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Wednesday, August 31, 2022

एक मुलाकात अमृता के इमरोज़ से

 



आज ३१ अगस्त है

 ३१ अगस्त है ...अमृता जन्मदिन तुम्हे मुबारक ....हर जन्मदिन पर लगता है क्या लिखूं तुम्हारे लिए ...सब कुछ कह के भी अनकहा है वक़्त बीत रहा है ...तलाश जारी है खुद में तुमको पाने की ..तुम जो .मेरे प्रेरणा रही ..मेरी आत्मा में बसी मुझे हमेशा लगा जैसे जो प्यास .जो रोमांस ,जो इश्क की कशिश तुम में थी वह तुमसे कहीं कहीं बूंद बूंद मुझ में लगातार रिस रही है ...इमरोज़ भी एक ही है और अमृता भी एक थी ..पर ..फिर भी अमृता तुम्हारे लिखे ..को पढ़ के ...अमृता तुम्हारी तरह जीने की आस टूटती नहीं ..जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक अमृता


कुछ वक्त पहले इमरोज़ से हुई बातचीत  कई जगह पब्लिश भी हुई थी  

पूरी बात चीत सुनने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें 

एक मुलाकात अमृता के इमरोज़ से


रंजू भाटिया) जी ने अपने ब्लाग ‘अमृता प्रीतम की याद में…….’  इमरोज से हुयी बातचीत का एक हिस्सा प्रस्तुत किया था जिसमें उन्होंने यह सवाल किया था इस घर में अमृता का कमरा बाहर तथा इमरोज का कमरा अंदर क्यों है? इस पर इमरोज के द्वारा दिया गया उत्तर अमृता के प्रति इमरोज के लगाव का जो चित्र खींचता है वह अद्वितीय हैः-


 ‘मैं एक आर्टिस्ट हूं और वह एक लेखिका पता नहीं कब वो लिखना शुरू कर दे और मैं पेंटिंग बनाना। इतना बडा घर होता है फिर भी पति पत्नी ऐक ही बिस्तर पर क्यों सोते हैं ? क्योंकि उनका मकसद कुछ और होता है। हमारा ऐसा कुछ मकसद नहीं था इसलिये हम अलग सोते थे। सोते वक्त अगर मैं हिलता तो उसे परेशान होती और अगर वह हिलती तो मुझे । हम एक दूसरे को कोई परेशानी नहीं देना चाहते थे। आज शादियां सिर्फ औरत का जिस्म पाने के लिये होती हैं । मर्द के लिये औरत सिर्फ सर्विग वोमेन है कयांेकि वह नौकर से सस्ती होती है। एसे लोगों को औरत का प्यार कभी नहीं मिलता। आम आदमी को औरत सिर्फ जिस्म तक ही मिलती है प्यार तो किसी किसी को ही मिलता है। औरत जिस्म से बहुत आगे है , पूरी औरत उसी को मिलती है जिसे वो चाहती है।’


अमृता के प्रति इमरोज के इस गहरे भावनात्मक लगाव की तह में जाकर उस दिन की पडताल करने पर रंजना (रंजू भाटिया) जी को वह दिन भी दिखलाई पडा जब इमरोज ने अपना जन्मदिवस अमृता जी के साथ मनाया था। इस दिन को याद करते हुये इमरोज ने कहाः-


‘ वो तो बाइ चांस ही मना लिया। उसके और मेरे घर में सिर्फ एक सड़क का फासला था । मै उससे मिलने जाता रहता था। उस दिन हम बैठे बातें कर रहे थे तो मैने उसे उसे बताया कि आज के दिन मैं पैदा भी हुआ था। वो उठकर बाहर गयी और फिर आकर बैठ गई। हमारे गांव में जन्मदिन मनाने का रिवाज नहीं ,अरे पैदा हो गये तो हो गए, ये रिवाज तो अंग्रेजो से आया है। थोडी देर के बाद उसका नौकर केक लेकर आया। उसने केक काटा थोडा मुझे दिया और थोडा ख्ुाद खाया । ना उसने मुझे हैप्पी बर्थडे कहा और ना ही मैने उसे थैक्यू। बस दोनो एक दूसरे को देखते और मुस्कुराते रहे ।’


बस इसी तरह एक दूसरे को देखकर मुस्कुराना और बिना कुछ भी कहे सब कुछ कह जाने वाली भाषा के साथ जीने वाली अमृताजी आज हमारे बीच न हों लेकिन इस बात से इमरोज को कोई फर्क नहीं पडता क्योकि उनका मानना है कि वे उनके साथ तो आज भी हैं ना।

Sunday, June 19, 2022

खत अमृता के बच्चों के नाम भाग एक

 खिड़कियां... यह वो संग्रह है जिसमे सोवियत रूस से प्यारे से खत नवराज़ और कंदला दोनो बच्चों को लिखे गए हैं। बेहद खूबसूरत अंदाज में अमृता द्वारा..



खत बच्चों के नाम भाग एक 


https://youtu.be/WQdPH7ER4jQ

मेरे प्यारे बच्चों,

तुमने बचपन में यह कहानी तो सुनी होगी कि एक थी शहजादी। उसे किसी दुरात्मा का श्राप लग गया था और वह सौ बरस सोई रही। फिर एक दूर देश का शहजादा आया ,और उसने जादू की छड़ी से उस शहजादी को जगा लिया। मैं तुम्हे आज जिस घाटी से पत्र लिख रहीं हूं इस घाटी की कहानी भी उस परी जैसी है।


आगे पूरा ख़त सुनिएगा मेरी आवाज़ में इस लिंक में .. रोचक पत्र हैं यह अमृता के बच्चों के नाम । आज समझिए इसका यह पहला भाग है आगे सिलसिला जारी रहेगा। 

चैनल को लाइक और सब्सक्राइब करना ना भूलें ,ताकि आगे के पत्र आपको भी नवराज और कंदला के साथ मिलते रहें।

https://youtu.be/WQdPH7ER4jQ


Monday, June 13, 2022

कोई इंसान नज़र आए तो बुलाओ उसको



इक ऐसी किताब के पन्ने से लिए शब्द ,जो आज के वक्त की भी सच्चाई ब्यान करते हैं, आज का सब माहौल देख कर समझ में नहीं आ रहा कि हम आगे बढ़ रहे हैं विकास की तरफ या फिर से बंटवारे के वक्त की तरफ लौट रहे हैं...

 https://youtu.be/sSa1_mabHJk


पत्थर तो पत्थर है ,वो ग़लत हाथो में आ जाए तो किसी का जख्म बन जाता है ,किसी माइकल एंजलो के हाथ में आ जाए तो हुनर का शाहकार बन जाता है , किसी का चिंतन उसको छू ले तो वह शिलालेख बन जाता है ।वो किसी गौतम को छू ले तो व्रजासन बन जाता है .और किसी की आत्मा उसके कण कण को सुन ले तो वह गारेहिरा बन जाता है ।


इसी तरह अक्षर अक्षर है ..
उस को किसी की नफरत छू ले तो वह एक गाली बन जाता है ,वो किसी आदि बिन्दु के कम्पन को छू ले तो कास्मिक ध्वनि बन जाता है। वो किसी की आत्मा को छू ले तो वेद की ऋचा बन जाता है ,गीता का श्लोक बन जाता है ,कुरान की आयत बन जाता है ,गुरु ग्रन्थ साहिब की गुरु वाणी बन जाता है ।


और इसी तरह मजहब एक बहुत बड़ी संभावना का नाम है ।  वह संभावना किसी के संग हो ले तो एक राह बन जाती है । कास्मिक चेतना की बहती हुई धारा तक पहुँचने की और हर मजहब की जो भी राहो रस्म है -वो एक तैयारी  है  जड़  में से चेतना को जगाने की ।


   चेतना की पहचान "मैं "के माध्यम से होती है और मजहब उस "मैं "को एक जमीन देता है , खडे होने की वह उसको अपने नाम की पनाह देता है । लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ी संभावना होते होते रह जाती है । मजहब में कोई कमी नही आती है ,कमी आती है इंसान में और मजहब लफ्ज़ की तशरीह करने वालों में ।


जब बहती हुई धारा को रोक लिया जाता है ,थाम लिया जाता है तो वो पानी एक जोर पकड़ता है .उस वक्त इंसान को एक ताकत का एहसास होता है .लेकिन यह ताकत चेतना की नहीं अहंकार की होती है । कुदरत पर भी फतह पाने की जिद बढ जाती है ,तब यह अहंकार  की ताकत नफरत .और कत्लो खून में बदल जाती है ।


दुनिया के इतिहास का हर मज़हब के  नाम पर खून कत्लो आम हुआ है ..और हम इल्जाम देते हैं मज़हब को इसलिए कि कोई इल्जाम हम अपने पर लेना नही चाहते हैं ।हम जो मजहब को अपने अन्तर में उतार नही पाते हैं | मजहब को अन्तर की क्रान्ति है स्थूल से सूक्ष्म हो जाने की और हम इसको सिर्फ़ बाहर से पहनते हैं । सिर्फ़ पहनते ही नहीं बल्कि दूसरों को भी जबरदस्ती पहनाने की कोशिश करते हैं ।

हमारी दुनिया में वक्त -वक्त पर कुछ ऐसे लोग जन्म लेते हैं -जिन्हें हम देवता ,महात्मा ,गुरु और पीर पैगम्बर कहते हैं । वह उसी जागृत चेतना की सूरत होते है ,जो इंसान से खो चुकी है । और हमारे पीर पैगम्बर इस थके हुए ,हारे हुए इंसान की अंतर चेतना को जगाने का यत्न करते हैं लेकिन उनके बाद उनके नाम से जब उनके यत्न  को संस्थाई रूप दे दिया जाता है तो उस वक्त वह यात्रा बाहर की यात्रा हो जाती है वह हमारे अंतर की यात्रा नही बन पाती है ।

आज हमारे देश के जो हालात है वह हमारे अपने होंठों से निकली हुई एक एक भयानक चीख हैं और हम जो टूटते चले गए , हमने इस चीख को भी टुकडों में बाँट लिया हिंदू चीख ,सिख चीख ,मुस्लिम चीख कह कर इस चीख का नामाकरण हुआ । इसी से जातिकरण हुआ और पंजाब बिहार ,गुजरात  बंगाल कह कर इस चीख का प्रांतीयकरण हुआ ।


पश्चिम में एक सांइस दान हुए हैं लेथ ब्रेज। उन्होंने पेंडुलम की मदद से जमीनदोज शक्तियों की खोज की ,और अलग अलग शक्तियों की पहचान के दर नियत किए   उन्होंने पाया कि...

१० इंच की दूरी से  जिन शक्तियों का संकेत मिलता है ,वह सूरज अगनी लाल रंग सच्चाई और पूर्व दिशा है ..

२० इंच की दूरी से धरती ज़िन्दगी गरिमा सफ़ेद रंग और दक्षिण दिशा का संकेत मिलता है ..

३० इंच की दूरी से आवाज़ ,ध्वनि ,चाँद ,पानी हरा रंग और पश्चिम दिशा का संकेत मिलता है

और ४० इंच की दूरी से जिन शक्तियों का संकेत मिलता है वह मौत की ,नींद की झूठ की ,काले रंग की और उत्तर दिशा की शक्तियां  है.


यही लेथ ब्रेज थे जिन्होंने उन पत्थरों का मुआइना किया जो कभी किसी प्राचीन ज़ंग में इस्तेमाल  हुए थे   और उन्होंने पाया  कि उन पत्थरों  पर नफरत और लड़ाई   झगडे के आसार इस कदर उन पर अंकित हो चुके थे कि  उनका  पेंडुलम ,वही दर नियत कर रहा था --जो उसके मौत का किया था ..

हमारे प्राचीन  इतिहास में एक नाम मीरदाद का आता है , वक्त का यह सवाल तब भी बहुत बड़ा होगा कि ज़िन्दगी से थके हुए , हारे हुए कुछ  लोग मीरदाद के पास गए तो मीरदाद ने कहा --हम जिस हवा में साँस लेते हैं ,क्या आप उस हवा को अदालत में तलब कर सकते हैं ? हम लोग इतने उदास क्यूँ हैं ? इसकी गवाही तो उस हवा से लेनी होगी ,जिस हवा में हम साँस लेते हैं और जो हवा हमारे ख्यालों के जहर में भरी हुई है ..

लेथ ब्रेज ने आज साइंस की मदद से हमारे सामने रखा  है कि हमारे ही ख्यालों में भरी हुई नफरत ,हमारे ही हाथो हो रहा कत्लोआम  और हमारे ही होंठों से निकला हुआ जहर ,उस हवा में मिला हुआ है ,जिस हवा में हम साँस लेते हैं .और वही सब कुछ हमारे घर के आँगन में ,हमारी गलियों में ,और हमारे माहौल की दरो दिवार पर अंकित हो गया है ।
और आज हम महाचेतना के वारिस नहीं ,आज हम चीखों के वारिस है ।आज हम जख्मों के वारिस हैं ।आज हम इस सड़कों पर बहते हुए खून के वारिस हैं। उन्ही की लिखी और मेरे द्वारा पढ़ी यह नज़्म आज सच के बहुत करीब है.. सुनिएगा और चैनल को सब्सक्राइब जरूर करिएगा । अग्रिम धन्यवाद 


https://youtu.be/sSa1_mabHJk


प्रस्तुती रंजू भाटिया


Friday, June 10, 2022

उठो वारिस शाह कब्रों से ...

 बहुत पहले की एक घटना याद आती, जब मां थी, और जब कभी मां के साथ उनके गांव में जाना होता, स्टेशनों पर आवाज़ें आती थीं-हिंदू पानी, मुसलमान पानी, और मैं मां से पूछती थी-क्या पानी भी हिन्दू मुसलमान होता है ?-तो मां इतना ही कह पाती-यहां होता है, पता नहीं क्या क्या होता है...

फिर जब लाहौर में, रात को दूर -पास के घरों में आग की लपटें निकलती हुई दिखाई देने लगीं, और वह चीखें सुनाई देतीं जो दिन के समय लंबे कर्फ्यू में दब जाती थीं...पर अखबारों में से सुनाई देती थीं-तब लाहौर छोड़ना पड़ा था...

थोड़े दिन के लिए देहरादून में पनाह ली थी-जहां अखबारों की सुर्खियों से भी जाने कहां-कहां से उठी हुई चीखें सुनाई देतीं...रोज़ी-रोटी की तलाश में दिल्ली जाना हुआ-तो देखा-बेघर लोग वीरान से चेहरे लिए-उस ज़मीन की ओर देख रहे होते, जहां उन्हें पनाहगीर कहा जाने लगा था... अपने वतन में-बेवतन हुए लोग....

चलती हुई गाड़ी से भी बाहर के अंधेरे में मिट्टी के टीले इस तरह दिखाई देते-जैसे अंधेरे का विलाप हो ! उस समय वारिस शाह का कलाम मेरे सामने आया, जिसने हीर की लंबी दास्तान लिखी थी-जो लोग घर-घर में गाते थे। मैं वारिस शाह से ही मुखातिब हुई...

https://youtu.be/uIzPv4ng6cg


उठो वारिस शाह-

कहीं कब्र में से बोलो

और इश्क की कहानी का-

कोई नया वरक खोलो....


पंजाब की एक बेटी रोई थी

तूने लंबी दास्तान लिखी

आज जो लाखों बेटियां रोती हैं

तुम्हें-वारिस शाह से-कहती हैं...

सभी कैदों में नज़र आते हैं

हुस्न और इश्क को चुराने वाले

और वारिस कहां से लाएं

हीर की दास्तान गाने वाले...


तुम्हीं से कहती हूं-वारिस !

उठो ! कब्र में से बोलो

और इश्क की कहानी का

कोई नया वरक खोलो...

तब अजीब वक्त सामने आया-यह नज़्म जगह-जगह गाई जाने लगी। लोग रोते और गाते। पर साथ ही कुछ लोग थे, जो अखबारों में मेरे लिए गालियां बरसाने लगे, कि मैंने एक मुसलमान वारिस शाह से मुखातिब होकर यह सब क्यों लिखा ? सिक्ख तबके के लोग कहते कि गुरु नानक से मुखातिब होना चाहिए था। और कम्युनिस्ट लोग कहते कि गुरु नानक से नहीं-लेनिन से मुखातिब होना होना चाहिए था...

उन दिनों जनरल शाह नवाज़ अगवा हुई लड़कियों को तलाश रहे थे, उनके लोग, जगह-जगह से टूटी बिलखती लड़कियों को ला रहे थे-और पूरा-पूरा दिन-ये रिपोर्ट उन्हें मिलती रहतीं। मैंने कुछ एक बार उनके पास बैठ कर बहुत सी वारदातें सुनीं। ज़ाहिर है कि कई लड़कियां गर्भवती हालात में होती थीं...उस लड़की का दर्द कौन जान सकता है-जिसके दिल की जवानी को ज़बर से मां बना दिया जाता है....एक नज़्म लिखी थी-मज़दूर ! उस बच्चे की ओर से-जिसके जन्म पर किसी भी आंख में उसके लिए ममता नहीं होती, रोती हुई मां और गुमशुदा बाप उसे विरासत में मिलते हैं...

यहां अमृता की इस फेमस नज़्म को सुनिए..

https://youtu.be/uIzPv4ng6cg




Sunday, May 07, 2017

इश्क़ की इंतहा


आज की बात अमृता के अपने लफ्जों में ..क्यूंकि मैं इसको पढ़ कर कितनी देर तक खामोश बैठी    रह जाती हूँ ..कुछ कहने को बोलने को दिल नही चाहता है बस यही ख्याल कि रब्बा यह "इश्क की वो इन्तहा है "जो खुदा से मिला देती है ..

कोरा कागज .

पच्चीस और छब्बीस अक्तूबर की रात २ बजे जब फ़ोन आया की सहिर नही रहे तो पूरे बीस दिन पहले की वह रात उस रात में मिल गई जब मैं बल्गारिया में थी ,डाक्टर ने कहा था कि दिल की तरफ़ मुझे खतरा है ,और उस रात मैएँ नज्म लिखी थी अज्ज आपणे दिल दरिया दे विच्च मैं आपणे फुल्ल प्रवाहे...."" अचानक मैं अपने हाथो की तरफ़ देखने लगी कि इन हाथों से मैंने अपन दिल के दरिया में अपनी हड्डियाँ प्रवाहित की थी .पर हड्डियां बदल कैसे गई ? यह भुलावा मौत को लग गया की हाथो को ?  
साथ ही वह समय सामने आ गया ,जब दिल्ली में पहली एशियन राइटर्स कांफ्रेंस हुई थी ,शायरों -आदबों को उनके नाम के बैज मिले थे .जो सबने अपने कोटों में लगाए थे ,और सहिर ने अपने कोट पर से अपना नामा का बैज उतार कर मेरे कोट पर लगा दिया था  और मेरे कोट से मेरे नाम का बैज उतार कर अपन कोट पर लगा लिया था उस समय किसी की नज़र पड़ी ,उसने कहा था की हमने बैज ग़लत लगा रखे हैं .तो साहिर हंस पड़ा था की बैज देने वाले से गलती हो गई होगी ,पर इस गलती को हमें न दुरुस्त करना न हमने किया ....अब बरसों बाद जब रात को दो बजे ख़बर सुनी कि साहिर नही रहे तो लगा जैसे मौत ने अपना फ़ैसला उसी बैज को पढ़ कर किया है ,जो मेरे नाम का था ,पर साहिर के कोट पर लगा हुआ था ...."'

मेरी और साहिर की दोस्ती में कभी भी लफ्ज़ हायल नही हुए थे यह खामोशी का हसीं रिश्ता था मआइने जो नज्में लिखी तो उस मजमुए को जब अवार्ड मिला तो प्रेस रिपोटर ने मेरी तस्वीर लेते हुए चाहा की मैं कुछ कागज़ पर लिख रही हूँ वैसे तस्वीर ले वह .तस्वीर ले कर जब वह प्रेस वाले चले गए तो मैंने उस कागज को देखा की मैंने उस पर बार बार एक ही लफ्ज़ लिखा था साहिर साहिर साहिर इस दीवानगी के आलम के बाद घबराहट हुई कि सवेरे जब यह तस्वीर अखबार में छपेगी तो तस्वीर वाले कागज पर यह नाम पढ़ा जायेगा तो न जाने कैसी कयामत आ जायेगी .? पर कयामत नही आई तस्वीर छापी पर वह कागज कोरा ही नजर आया वहां

यह और बात है कि बाद में यह हसरत आई दिल में कि ओ   खुदाया! जो कागज कोरा दिखायी दे रहा था वह कोरा नही था 
कोरे कागज कि आबरू आज भी उसी तरह है .रसीदी टिकट में मेरे इश्क कि दसात्न दर्ज़ है साहिर ने पढ़ी थी पर उसके बाद किसी मुलाक़ात में न रसीदी टिकट का जिक्र मेरी जुबान पर आया न साहिर कि जुबान पर

याद है एक  मुशायरे में साहिर से लोग आटोग्राफ ले रहे थे लोग चले गए मैं अकेली उसके पास रह गई तो मैंने हंस कर उसके आगे अपनी हथेली कर दी थी कोरे कागज की तरह और उसने मेरी हथेली पर अपना नाम लिख कर कहा था यह कोरे चेक पर मेरे दस्तखत है जो रकम चाहे भर  लेना   और  जब चाहे काश करवा लेना वह कागज चाहे मांस कि हथेली  थी पर उसने कोरे कागज का नसीब पाया था इस लिए कोई भी हर्फ उस पर नही लिखे जा सकते थे ...

हर्फ आज भी मेरे पास कोई नही हैं रसीदी टिकट में जो भी कुछ भी है और आज यह सतरें  भी कोरे कागज की दास्तान है ...

इस दास्तान की इब्तदा भी खामोश थी और सारो उम्र उसकी इन्तहा भी खमोश रही आज से चालीस बरस पहले लाहौर में जब साहिर मुझसे मिलने आता था बस आ कर चुपचाप सिगरेट पीता मेरा और उसके सिगरेट का धुंआ सिर्फ़ हवा में मिलता था ,साँस भी हवा में मिलते रहे और नज्मों के लफ्ज़ भी हवा में ...

सोच रही हूँ हवा कोई भी फासला तय कर सकती है वह आगे भी शहरों का फासला तय किया करती थी,अब इस दुनिया  और उस दुनिया का फासला भी जरुर तय कर लेगी .....

२ नवम्बर १९८० 
--
प्यार के एक पल ने जन्नत को दिखा दिया
प्यार के उसी पल ने मुझे ता -उमर रुला दिया
एक नूर की बूँद की तरह पिया हमने उस पल को
एक उसी पल ने हमे खुदा के क़रीब ला दिया !!
..........रंजू ..........

Thursday, April 27, 2017

इश्क की दरगाह भी तू ... यह सारी कायनात तू ..

नागमणि में कभी कभी कुछ लेखकों की आपस में बातचीत छपती थी इस कॉलम का नाम "गुफ्तगू "था ...कई बार अमृता भी इस बात चीत में शरीक होती थी आज उसी कॉलम के कुछ हिस्से यहाँ पढ़िए ...
हम सभी हुए न हुए जन्म की पीड़ा झेल कर भी मरते हैं ,और अजन्मा होने की हसरत ले कर भी ..लगता है यह स्वाति नक्षत्र का नहीं अस्वाती नक्षत्र का  युग है और हम सब सीपियों में पड़ी हुई स्वाति कि बुँदे नहीं अस्वाती कि बुँदे हैं .मोती बनने की सीमा तक पहुँच कर भी अमोती है और इस लिए हम मौत को सदा एक साँस की दूरी पर भोगते हैं ...
नागमणि ,अगस्त १९६८

शिव कुमार : तुम्हे कौन सी आँखे पसंद है ?
अमृता : मैंने काजानजाकिस को देखा नहीं ,पर जैसी उसकी अनकहे थी ...
शिवकुमार :उसकी आँखों का रंग क्या था ?
अमृता : वह रंग ,जिस से उसे अपने ग्रीक लोगों की गुलामी की पीड़ा दिखाई देती थी
नागमणि अक्तूबर १९६९ 


दिलीप टिवाना: अमृता जी ! आ मुझे इस बात का जवाब दीजिये कि आप लिखती क्यों हैं ?
अमृता :इस बात का जवाब मैं पहले भी दे चुकी हूँ कि यह हमारी कृतियाँ अपने से आगे तक पहुँचाने का हमारा संघर्ष होता है ?
दिलीप :फिर इस में लोगों तक पहुंचाना क्यों जरुरी है ?
अमृता :असली अर्थों में लेखक कभी लोगों तक नहीं पहुँचता ,लोग लेखक तक पहुँचते हैं
दिलीप :चेखव के बारे में कहा जाता है कि उसने लोगों को उनका आपा खोज कर दिया आप इस की व्याख्या  कैसे करती है ?
अमृता :जो बात मैंने अभी कही ,वह उसी का अलग शब्दों में समर्थन है कि चेखव ने अपना आपा खोजा .जिसके कारण लोगों ने अपने आप को पाया 
नागमणि अप्रैल १९७७

आपकी दो पंक्तियाँ हैं
पैर तेरे सुच्चे और होंठ मेरे झूठे आज छुएंगे
पैर तेरे झूठे या होंठ मेरे सुच्चे आज होंगे
यह किस उम्र अवस्था की बात है ...?

अमृता :  इन पंक्तियों की शिद्दत इनको हासिल है ,बाकी सच्चा और झूठे जैसे लफ्ज़ सामाजिक संस्कारों के दिए हुए हैं .अनजान उम्र में स्लेट पर लिखे उल्ट पुलट अक्षरों जैसे और उस अनजान उम्र में इस तरह की  शिद्दत से व्यक्ति मनफ़ी( माइनस )होता है

इमरोज़ को आपने कैसे पहचाना ?पति की तरह ?प्रेमी की तरह ?या दोस्त की तरह ?
अमृता :इमरोज़ को देख कर ही मैंने लिखा था
बाप ,भाई .दोस्त और खावंद
किसी लफ्ज़ से कोई रिश्ता नहीं
वैसे जब मैंने तुम्हे देखा
सारे अक्षर गहरे हो गए ..
खुदा की मुलाक़ात ने दुनिया का दिया हुआ किसी रिश्ते का लफ्ज़ लागू नहीं होता और न कोई लफ्ज़ उस मुलाक़ात से बाहर खड़ा रह जाता है ...उसी तरह से ...
जैसे योग की एक राह भी तू
इश्क की दरगाह भी तू ...
यह सारी कायनात तू ..
खुदा की मुलाक़ात तू ..वाह सजन ..वाह  सजन

अमृता की यह पंक्तियाँ इश्क़ की रूहानी बात कहती है 

Tuesday, April 25, 2017

उम्र के खत(अमृता प्रीतम)

अमृता प्रीतम के इन खतों को जब जब पढ़ा है लिखा है इन शब्दों ने उन दिलों को छुआ है जो जानते हैं कि असल में प्रेम के अर्थ क्या है ।हर बार इन खतों को पढ़ती हूँ और नए अर्थ पाती हूँ फिर आप सब के साथ सांझा कर देती हूँ । हर पढने वाले को यह लिखे लफ्ज़ अपने दिल की आवाज़ लगते हैं और मेरे लिखने का उत्साह बढ़ जाता है ।शुक्रिया आप सभी दोस्तों का इस सफर का हमसफ़र बनने के लिए ।आज उनका लिखा एक और यादगार ख़त चंद लफ़्ज़ों में @रंजू भाटिया
जीती!
यह मेरी ज़िन्दगी की सड़क कैसी है,जिसके सारे मील के पत्थर हादसों  के बने हुए हैं ।तुम थे तो घर नहीं था ।आज घर है तो तुम नहीं हो  थोड़े से मीलो की दूरी होती है ,पर एक कानून की छोटी सी मोहर उसे दूसरी दुनिया की दूरी बना देती है ।मैं अजीब तरह से परेशान हूँ और ऐसा लग रहा है जैसे यह बेचनी मेरी उम्र जितनी लम्बी है ,या मेरी उम्र का नाम ही बैचनी है ।
29 .3.62
आशी

Friday, April 21, 2017

किस्मत की लकीरे (AMRITA PREETAM)

मर्द ने अपनी पहचान मैं लफ़्ज़ में पानी होती है, औरत ने मेरी लफ़्ज़ में... 
‘मैं’ शब्द में ‘स्वयं’ का दीदार होता है, और ‘मेरा’ शब्द ‘प्यार’ के धागों में लिपटा हुआ होता है... 

लेकिन अंतर मन की यात्रा रुक जाए तो मैं लफ़्ज़ महज अहंकार हो जाता है और मेरा लफ़्ज़ उदासीनता। उस समय स्त्री वस्तु हो जाती है, और पुरुष वस्तु का मालिक। 
मालिक होना उदासीनता नहीं जानता, लेकिन मलकियत उसकी वेदना जानती है। 

रजनीश जी के लफ़्ज़ों में ‘‘वेदना का अनुवाद दुनिया की किसी भाषा में नहीं हो सकता। इसका एक अर्थ ‘पीड़ा’ होता है, पर दूसरा अर्थ ‘ज्ञान’ होता है। यह मूल धातु ‘वेद’ से बना है, जिस से विद्वान बनता है—ज्ञान को जानने वाला। वेदना का अर्थ हो जाता है —जो दुख के ज्ञान को जानता है।’’ सो इस वेदना के पहलू से कुछ उन गीतों को देखना होगा, जो धरती की और मन की मिट्टी से पनपते हैं। 

लोकगीत बहुत व्यापक दुख से जन्म लेता है, वह उस हकीकत की ज़मीन पर पैर रखता है, जो बहुत व्यापक रूप में एक हकीकत बन चुकी होती है। 
इसी तरह कहावतें भी ऐसे संस्कारों से बनती हैं, जि पर्त दर पर्त बहुत कुछ अपने में लपेट कर रखती हैं। जैसे कभी बंगाल में कहावत थी—‘‘जो औरत पढ़ना लिखना सीखती है, वह दूसरे जन्म में वेश्या होकर जन्म लेती है।

हमारे देश की अलग-अलग भाषाओं के होठों पर ऐसी कितनी कहावतें और गीत सुलगते हैं। आम स्त्री की हालत का अनुमान कुछ उन्हीं से लगाना होगा...  अमृता के लिखे शब्द उनकी लिखी पुस्तकों से ...
एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,
लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं।सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक हैऔर चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का।सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती हैऔर चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति।दोनों शक्तियाँ स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक हैं अन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,इंसान के भीतर पड़ी पनपती रहती है।यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती हैऔर पिता-पितामह के करमों से भी।हमारे अपने देश में, कई जातियों मेंएक बड़ी रहस्यमय बात कही जाती है,हर बच्चे के जन्म के समय,कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना।इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रिय
से रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती हैऔर आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती है...मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथाबहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मतकी लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए,पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियोंसे न रूठने का संकेत है।...........एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं।सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक है
और चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का।सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती हैऔर चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति।दोनों शक्तियाँ स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक हैंअन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,इंसान के भीतर पड़ी पनपती रहती है।यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती हैऔर पिता-पितामह के करमों से भी।हमारे अपने देश में, कई जातियों मेंएक बड़ी रहस्यमय बात कही जाती है,
हर बच्चे के जन्म के समय,कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना।इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,
किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रियसे रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती हैऔर आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती है...मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथाबहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मतकी लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए,पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियोंसे न रूठने का संकेत है।...........

Wednesday, April 19, 2017

कागज़ों का शाप (ek thi Sara)

मैंने आसमान से एक तारा टूटते हुए देखा है ...
बहुत तेजी से .आसमान के जहन  में एक जलती हुई लकीर खेंचता हुआ ,,लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे कि उन्होंने कई बार टूटे हुए तारों की  गर्म राख जमीन पर गिरते देखी है  मैंने भी उस तारे की  गर्म राख अपने दिल के आँगन में बरसती हुई देखी है जिस तरह तारों के नाम होते हैं उसी तरह जो तारा मैंने टूटते हुए देखा उसका नाम था सारा शगुफ्ता ....उस तारे के टूटते समय आसमान के जिहन से जो एक लम्बी और जलती  हुई लकीर खिंच गयी थी वह सारा शगुफ्ता की  नज्म थी
नज्म जमीन पर गिरी ,तो खुदा जाने उसके कितने टुकड़े हवा में खो गए लेकिन जो राख मैंने हाथ से छू कर देखी थी उस में कितने ही जलते हुए अक्षर  थे ,जो मैंने उठा उठा कर कागज़ में रख दिए
नहीं जानती खुदा ने इन कागजों को ऐसा शाप क्यों दिया है आप उन पर कितने ही जलते हुए अक्षर रख दे वह कागज़ जलते ही नहीं
जिन लोगों के पास एहसास है जलते हुए अक्सर पढ़ते हुए उनके एहसास से सुलगने लगते हैं पर कोई कागज़ नहीं जलता
शायद यह शाप नहीं है ..है भी तो इसको शाप नहीं कहना  चाहिए अगर ऐसा होता तो खुदा जाने दुनिया कि कितनी किताबें अपनी ही अक्षरों की राख से जल जाती ...
पिछले दो दिन से में अमृता द्वारा संकलित इस किताब को पढ़ रही हूँ ..और इसका असर इस तरह से जहाँ पर हुआ कि आपसे बांटे बगैर नहीं रह सकी ..सारा का दर्द उनके लिखे लफ़्ज़ों में कई टुकडो में अमृता प्रीतम तक पहुंचा ....वह पाकिस्तान  की  शायरा अमृता तक अपने लफ़्ज़ों से नज्म  और अपनी ज़िन्दगी के किस्से सुनाती हुई पहुंचती रही ..उनके दर्द को इस नज्म से बखूबी समझा जा सकता है ..

एक थी सारा ...
मेरी तहरीरों से कई घरों ने मुझ पर थूक दिया है
लेकिन में उनका जायका नहीं बन सकती
में टूटी हुई दस्तकें  झोली में भर रही हूँ
ऐसा लगता है पानी में कील थोक रही हूँ
हर चीज बह जायेगी ,मेरे लफ्ज़ ,मेरी औरत
यह मशकरी गोली किसने चलायी अमृता !
जुबान एक निवाला क्यों कबूल करती है
भूख एक और पकवान अलग अलग
देखने के सिर्फ एक चाँद सितारा क्यों देखूं ?
समुन्द्र के लिए लहर जरुरी है
अमृता ! वह ब्याहाने वाले लोग कहाँ गए ?
यह कोई घर है ?
कि औरत और इजाजत में कोई फर्क नहीं रहा
मैंने बागवत की  है अकेली ने
अब अपने आगन में अकेली रहती हूँ
कि आज़ादी कोई बड़ा पेशा नहीं
देख ! मेरी मजदूरी ,चुन रही हूँ लुंचे मांस
लिख रही हूँ
कभी दीवारों में चिनी गयी
कभी बिस्तर पर चिनी जाती हूँ .....

Tuesday, April 18, 2017

एक खाली जगह की बात (अमृता प्रीतम )

अमृता के लिखे ने हमेशा आम इंसान की भावनाओं ,वहां के माहौल को इस तरह से अपनी कलम से लिखा है कि हर किसी को वह अपने ही घर की .... कहानी लगती है ...वह परिवार मध्यवर्गी हो या चाहे निम्न मध्यवर्गीय हर किसी को उस में अपना ही अक्स नजर आता है ...उनके उपन्यास "एक खाली जगह "से आज की कड़ी के लिए कुछ पंक्तियाँ .जिनको मैंने कई बार पढा और हर बार मुझे उस में एक नया अर्थ मिला ... निम्न मध्य श्रेणी के घरों की एक ख़ास गंध होती है ,चारपाइयों के नीचे रखे हुए ट्रंकों में और तीन के डिब्बे की तरह हर समय घर में छिप कर बैठी रहती है और कीलों पर लटकते हुए मटमैले कपडों में ,राम कृष्ण के और हनुमान के कैलेंडरों कीतरह घर की दीवारों को हथिया कर निशुन्क  खड़ी हुई भी ...
एक सुख ,सिर्फ एक तरफा ,विचार की गुलामी का सुख होता है ,जहाँ सब कुछ इकहरा होता है ,रिश्ते का रथ भी इकहरा .और इंसान के अस्तित्व का अर्थ भी इकहरा ..कोई भी रिश्ता जब बाहरी चीजों के सहारे खडा होता है जैसे मजहब के दौलत के या बने बनाये कानून के सहारे उसको कभी मन की पीडा का वरदान नहीं मिलता है .गुलामी का सुख मिलता है पर स्वंत्रता की पीडा नहीं मिलती ..

हर लड़की विवाह की पहली रात जिस कमरे में दाखिल होती है ,कभी उस कमरे का मालिक उसके स्वागत के लिए वहां नहीं होता है .और वह लड़की एक अपरिचित कमरे में एक दखलंदाजी की तरह कदम रखती है ..

शायद जिस समय जिस्म की आग जलती है ,तब सिर्फ आग के जलने की होती है ,और किसी चीज की नहीं और शायद तब सब कुछ उस में भस्म हो जाता है ..
कुछ विचार केवल गंध के समान होते हैं जिन्हें हाथ से पकड़ कर किसी को दिखाया नहीं जा सकता है हर समय होते भी नहीं मेह की बूंद पड़ते ही स्वयं आ जाते हैं ।घरों के कोनों में गुच्छा से हो कर बैठ जाते हैं और फ़िर धूप के समय न जाने कहाँ चले जाते हैं ....

कुछ फूल किसी कब्र पर चढ़ने के लिए उगते हैं ----शायद मैं भी !
हवन की अग्नि हाथ में एक रिश्ता थमा सकती है ,पर उसकी लौ मन के अँधेरे कोनों तक कभी पहुँच नहीं पाती और वे कोने किसी भी रिश्ते की हद से बाहर रह जाते हैं ..
कोई ऐसी खबर भी सच्ची हो सकती है ,जो अखबार के बाहर रह जाए ...इंसान के मन को अखबार की तरह साधारण आँखों से नहीं पढा जा सकता है ..

उपन्यास एक खाली जगह से ली गयीं यह पंक्तियाँ घर ,रिश्ते की नाजुकता का उसी बखूबी से ब्यान करते हैं जितना ज़िन्दगी खुद सच से रूबरू होती है .....

Thursday, October 08, 2015

शीशे की सुराही में -- नज़रों की शराब है ...

बरसों की राहें चीरकर 
तेरा स्वर आया है 
सस्सी के पैरों को जैसे 
किसी ने मरहम लगाया है ...

मेरे मजहब ! मेरे ईमान !

तुम्हारे  चेहरे  का ध्यान कर के मजहब जैसा सदियों पुराना शब्द भी ताजा लगता है |और तुम्हारे ख़त ? लगता है जहाँ गीता .कुरान .ग्रन्थ और बाइबिल आ कर रुक जाते हैं ,उसके आगे तुम्हारे ख़त चलते हैं .....अवतार दो तीन दिन मेरे पास गई है ,कल शाम गई |मेरी मेज पर खलील जिब्रान का स्केच देख कर पूछने लगी ,''यह इंदरजीत का स्केच है न ?"" मुझे अच्छा लगा उसने तुम्हारा धोखा भी खाया  तो खलील जिब्रान के चेहरे से |नक्शों में फर्क हो सकता है .पर असल बात तो विचारों की होती है |सचमुच तुम्हारे इस नए ख़त को पढ़ कर तुम्हारा और खलील जिब्रान का चेहरा मेरे सामने एक हो गया है |

एक पाकीजगी जो तुममें देखी है वह किताबों में पढ़ी तो जरुर है ,पर किसी परिचित चेहरे पर नही देखी है |

तुम्हारे जाने के बाद एक कविता लिखी है ---रचनामत्क क्रिया .और एक आर्टिकल ---एक कहानी भी !पर यह सब मेरी छोटी छोटी कमाई है ,मेरी जिंदगी की असली कमाई तो मेरा "इमरोज़" है |

अब कब घर आओगे ? मुझे तारीख  लिखो ,ताकि मैं उँगलियों पर दिन गिन सकूँ तो मुझे अपनी उंगलियाँ भी अच्छी लगने लगें |

तुम्हारी 

जोरबी 


इतना पाक इतना सच्चा प्रेम , जो पढ़े उसको यह इस प्रेम की हुक लगा दे यह थी हमारी अमृता ...वह अपने बारे में कहती है कि..मैं औरत थी ,चाहे बच्ची सी ,और यह खौफ विरासत  में पाया था कि दुनिया के भयानक  जंगल में से मैं अकेले नही गुजर सकती .शायद इसी भय से अपने साथ मर्द के मुहं की  कल्पना करना मेरी कल्पना का अन्तिम साधन था ...

पर इस मर्द शब्द के मेरे अर्थ कहीं भी पढ़े ,सुने या पहचाने हुए अर्थ नही थे |अंतर में कहीं जानती अवश्य थी ,पर अपने आपको भी बता सकने का समर्थ मुझ में नहीं थी | केवल एक विश्वास सा था कि देखूंगी तो पहचान लूंगी | 

पर मीलों दूर तक कहीं भी कुछ भी नही दिखायी देता था |और इसी प्रकार वर्षों   के कोई अड़तालीस  मील गुजर गए |

मैंने जब उसको पहली बार देखा ..तो मुझसे भी पहले मेरे मन ने उसको पहचान लिया | उस वक्त मेरी उम्र अड़तालीस वर्ष थी ...

यह कल्पना इतने साल जिन्दा रही और इसके अर्थ भी जिन्दा रहे ..इस पर मैं चकित हो सकती हूँ ,पर हूँ नहीं क्यूंकि जान लिया था कि यह मेरे "मैं" की परिभाषा थी ...थी भी और है भी |

मैं उन वर्षों में नही मिटी,इसलिए वह भी नहीं  मिटी  ...

यह नही कि कल्पना से शिकवा नही किया ,उस  वक़्त लिखी कई कविताएं निरी शिकवा ही हैं जैसे --
लख तेरे अम्बरां बिच्चों ,दस्स की लभ्भा सानूं
इक्को तंद प्यार दी लभ्भी ,ओह वीं तंद   इकहरी ..

हिन्दी में ..
तेरे लाखों अम्बरों में से बताओ हमें क्या मिला 
प्यार का एक ही तार मिला ,वह भी इकहरा ..

पर यह इकहरा तार वर्षों बीत जाने पर भी क्षीण नही हुआ | उसी तरह मुझे अपने में लपेटे हुए मेरी उम्र के साथ चलता रहा ...

कई हादसे हुए पर कल्पना  जो मेरे अंगों की तरह मेरे बदन का हिस्सा थी, वह मेरे बदन में निर्लप्त हो कर बैठी रही ...

उसे कई वर्ष समाज ने भी समझाया और कई वर्ष मैंने भी पर उसने पलक नही झपकाई | वह कई वर्षों के पार उस विरानगी की और देखती रही जहाँ कुछ भी नज़र नही आता था ..और जब उसने पलक झपकाई ,तब मेरी उम्र को अडतीलस्वां  वर्ष लगा हुआ था ..और तब मैंने जाना की क्यूँ ....उस से अलग ,या आधा ,या लगभग सा कुछ भी नही चाहिए था | 

अमृता ने इमरोज़ का इन्तजार किस शिद्दत से किया .वह प्यार जब बरसा तो फ़िर दीन दुनिया की परवाह किए बिना बरसा और खूब बरसा ..

यह कैसी चुप है 
कि जिसमें पैरों  की आहट शामिल है 
कोई चुपके से आया है --
चुप से टूटा हुआ --
चुप का टुकडा --
किरण से टूटा हुआ 
किरण का कोई टुकडा 
यह एक कोई "'वह''  है 
जो बहुत बार बुलाने पर भी 
नही आया था |
और अब मैं अकेली नहीं 
मैं आप अपने संग खड़ी हूँ 
शीशे की सुराही में 
नज़रों की शराब भरी है --
और हम दोनों जाम पी रहे हैं 
वह टोस्ट दे रहा उन लफ्जों के 
जो सिर्फ़ छाती में उगते हैं |
यह अर्थों का जश्न है ---
मैं हूँ ,वह है ..
और शीशे की सुराही में --
नज़रों की शराब है ...
   
मैं तो इसको लिखते लिखते इसी में खो जाती हूँ ..दिल करता है कि बस सुनती- सुनाती रहूँ यह दास्तान और कभी खत्म न हो यह ... पर आज के लिए इतना डूबना काफ़ी है .फ़िर मिलते हैं अगली कड़ी में जहाँ मैं हूँ ,आप है और अमृता -इमरोज़ की बेपनाह मोहब्बत है ...

Saturday, March 07, 2015

यह कैसा हुनर और कैसी कला?women day par vishesh

डोगरी लेखिका पद्मा सचदेव की कलम से अमृता .....
दिल में एक चिनगारी डालकर
जब कोई साँस लेता है
कितने अंगारे सुलग उठते हैं,
तू उन्हें क्यों नहीं गिनती?


यह कैसा हुनर और कैसी कला?
जीने का एक बहाना है
यह तख़य्यल का सागर है

तू कभी क्यों नहीं नापती?



'डोगरी की अमृता प्रीतम' के नाम से जानी गईं वरिष्ठ कवियत्री पद्मा सचदेव कहती हैं, 'अमृता प्रीतम अपनी शर्तों पर जीने वाली आजाद ख्याल महिला थीं। वह बेहद रचनात्मक, खूबसूरत और शालीन थीं। उनकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती। अमृता की लेखनी में अलग तरह का स्त्री विमर्श था। चाहे कविता हो, कहानी हो या उपन्यास, उन्होंने हर बार नारी के प्रति पुरुष की उदासीनता को पेश किया।'

भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर रचे उनके उपन्यास ‘पिंजर’ में ‘पूरो’ नाम की हिंदू लड़की और उसे भगाकर ले जाने वाले रशीद के बीच के रिश्ते की कशमकश झलकती है।
अमृता प्रीतम की ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त पुस्तक ‘कागज ते कैनवास’ की कविता ‘कुमारी’ में वह आधुनिक लड़की की कहानी बयाँ करती हैं। उनकी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ भी बेखौफ नजीर पेश करती है। पद्मा कहती हैं, 'अमृताजी ने अपनी रचनाओं के जरिए उन महिलाओं को एक रास्ता दिखाया था जो तब दरवाजों के पीछे सिसका करती थीं।'

एक वाकया याद करते हुए पद्मा ने बताया, 'एक बार दिल्ली  में एक घर की छत पर छोटा जमावड़ा हुआ। वहाँ एक-दो पंजाबी रचनाकार मौजूद थे। अचानक अमृता के आने की सुगबुगाहट शुरू हुई। उस मौके पर उन्होंने एक नज्म पेश की। दिलचस्प यह था कि नज्म ‘ब’ लफ्ज से शुरू होने वाले अपशब्दों जैसे ‘बदतमीज, बेलगाम, बेलिहाज, बेरहम’ पर आधारित थी। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने नज्म बेहद खूबसूरती से गढ़ी थी।’’ अमृता वाघा सीमा के दोनों ओर के पंजाब में लोकप्रिय हैं। कहा जाता है कि उनकी लोकप्रियता पंजाबी रचनाकार मोहन सिंह और शिव कुमार बटालवी से भी ज्यादा है।
पंजाबी रचनाकार डॉ. संतोख सिंह धीर कहते हैं, 'यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि अमृता को उनकी रचनाएँ अनूदित करवाने का मौका मिला जो मोहन सिंह और बटालवी को उनके समय में नहीं मिल पाया। हालाँकि, इसमें कोई संदेह नहीं है कि कविता के मामले में अमृता काफी आगे हैं। उनकी कहानी ‘शाह की कंजरी’ और उपन्यास ‘पिंजर’ भी बेहद मशहूर है लेकिन उनकी कविताओं में ज्यादा गहराई है।

मेरा बदन एक पुराना पेड़ है…
और तेरा इश्क़ नागवंशी –

युगों से मेरे पेड़ की
एक खोह में रहता है।
नागों का बसेरा ही पेड़ों का सच है
नहीं तो ये टहनियाँ और बौर-पत्ते –
देह का बिखराव होता है…
यूँ तो बिखराव भी प्यारा
अगर पीले दिन झड़ते हैं
तो हरे दिन उगते हैं
और छाती का अँधेरा
जो बहुत गाढ़ा है
– वहाँ भी कई बार फूल जगते हैं
।

और पेड़ की एक टहनी पर –
जो बच्चों ने पेंग डाली है
वह भी तो देह की रौनक़…
देख इस मिट्टी की बरकत –
मैं पेड़ की योनि में आगे से दूनी हूँ
पर देह के बिखराव में से
मैंने घड़ी भर वक़्त निकाला है
और दूध की कटोरी चुराकर
तुम्हारी देह पूजने आई हूँ…
यह तेरे और मेरे बदन का पुण्य है
और पेड़ों को नगी बिल की क़सम है
और – बरस बाद
मेरी ज़िन्दगी में आया –
यह नागपंचमी का दिन है…