुत बड़ा कवि मानता है उस घर में १०५ साल के साद दादा जी भी कवि और कहानी कार हैं और पड़दादा उस से भी बड़े कवि जो रोज़ सपना देखते हैं कि उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल रहा है और इस के लिए बाकयदा घर का हर सदस्य पूरी तेयारी के साथ रहता है कैमरा माला और पुरस्कार सब उल्ट पुलट रखे जाते हैं पर पड़ दादा जी कि एक आवाज़ पर सब हाजिर हो जाते हैं दादाजी जीवन दर्शन को कविता के रूप में सुनाने कि कोशिश में लगे रहते हैं तो बेटा विश्वनाथ और कृष्ण के साथ बेटी कविता और बहू जिसकी चाय .स्वेटर सब कागज पर कविता के रूप में बनते हैं और वह दोनों भी ख़ुद को किसी बड़े कवि से कम नही समझते हैं ....और तो और घर का नौकर और उसका साला भी कमाल के कवि है ..जो रोज़ ताज़ा गजल साबुन के रैपर पर उतरा करते हैं ।:). ..पर गनपत घर के नौकर कि एक कविता उस वक्त भावुक कर देती है जब बस पर एक बूढी औरत के बिना टिकट होने पर वह कहती है कि बस में ३५ किलो बोझ ले जाना मुफ्त होता है और वह आगे बैठे अपने बेटे का बोझ है इसलिए उसका टिकट नही लग सकता ...सबसे छोटा कवि निराला है जो कविता करने में अपने बडो से पीछे नही है ..सबसे अच्छा रोल अदा किया है पडदादा और साद दादा जी ने ...बहुत ही सहज अभिनय है जो हँसने मजबूर कर देता है ..असली मजा तब आता है जब घर में मेहमान के आ जाने से सब बेहद खुश हो जाते हैं कि अब कोई तो मिला जिसको वह अपनी कविता सुना सकते हैं ...और कविता सुन सुन कर उस मेहमान का क्या हाल हो जाता है यह आप ख़ुद जा कर देखियेगा :)

नाटक और कलाकार सभी ने अपने अपने पात्र के साथ न्याय किया है ..पर सरला जो विश्वनाथ की पत्नी है उसका यूँ हर वक्त पान से भरे मुहं से कविता पाठ करना या बोलना असज सा लगता है ...कविता बनी लड़की के लिए ज्यादा कुछ कहने को है ही नही ..घर आए मेहमान के रूप में सत्यप्रकाश कहीं कहीं एक दम से भावहीन हो जाते हैं जैसे अपने चरित्र से बाहर आ गए हो ..शायद इसकी वजह अंत को ज्यादा खींच देना भी हो .नाटक वही तक दर्शकों को बांधे रखता है जब तक उस में बार बार बात को दोहराया न जाए .या वह रोचक ढंग से हो .जैसे साद दादा जी और पडदादा जी का बार बार उसी बात को दोहारना हर देखने वाले दर्शक बहुत ही मजे से देखता है और हँसता भी दिल से है .मेक अप .साज सजा प्रकाश व्यवस्था अच्छी की गई है .एक अच्छा नाटक है जिसको देखा जा सकता है
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