Wednesday, March 14, 2007

उनके बिना ****


दिन वीराना था ,रात मेरी सुनसान थी
बोझील सी बह रही कुछ हवा भी आज थी

दिल को यह ज़िद थी की तू आ जाए ख्वाबो में
और आँखो में तेरे बिना नींद न आने की आस थी

देर तक आँखो में चुभती रही तारों की रोशनी
न तुम आए न ही मेरे पास ख़वाबों की बारात थी

सुलगता रहा मेरा तन-मन तेरी यादों से
तरस गया दिल तेरे एक झलक को, बस इतनी सी बात थी

बहुत दूर से एक आवाज़ देती रही सदा मुझको
शायद यह मेरी रूठी हुई नींदों की बरसात थी!!


ranju
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