Thursday, May 08, 2008

मीना कुमारी [मेरी तरह संभाले कोई दर्द तो जानूँ ]



मीना कुमारी एक नाम जो किसी की पहचान का मोहताज नही है ..अमृता जी की तरह मैं इनकी भी बहुत बड़ी फेन रहीं हूँ ..कहते हैं कि जब इनका इंतकाल हुआ हिन्दुस्तान के कई घर में उस दिन चूल्हा नही जला था ..उस में एक घर हमारा भी था मेरी माँ इनकी बहुत बड़ी फेन थी तब मैं बहुत छोटी थी पर माँ रो रही थी कुछ ख़बर सुन के यह आज भी याद है ..और सारा दिन उदास रही थी ..फ़िर कुछ बड़े होने पर किताबे पढने के कीडे ने मुझे काट लिया और सबसे अधिक रूचि मुझे आत्मकथा पढने में थी ..तभी अमृता की रसीदी टिकट और मीना कुमारी के बारे में किसी का लिखा हुआ पढ़ा ..और फ़िर तब से सिलसिला चल पढ़ा इन दोनों के बारे में जहाँ लिखा हुआ मिलता उसको जरुर पढ़ती ..इनकी सारी फिल्म्स भी देखी और फ़िर अमृता की तरह यह भी मेरे दिलो दिमाग पर चा गई ..अमृता के बारे में जब भी मैंने लिखा आप सब ने उसको प्यार से पढ़ा और सराहा .इन हस्तियों के बारे में जितना लिखा जाए उतना ही कम है ..अमृता के बारे में बहुत कुछ लिख के भी अधूरा रह गया है अभी उनकी लिखी किताबो की बात तो मैंने की ही नही .उसको मैं कुछ विराम के बाद फ़िर से शुरू करुँगी ..पर इस पहली कड़ी से मैं मीना जी के जीवन के बारे में जो पढ़ा वह एक श्रृंखला के रूप में लिखने जा रही हूँ ...उनके चाहने वाले आज भी होंगे और मुझे उम्मीद है की नई पीढ़ी भी इस नायाब अदाकारा के कई पहलुओं से वाकिफ हो कर इनकी दीवानी हो जायेगी ..आखिर यह कला ..साहित्य के वह नायाब हीरे हैं जिनके बारे में जितना लिखा जाए पढ़ा जाए वह कम ही मालूम होता है



हर दर्द को यूं जीती थी जैसे यह उसके ऊपर बीता हो ..और हर भूमिका को एक यादगार जीती जाती भूमिका बना देती थी बेहद भावुक सदा दूसरों का दुःख बांटने वाली इस महान हस्ती का नाम था मीना कुमारी .अपने जीवन से जिसे कभी मोह नही रहा
उस जैसी भावुक अदाकारा को बन्धन में बंधाना बहुत कठिन था तभी तो डॉ के मना करने के बावजूद वह पान जर्दा और शराब नही छोड़ पाती थी और न ही उन्होंने कभी दौलत की परवाह की जितनी दौलत थी सब लुटा दी ..धीरे धीरे मीना की सिर्फ़ रूह रह गई ...और उनको याद करते हुए जहन में रह गया पाकीजा का वह गाना इन्ही लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा ..सच में जिसके हाथ जो लगा वह उनसे वह लुट के ले गया फ़िर भी उन्होंने कभी किसी को दोष नही दिया ..

उन्होंने बालपन से ही फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था सन् १९४2 में बाल कलाकार के रूप में काम करती रही और सन् १९६ में १४ साल की आयु में महजबी मीना कुमारी का असली नाम में पहली बार बच्चो का खेल में नायिका बनी और यहीं से मीना कुमारी कहलाने लगी ..मीना कुमारी बनने के कुछ ही दिनों बाद माँ की मौत ने उन्हें एकांत में ला कर खड़ा कर दिया ..फ़िर बड़ी बहन खुर्शीद और छोटी बहन माधुरी ने भी विवाह कर लिया वह बिल्कुल तनहा रह गई ..

फ़िर १950 में अनार कली बनने की बात हुई और इसी सिलसिले में उनकी मुलाक़ात कमाल अमरोही से हुई इसी फ़िल्म की बात चीत के बीच एक बार पुणे से आते हुए मीना कुमारी की कार का एक्सीडेंट हो गया वहाँ सब मीना से मिलने पहुंचे उन में कमाल अमरोही भी थे वह उनके पास वही हॉस्पिटल में काफ़ी देर बैठे रहे ..दोनों में कोई कुछ नही बोल रहा था तभी मीना की नज़र उठी कमाल अमरोही की तरफ़ नही बलिक मौसमी के उस गिलास की तरफ़ जिसे वह कमजोरी के कारण उठा के पी नही पा रही थी .तब कमाल ने अपने हाथो से वह मौसमी का रस उन्हें पिलाया और यह मुलाकाते फ़िर बदती गई यही पर कमाल ने मीना के सामने शादी का प्रस्ताव रखा मीना भी यही चाहती थी फ़िर २४ मई १९५२ को मीना ने कमाल से शादी कर ली चुपके से ..कमाल अमरोही ने उन्हें एक छोटा सा नाम दिया मंजू और मीना ने उन्हें नाम दिया चन्दन ...आनार कली तो बन नही सकी पर उसके बाद कई फिल्म बनी और वह कामयाब रही मीना कुमारी ने कमाल अमरोही से बेपनाह मोहब्बत की थी पर वह विवाह के सिर्फ़ दो वर्षों को ही जन्नत कहा करती थी ..कमाल साहब ख़ुद बहुत बड़े फिल्मकार थे पर मीना के नाम के बगैर उनका परिचय पूरा नही होता था ..यही कमाल के दुःख का बहुत बड़ा कारण था और यही उनके विवाह के टूटने का कारण भी बना .
पति के प्यार से महरूम मीना ने बाहर प्यार तलाश करना शुरू किया एक रिश्ते की चाहत ने कई लोग उनकी ज़िंदगी में आए सबने उन्हें धोखा दिया उन्हें मिला तो सिर्फ़ दुःख और दर्द हर रिश्ते से ..मीना जी के कराबी लोगो में आज भी कई लोग मौजूद हैं जो आज मीना जी की वजह से कामयाब जाने जाते हैं ..



टुकड़े टुकड़े दिन बीता
धज्जी धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था
उतनी ही सौगात मिली

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मेरी तरह संभाले कोई दर्द तो जानूँ
एक बार दिल से हो कर परवर दीगार गुजर !

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मीना कुमारी


शेष आगे अगली कड़ी में ...

15 comments:

शोभा said...

रंजू जी
आपने इस बार फिर एक संवेदन शील कलाकारा से मिलवाया। आपका अध्ययन प्रशंसनीय है। मीना कुमारी की गज़लें मैने भी पढ़ी हैं पर इतना अधिक जानकारी आज ही मिली है। बधाई स्वीकारें ।

Abhishek Ojha said...

मीनाजी के बारे में इतनी जानकारी के लिए शुक्रिया !

पारुल "पुखराज" said...

वाह रंजू दी, मज़ा आ गया-गुलज़ार के बोल है न मीना जी के लिये-
" लगता है,दुआ में थीं। दुआ खत्म हुई,आमीन कहा,उठी,और चली गई। जब तक ज़िन्दा थीं,सरापा दिल की तरह ज़िन्दा थी । दर्द चुनती रहीं----"

Anonymous said...

न इंतजार, न आहट,न तमन्ना, न उम्मीद
जिंदगी है कि यू बेबस हुई जाती है।
रंजू जी
मै भी अपने ब्लोग पर मीना जी याद करने वाला था खैर आप ने शुरुआत की है तो मन को अच्छा लगा। आप शायद मेरे से ज्यादा अच्छे तरीके से उन्हें याद कर सकती है।
मै भी अमृता जी और मीना जी का बडा फैन हूँ मैने तो अपनी पाकेट मनी से पैसे बचा बचा कर अमृता जी को पढा है। एक बार मिला भी था। इन्होने ही मुझे किताबो का रसिक बनाया।

डॉ .अनुराग said...

अच्छा लगा आपने मीना जी दो बेहतरीन रचनाये चुनी ...उनके जीवन से इसलिए वाकिफ हूँ ..की मई जिन दो आदमियों का फेन रहा हूँ वो उनसे काफी हद तक जुड़े रहे है ,गुलज़ार साहब ओर धर्मेन्द्र ...अलबत्ता धर्मेन्द्र को लेकर कई विवाद है..पर यही जीवन है ...यहाँ अलग अलग खानों मी इन्सान जुदा जुदा दिखता है .....आपकी अमृता ओर इमरोज की पुरी सीरीज़ मैंने पढी है.......मेरे कोल्लेक्शन मे मीना जी दो ही मूवी है "मेरे अपने "ओर पाकीजा .......बहुत कम लोग उनके लिखने के इस अंदाज से वाकिफ है......आपका काम सराहनीय है......अगली कड़ी के इंतज़ार मे......

नीरज गोस्वामी said...

रंजू जी
मेरी बहुत ही पसंदीदा अदाकारा का जिक्र किया है आप ने. मधुप शर्मा जी ने अपनी पुस्तक "आखरी अढ़ाइ दिन" में उनके जीवन के त्रासद क्षणों को बहुत संवेदन शील भाषा में लिखा है. ये पुस्तक हर मीना कुमारी के चाहने वाले को पढ़नी चाहिए.
नीरज

आलोक साहिल said...

आगाज तो होता है अंजाम नहीं होता,
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता.
मैं सही हूँ शायद,
.....एक और ट्रेजेडी क्वीन.बहुत खूब,अच्छा लगा अमृता के बाद,मीना,......................रंजू.
हा हा हा ..........
आलोक सिंह "साहिल"

Sanjeet Tripathi said...

बहुत बढ़िया!!
आज ही कहीं पढ़ा कि निदा फाज़ली साहब ने कुछ दिन पहले ही एक उर्दू रिसाले में कमाल अमरोही पर एक लेख लिखा, जिसकी कुछ बातों के आधार पर अमरोही साह्ब की बेटी ने उन पर केस दायर कर दिया है।

Anita kumar said...

रंजना जी मीना कुमारी के तो हम भी दिवाने रहे हैं इस हद तक की सहेलियां चिढ़ाती थी। उनके बारे में जो आप ने बताया उसमें से काफ़ी कुछ जानती थी, सिर्फ़ ये नहीं पता था कि कमाल अमरोही उन पर हाथ भी उठाता था। आगे की कड़ी का इंतजार है।

Udan Tashtari said...

बहुत आभार इस जानकारी के लिए. मीना कुमारी जी बारे हल्की फुल्की ही जानकारी थी.

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आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.

शुभकामनाऐं.

-समीर लाल
(उड़न तश्तरी)

masoomshayer said...

agaz bahut achha hai meena jee ko jan ne wal kayee hain samjhne wale kam hain mumkin hai is ko padh ke kcuh aur log samjhne lahyen

ANil

रंजू भाटिया said...

आप सब ने इतने उत्साह से और प्यार से इसको पढ़ा शुक्रिया ...शोभाजी ,अभिषेक जी .सुशील कुमार जी आपका स्वागत है यहाँ आप के पास कोई जानकारी हो तो जरुर इस श्रृंखला में हमारे साथ बांटे ...पारुल जी बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ शामिल की है आपने इस में सही लिखा है ...की वो दर्द ही चुनती रही ..अनुराग जी .सही कहा आपने ज़िंदगी अपने कई रंग दिखाती है ..नीरज जी जरुर यह किताब मैं पढ़ना चाहूंगी ..आज से ही इसकी खोज शुरू कर देती हूँ :) अलोक जी बहुत खूब पंक्तियाँ लिखी आपने शुक्रिया
संजीत जी आज आप बहुत दिनों बाद यहाँ दिखे शुक्रिया ..अनिता जी मैंने भी सिर्फ़ लिखा हुआ पढ़ा है अब यह कितना सच है कितना झूठ यह लिखने वाला जाने या इसको भोगने वाला जाने ..पर उनका जीवन दर्द से भरा हुआ ही रहा यह तो सब जानते हैं ...समीर जी आगे भी यूं ही साथ रहे ..और अपने बहुमूल्य विचार देते रहे :) धन्यवाद

Asha Joglekar said...

बढिया पोस्ट ।

स्वप्न मञ्जूषा said...

हम कुछ नहीं कह पायेंगे आपके लेख की तारीफ में....
मीना जी की तस्वीर नजर आती है और एक शेर याद आ जाता है..
पहले रग-रग से मेरी खूँ निचोड़ा उसने
अब वो कहता है की रंगत ही मेरी पीली है....
हम जब भी मरें सबसे पहले उनसे ही मिलना चाहेंगे.....

रतन प्रकाश said...

बहुत सुन्दर, अगली कड़ी का इंतज़ार