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Thursday, January 26, 2023

जश्न जारी है

 इमरोज़ होना आसान नहीं ...



इमरोज़ का जन्मदिन


Amrita Pritam ke saath चालीस साल जी कर लिखी 

इमरोज़ की कविताएं


"जश्न जारी है" जी की किताब से कुछ सुंदर रचनाएं


तेरे साथ जिए

वे सब खूबसूरत

दिन रात

अब अपने आप

मेरी कविताएं

बनते जा रहे हैं....


कब  और किस दिशा में कुछ सामने आएगा ,कोई सवाल पूछेगा ,यह रहस्य पकड़ में नही आता ..एक बार मोहब्बत और दर्द के सारे एहसास ,सघन हो कर आग की तरह लपट से पास आए और इश्क का एक आकार ले लिया ..


उसने पूछा ..कैसी हो ? ज़िन्दगी के दिन कैसे गुजरते रहे ?


जवाब दिया ..तेरे कुछ सपने थे .मैं उनके हाथों पर मेहन्दी रचाती रही .

उसने पूछा ..लेकिन यह आँखों में पानी  क्यों है ?


कहा ..यह आंसू नही सितारे हैं ...इनसे तेरी जुल्फे सजाती रही ..


उसने पूछा ...इस आग को कैसे संभाल कर रखा ?


जवाब दिया ...काया की डलिया में छिपाती रही


उसने पूछा -बरस कैसे गुजारे ?


कहा ....तेरे शौक की खातिर काँटों का वेश पहनती रही..


उसने पूछा ...काँटों के जख्म किस तरह से झेले?


कहा... दिल के खून में शगुन के सालू रंगती रही..


उसने कहा और क्या करती रही?


कहा -कुछ नही तेरे शौक की सुराही से दुखों की शराब पीती रही


उसने पूछा .इस उम्र का क्या किया


कहा कुछ नही तेरे नाम पर कुर्बान कर दी .[यह एक अमृता का साक्षात्कार है जो एक नज्म की सूरत में है ..]


अमृता ने एक जगह लिखा है कि वह इतिहास पढ़ती नही .इतिहास रचती है ..और यह भी अमृता जी का कहना है वह एक अनसुलगाई सिगरेट हैं ..जिसे साहिर के प्यार ने सुलगाया और इमरोज़ के प्यार ने इसको सुलगाये रखा ..कभी बुझने नही दिया ..अमृता का साहिर से मिलन कविता और गीत का मिलना था तो अमृता का इमरोज़ से मिलना शब्दों और रंगों का सुंदर संगम ....हसरत के धागे जोड़ कर वह एक ओढ़नी बुनती रहीं और विरह की हिचकी में भी शहनाई को सुनती रहीं ..


  प्रेम में डूबी हर स्त्री अमृता होती है या फिर होना चाहती है. पर सबके हिस्से कोई इमरोज नहीं होता, शायद इसलिए भी कि इमरोज होना आसान नहीं. ... किसी ऐसी स्त्री से से प्रेम करना और उस प्रेम में बंधकर जिन्दगी गुजार देना, जिसके लिए यह पता हो कि वह आपकी नहीं है।


जन्मदिन मुबारक इमरोज़


इस लिंक पर सुने इमरोज़ की कविताएं






Wednesday, August 31, 2022

एक मुलाकात अमृता के इमरोज़ से

 



आज ३१ अगस्त है

 ३१ अगस्त है ...अमृता जन्मदिन तुम्हे मुबारक ....हर जन्मदिन पर लगता है क्या लिखूं तुम्हारे लिए ...सब कुछ कह के भी अनकहा है वक़्त बीत रहा है ...तलाश जारी है खुद में तुमको पाने की ..तुम जो .मेरे प्रेरणा रही ..मेरी आत्मा में बसी मुझे हमेशा लगा जैसे जो प्यास .जो रोमांस ,जो इश्क की कशिश तुम में थी वह तुमसे कहीं कहीं बूंद बूंद मुझ में लगातार रिस रही है ...इमरोज़ भी एक ही है और अमृता भी एक थी ..पर ..फिर भी अमृता तुम्हारे लिखे ..को पढ़ के ...अमृता तुम्हारी तरह जीने की आस टूटती नहीं ..जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक अमृता


कुछ वक्त पहले इमरोज़ से हुई बातचीत  कई जगह पब्लिश भी हुई थी  

पूरी बात चीत सुनने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें 

एक मुलाकात अमृता के इमरोज़ से


रंजू भाटिया) जी ने अपने ब्लाग ‘अमृता प्रीतम की याद में…….’  इमरोज से हुयी बातचीत का एक हिस्सा प्रस्तुत किया था जिसमें उन्होंने यह सवाल किया था इस घर में अमृता का कमरा बाहर तथा इमरोज का कमरा अंदर क्यों है? इस पर इमरोज के द्वारा दिया गया उत्तर अमृता के प्रति इमरोज के लगाव का जो चित्र खींचता है वह अद्वितीय हैः-


 ‘मैं एक आर्टिस्ट हूं और वह एक लेखिका पता नहीं कब वो लिखना शुरू कर दे और मैं पेंटिंग बनाना। इतना बडा घर होता है फिर भी पति पत्नी ऐक ही बिस्तर पर क्यों सोते हैं ? क्योंकि उनका मकसद कुछ और होता है। हमारा ऐसा कुछ मकसद नहीं था इसलिये हम अलग सोते थे। सोते वक्त अगर मैं हिलता तो उसे परेशान होती और अगर वह हिलती तो मुझे । हम एक दूसरे को कोई परेशानी नहीं देना चाहते थे। आज शादियां सिर्फ औरत का जिस्म पाने के लिये होती हैं । मर्द के लिये औरत सिर्फ सर्विग वोमेन है कयांेकि वह नौकर से सस्ती होती है। एसे लोगों को औरत का प्यार कभी नहीं मिलता। आम आदमी को औरत सिर्फ जिस्म तक ही मिलती है प्यार तो किसी किसी को ही मिलता है। औरत जिस्म से बहुत आगे है , पूरी औरत उसी को मिलती है जिसे वो चाहती है।’


अमृता के प्रति इमरोज के इस गहरे भावनात्मक लगाव की तह में जाकर उस दिन की पडताल करने पर रंजना (रंजू भाटिया) जी को वह दिन भी दिखलाई पडा जब इमरोज ने अपना जन्मदिवस अमृता जी के साथ मनाया था। इस दिन को याद करते हुये इमरोज ने कहाः-


‘ वो तो बाइ चांस ही मना लिया। उसके और मेरे घर में सिर्फ एक सड़क का फासला था । मै उससे मिलने जाता रहता था। उस दिन हम बैठे बातें कर रहे थे तो मैने उसे उसे बताया कि आज के दिन मैं पैदा भी हुआ था। वो उठकर बाहर गयी और फिर आकर बैठ गई। हमारे गांव में जन्मदिन मनाने का रिवाज नहीं ,अरे पैदा हो गये तो हो गए, ये रिवाज तो अंग्रेजो से आया है। थोडी देर के बाद उसका नौकर केक लेकर आया। उसने केक काटा थोडा मुझे दिया और थोडा ख्ुाद खाया । ना उसने मुझे हैप्पी बर्थडे कहा और ना ही मैने उसे थैक्यू। बस दोनो एक दूसरे को देखते और मुस्कुराते रहे ।’


बस इसी तरह एक दूसरे को देखकर मुस्कुराना और बिना कुछ भी कहे सब कुछ कह जाने वाली भाषा के साथ जीने वाली अमृताजी आज हमारे बीच न हों लेकिन इस बात से इमरोज को कोई फर्क नहीं पडता क्योकि उनका मानना है कि वे उनके साथ तो आज भी हैं ना।

Sunday, July 31, 2022

अंबर की एक पाक सुराही (कुफ्र)

 



एक बहुत रोचक पूरा वाक्या आप इस पोस्ट से जुड़ा इस लिंक पर सुनिए । अमृता जब इमरोज़ के साथ रहने लगी तब उनके बहुत अच्छे जानने वाले ने क्या कहा इमरोज़ के साथ रहने पर ..

नीचे वाले लिंक को क्लिक करके जरूर सुनें ,लाइक और सब्सक्राइब करना ना भूले ,धन्यवाद 😊

👇👇👇👇

बात कुफ्र की है हमने , अंबर की एक पाक सुराही


१९७५ में अमृता के एक उपन्यास "धरती सागर और सीपियाँ "पर जब "कादम्बरी "फ़िल्म बन रही थी तो उसके उन्हें एक गीत लिखना था ..उस वक्त का सीन था जब चेतना इस उपन्यास की पात्र समाजिक चलन के ख्याल को परे हटा कर अपने प्रिय को अपने मन और तन में हासिल कर कर लेती है ..यह बहुत ही हसीं लम्हा था मिलन और दर्द का ....जब अमृता इसको लिखने लगीं तो अमृता को अचानक से वह अपनी दशा याद आ गई जब वह पहली बार इमरोज़ से मिली थी और उन्होंने उस लम्हे को एक पंजाबी गीत लिखा था ...उन्होंने उसी का हिन्दी अनुवाद किया और जैसे १५ बरस पहले की उस घड़ी को फ़िर से जी लिया ...गाना वह बहुत खुबसूरत था ...आज भी बरबस एक अजब सा समां बाँध जाता है इसको पढने से सुनने से ...


अम्बर की एक पाक सुराही ,बादल का एक जाम उठा कर

घूंट चांदनी की पी है हमने .बात कुफ्र की की है हमने ...


https://youtu.be/flgLWYa_qc8

Friday, April 21, 2017

किस्मत की लकीरे (AMRITA PREETAM)

मर्द ने अपनी पहचान मैं लफ़्ज़ में पानी होती है, औरत ने मेरी लफ़्ज़ में... 
‘मैं’ शब्द में ‘स्वयं’ का दीदार होता है, और ‘मेरा’ शब्द ‘प्यार’ के धागों में लिपटा हुआ होता है... 

लेकिन अंतर मन की यात्रा रुक जाए तो मैं लफ़्ज़ महज अहंकार हो जाता है और मेरा लफ़्ज़ उदासीनता। उस समय स्त्री वस्तु हो जाती है, और पुरुष वस्तु का मालिक। 
मालिक होना उदासीनता नहीं जानता, लेकिन मलकियत उसकी वेदना जानती है। 

रजनीश जी के लफ़्ज़ों में ‘‘वेदना का अनुवाद दुनिया की किसी भाषा में नहीं हो सकता। इसका एक अर्थ ‘पीड़ा’ होता है, पर दूसरा अर्थ ‘ज्ञान’ होता है। यह मूल धातु ‘वेद’ से बना है, जिस से विद्वान बनता है—ज्ञान को जानने वाला। वेदना का अर्थ हो जाता है —जो दुख के ज्ञान को जानता है।’’ सो इस वेदना के पहलू से कुछ उन गीतों को देखना होगा, जो धरती की और मन की मिट्टी से पनपते हैं। 

लोकगीत बहुत व्यापक दुख से जन्म लेता है, वह उस हकीकत की ज़मीन पर पैर रखता है, जो बहुत व्यापक रूप में एक हकीकत बन चुकी होती है। 
इसी तरह कहावतें भी ऐसे संस्कारों से बनती हैं, जि पर्त दर पर्त बहुत कुछ अपने में लपेट कर रखती हैं। जैसे कभी बंगाल में कहावत थी—‘‘जो औरत पढ़ना लिखना सीखती है, वह दूसरे जन्म में वेश्या होकर जन्म लेती है।

हमारे देश की अलग-अलग भाषाओं के होठों पर ऐसी कितनी कहावतें और गीत सुलगते हैं। आम स्त्री की हालत का अनुमान कुछ उन्हीं से लगाना होगा...  अमृता के लिखे शब्द उनकी लिखी पुस्तकों से ...
एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,
लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं।सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक हैऔर चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का।सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती हैऔर चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति।दोनों शक्तियाँ स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक हैं अन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,इंसान के भीतर पड़ी पनपती रहती है।यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती हैऔर पिता-पितामह के करमों से भी।हमारे अपने देश में, कई जातियों मेंएक बड़ी रहस्यमय बात कही जाती है,हर बच्चे के जन्म के समय,कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना।इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रिय
से रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती हैऔर आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती है...मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथाबहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मतकी लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए,पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियोंसे न रूठने का संकेत है।...........एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं।सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक है
और चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का।सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती हैऔर चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति।दोनों शक्तियाँ स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक हैंअन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,इंसान के भीतर पड़ी पनपती रहती है।यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती हैऔर पिता-पितामह के करमों से भी।हमारे अपने देश में, कई जातियों मेंएक बड़ी रहस्यमय बात कही जाती है,
हर बच्चे के जन्म के समय,कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना।इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,
किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रियसे रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती हैऔर आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती है...मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथाबहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मतकी लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए,पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियोंसे न रूठने का संकेत है।...........

Tuesday, April 18, 2017

एक खाली जगह की बात (अमृता प्रीतम )

अमृता के लिखे ने हमेशा आम इंसान की भावनाओं ,वहां के माहौल को इस तरह से अपनी कलम से लिखा है कि हर किसी को वह अपने ही घर की .... कहानी लगती है ...वह परिवार मध्यवर्गी हो या चाहे निम्न मध्यवर्गीय हर किसी को उस में अपना ही अक्स नजर आता है ...उनके उपन्यास "एक खाली जगह "से आज की कड़ी के लिए कुछ पंक्तियाँ .जिनको मैंने कई बार पढा और हर बार मुझे उस में एक नया अर्थ मिला ... निम्न मध्य श्रेणी के घरों की एक ख़ास गंध होती है ,चारपाइयों के नीचे रखे हुए ट्रंकों में और तीन के डिब्बे की तरह हर समय घर में छिप कर बैठी रहती है और कीलों पर लटकते हुए मटमैले कपडों में ,राम कृष्ण के और हनुमान के कैलेंडरों कीतरह घर की दीवारों को हथिया कर निशुन्क  खड़ी हुई भी ...
एक सुख ,सिर्फ एक तरफा ,विचार की गुलामी का सुख होता है ,जहाँ सब कुछ इकहरा होता है ,रिश्ते का रथ भी इकहरा .और इंसान के अस्तित्व का अर्थ भी इकहरा ..कोई भी रिश्ता जब बाहरी चीजों के सहारे खडा होता है जैसे मजहब के दौलत के या बने बनाये कानून के सहारे उसको कभी मन की पीडा का वरदान नहीं मिलता है .गुलामी का सुख मिलता है पर स्वंत्रता की पीडा नहीं मिलती ..

हर लड़की विवाह की पहली रात जिस कमरे में दाखिल होती है ,कभी उस कमरे का मालिक उसके स्वागत के लिए वहां नहीं होता है .और वह लड़की एक अपरिचित कमरे में एक दखलंदाजी की तरह कदम रखती है ..

शायद जिस समय जिस्म की आग जलती है ,तब सिर्फ आग के जलने की होती है ,और किसी चीज की नहीं और शायद तब सब कुछ उस में भस्म हो जाता है ..
कुछ विचार केवल गंध के समान होते हैं जिन्हें हाथ से पकड़ कर किसी को दिखाया नहीं जा सकता है हर समय होते भी नहीं मेह की बूंद पड़ते ही स्वयं आ जाते हैं ।घरों के कोनों में गुच्छा से हो कर बैठ जाते हैं और फ़िर धूप के समय  जाने कहाँ चले जाते हैं ....

कुछ फूल किसी कब्र पर चढ़ने के लिए उगते हैं ----शायद मैं भी !
हवन की अग्नि हाथ में एक रिश्ता थमा सकती है ,पर उसकी लौ मन के अँधेरे कोनों तक कभी पहुँच नहीं पाती और वे कोने किसी भी रिश्ते की हद से बाहर रह जाते हैं ..
कोई ऐसी खबर भी सच्ची हो सकती है ,जो अखबार के बाहर रह जाए ...इंसान के मन को अखबार की तरह साधारण आँखों से नहीं पढा जा सकता है ..

उपन्यास एक खाली जगह से ली गयीं यह पंक्तियाँ घर ,रिश्ते की नाजुकता का उसी बखूबी से ब्यान करते हैं जितना ज़िन्दगी खुद सच से रूबरू होती है .....

Sunday, February 08, 2015

मैं हूँ ,वह है .. और शीशे की सुराही में -- नज़रों की शराब है ...

बरसों की राहें चीरकर
तेरा स्वर आया है
सस्सी के पैरों को जैसे
किसी ने मरहम लगाया है ...

मेरे मजहब ! मेरे ईमान !

तुम्हारे  चेहरे  का ध्यान कर के मजहब जैसा सदियों पुराना शब्द भी ताजा लगता है |और तुम्हारे ख़त ? लगता है जहाँ गीता .कुरान .ग्रन्थ और बाइबिल आ कर रुक जाते हैं ,उसके आगे तुम्हारे ख़त चलते हैं .....अवतार दो तीन दिन मेरे पास गई है ,कल शाम गई |मेरी मेज पर खलील जिब्रान का स्केच देख कर पूछने लगी ,''यह इंदरजीत का स्केच है न ?"" मुझे अच्छा लगा उसने तुम्हारा धोखा भी खाया  तो खलील जिब्रान के चेहरे से |नक्शों में फर्क हो सकता है .पर असल बात तो विचारों की होती है |सचमुच तुम्हारे इस नए ख़त को पढ़ कर तुम्हारा और खलील जिब्रान का चेहरा मेरे सामने एक हो गया है |

एक पाकीजगी जो तुममें देखी है वह किताबों में पढ़ी तो जरुर है ,पर किसी परिचित चेहरे पर नही देखी है |तुम्हारे जाने के बाद एक कविता लिखी है ---रचनामत्क क्रिया .और एक आर्टिकल ---एक कहानी भी !पर यह सब मेरी छोटी छोटी कमाई है ,मेरी जिंदगी की असली कमाई तो मेरा "इमरोज़" है |