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Thursday, August 25, 2022

एक यादगार यात्रा


 एक यादगार यात्रा 


दौड़ने दो खुले मैदानों में,

इन नन्हें कदमों को जनाब

जिंदगी बहुत तेज भगाती है,

बचपन गुजर जाने के बाद

बचपन की वो यादें अब भी आती हैं

रोते में अब भी वो हँसा जाती हैं|

अज्ञात


यह पंक्तियां न जाने किसकी लिखी हैं पर इन पंक्तियों के भाव जैसा मन कई बार बचपने और उन यादों जगह पर ले जाता है जहां पैदा हुई और कुछ बचपन बीता। 

बहुत साल पहले भी ऐसी दिल में हलचल मची थी तो हम बहनें बच्चों को "गर्मी की छुट्टियों" में वो जगह दिखाने के लिए ले गए थे। बदलाव तब भी बहुत था ,पर तब दादी उसी "सोंधी मिट्टी के घर में "रहती थी। बच्चे तब यह सब देख कर बहुत खुश हुए थे। इसी से जुड़ा एक वाक्या याद आता है कि जब दादी के घर से बुआ के घर पहुंचे तो कजन भाई ने सवाल किया "यहां कैसे आए बच्चों के साथ ? कुछ विशेष काम?"


 हमने कहा" बस घूमने ।जो जवाब भाई ने दिया वो आज भी हंसा देता है कि "यह तुम्हारा हिल स्टेशन है जो गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को ले कर यहां आ गई हो " उस वक्त शायद हम मुस्करा कर चुप रह गए , पर जवाब यही था जो ठंडक इस जन्मभूमि और बीते बचपन को बच्चों को दिखाने में दिल को पहुंचती है, वो कोई हिल स्टेशन भी क्या करेगा। सोच विचार तो सबके अपने ही हैं न। गलत वो भी नहीं था ,गलत हम भी नहीं।


   वक्त तेजी से बदलता है और बच्चे अपने अपने घर के हुए। पर कुछ सवाल अपनी जगह कायम रहते हैं ,बस पूछने वाले बदल जाते हैं। जब हमारे बच्चों ने पूछा तो मै उन्हें वो यादें वो जगह दिखा लाई, बहुत सी कहानियों के साथ। उन्होंने भी उसको खूब एंजॉय किया। अब यही सवाल मुझसे मेरी आठ साल की समायरा पूछती है "नानी आप जब छोटे थे तो कहां कैसे रहते थे ? क्या क्या करते थे। उसके इन्ही सवालों ने फिर से सालों बाद उस जन्मभूमि को देखने की हलचल मचा दी और एक बार फिर हम बहनें उस जगह को मिट्टी को मिलने चल दिए। हरे भरे बचे हुए खेत और नए पुलों सड़कों के बीच में से गुजरते हुए। 


   हरियाणा के रोहतक जिले के कस्बे कलानौर में एक बड़े से घर की मिट्टी की कोठरी में मेरा जन्म हुआ था। अब न वो घर रहे ना वो रहने वाले। नए लोगों को साथ ले कर वो जमीन अब नए मकान को समेटे हुए है। यह सब मै जानती थी पर फिर भी उस जगह को देखना था। वहां की हवा ,गलियों बाजारों को महसूस करना था। घर बदल गए थे पर गालियां बाजार और कुछ दुकानें अब भी वैसी ही है। स्पेशल वो दुकान जहां से छोटी बच्ची थी जब मैं तो टाफी लेने भाग जाती थी। बेशक उसके मालिक अगली पीढ़ी हो गई ,दुकान भी पक्की हो गई पर उस वक्त की खुशबू को अभी भी महसूस किया।कच्चे स्कूल अब पक्के बिल्डिंग में तब्दील हो गए हैं। 


 पर गलियों में नालियां वही खुले मुंह वाली है ।हमारे बचपन में पानी दूर कुएं से दादी , बुआ ले कर आती थी , बिजली भी आती जाती रहती थी।

 पानी अब भी वहां लिमिट में आता है पर घरों में नल में आता और कभी कभी गायब भी हो जाता है। बिजली सिर्फ किसी भी वक्त पर छह घंटे रहती है। सिवरेज लाइन हैं अधिकतर अब घरों में जो पहले नहीं होती थी। गालियां उसी तरह तंग हैं। अंदर बाइक के सिवा कोई गाड़ी नहीं जा सकती। इसलिए जो सवाल मेरे मन में पहले भी थे अब भी थे, ई कि इमरजेंसी होने पर इन गलियों से कैसे बाहर रोड पर पहुंचते हैं ? जब कोई दुल्हन विदा हो कर आती तो क्या अब तक वो "पैयां पैया "चल कर आती है सड़क से अंदर गलियों में बसे घर तक ? बाहर कितनी ही चौड़ी सड़कें बन जाएं अंदर तो सिर्फ मकानों का तंग गलियों ,खुली नालियों का जाल बिछा है। वहां सिर्फ कच्चे से मकान पक्के घरों में बदल गए हैं। किंतु सबके अपने अपने पैरामीटर है सुखों को देखने के और अपनी उसी जमीन से जुड़े रहने के। 


बाजार अब आधुनिक समान से भी भरा हुआ था पर पुराने के साथ। मिट्टी के लकड़ी के खिलौनों की जगह अब प्लास्टिक के खिलौनों की थी। किंतु बर्फी की मिठास भी वही थी पुरानी, बूंदी को नमकीन के साथ खाने का हमारा वहां मन हो आया। निशानी के तौर पर एक एक ओढ़नी सब हम बहनों ने ली कि बस अब आगे आना न होगा यहां।


 उन्हीं यादों को अपने दिल में समेटे पुरानी यादों के साथ मिलाते वापस तो आ गए हैं। और यही सोच रहे हैं नया पुराना यूं ही मिल मिला कर यह दुनिया चलती रहेगी । यादें बनती रहेंगी। अभी नीचे के लिंक में देखिए कुछ वहां से समेटी हुई यादें। लाइक और सब्सक्राइब जरुर कीजिए।

My village trip

Sunday, January 18, 2009

एक यात्रा...

कहाँ है
अब वह
प्रकति के सब ढंग,
धरती के ,पर्वत के
सब उड़ गए हैं रंग..


पिछले दिनों हिसार जाना हुआ यह रास्ता मुझे वैसे भी बहुत भावुक कर देता है |रोहतक जहाँ बचपन बीता उसके साथ लगता कलानौर जहाँ जन्म लिया ..क्या वह घर अब भी वैसा होगा .कच्चा या वहां भी कुछ नया बन गया होगा ..बाग़ खेत ..कई यादे एक साथ घूम जाती है ..दिल्ली के कंक्रीट जंगल से कुछ पल सिर्फ़ राहत मिल जाती है और लगता है कि अभी भी कोई कोना तो है दिल्ली के आस पास जो कुछ हरियाला है ..मेट्रो के कारण दिल्ली जगह जगह से उधडी हुई है .एक जगह से दूसरी जगह जाने में एक युग सा लगता है ..वही हुआ बस तो आई एस बी टी से ही मिलनी थी ,जिसने दिल्ली से बाहर निकलते निकलते ही ३ घंटे लगा दिए ...और उसके बाद का रास्ता ही सिर्फ़ तीन घंटे का है .रोहतक तक आते आते अब खेत कुछ कम दिखायी देते हैं वहां भी अब ओमेक्स के फ्लेट्स का बोर्ड लहरा रहा है | नींव तो पड़ ही चुकी है एक और कंक्रीट के जंगल की ......मन में चिंता होती है कि यूँ ही सब मकान बनते रहे तो खेत कहाँ रहेंगे ...और खेत नही रहेंगे तो खाने को क्या मिलेगा ...पर रोहतक से हिसार के दूर दूर तक फैले पीले सरंसों के फूल ,गेहूं की नवजात बालियाँ यह आश्वासन देती लगती है कि चिंता मत करो अभी हम है ,पर कब तक यह कह नही सकते...तभी बीडी के धुएँ से बस के अन्दर ध्यान जाता है .....हरियाणा की बस है सो कम्बल लपेटे बेबाक से कई ताऊ जी बैठे हैं .कुछ ताई जी भी हैं जो अभी भी हाथ भर घूँघट में हैं पर उनकी आँखे बाहर देख रही रही ..दिल्ली से एक लड़के को सीट नही मिली है और रोहतक से आगे बस आ चुकी है ,वह सीट के साथ बैठे ताऊ को थोड़ा अपना कम्बल समेट लेने को कहता है ,जिस से वह वहां बैठ सके .पर ताऊ बड़ी सी हम्बे कर के उसको देखता है और फ़ैल कर बैठ जाता है ..लड़का फ़िर कहता है कि 'मैंने भी टिकट ली है ,बैठने दो मुझे यहाँ "'...ताऊ उसको घूर कर कहता है कि "थम जा अभी महम आने पर मैं उतारूंगा तब यहाँ बैठ लीजो ..टिकट रख ले अपने खीसे में ....".और शान से अपनी बीडी का धुंआ फेंकता है जो सीधे मेरी तरफ़ आता है और मैं रुमाल से अपना नाक बंद कर लेती हूँ ...लगता है कि इसको कुछ कहूँ पर लड़के को दिये जवाब से चुप हो जाती हूँ ...और ब्लागर ताऊ जी की इब खूंटे पर याद करके मुस्कराने लगती हूँ ...ताऊ जी के लिखे कई कारनामे याद आने लगते हैं ...ब्लागिंग से जुड़े कई काम याद आने लगते हैं ..

महम आ गया है और वह ताऊ जी उतर गए हैं ...लड़का लपक के वह सीट ले लेता है ..बस फ़िर आगे को भागने लगती है ...तभी मेरे सेल की घंटी बजती है और बहन पूछती है कि कहाँ तक पहुँची तुम ... .महम से बस निकल चुकी है कुछ ही देर हुई है ..मैं कहती हूँ कि हांसी आने वाला है पहुँच जाउंगी कुछ देर में ..तभी आगे की सीट पर उंघती महिला एक दम से चौकस हो जाती है और खिड़की से बाहर देख कर मेरी तरफ़ देख के कहती है अभी हांसी दूर है ..उन्होंने शायद वहीँ उतरना है इस लिए एक दम से चौंक गई है ...सेल पर मेरी बात सुन कर ..मैं कुछ सोच कर मुस्करा देती हूँ ...मैं भी बाहर देखने लगती हूँ .. गांव है ,घरों के आगे चारपाई पर हुक्के सुलगे हुए हैं .कई बुजुर्गवार बैठे हैं .....घर के आगे की हवेली में ट्रेक्टर और भेंसे बंधी हुई हैं ....सड़क के साथ ही एक स्कूल से लड़के नीली वर्दी पहने निकल रहे हैं और जाते हुए ट्रेक्टर में लदे गन्नों को लपकने की कोशिश में हैं ....लडकियां नही दिखती नीली वर्दी में ..कुछ आगे जाने पर दिखती है चेहरा ढके हुए ..कुछ सिर पर घडा रखे हैं ,पानी भरने जा रही है ,किसी के सिर पर चारा है और कोई भेंसों को नहला कर घर की और ले जा रही है ..इस रास्ते से आते जाते अब तक कई सालों से लड़कियों को सिर्फ़ इसी तरह से देखा है ...
....आगे बैठा लड़का अब शायद अपनी गर्ल फ्रेंड से बात कर रहा है ..सेल पर उसकी आवाज़ तेज है जो सुनाई दे रही है किसी बात पर मनाने की कोशिश है ,आवाज़ में बेचारगी है पर चेहरे पर आक्रोश है .अभी अभी आँखों में खिले सपने हैं ..उसको देख कर नजर फेर लेती हूँ कहीं मेरे यूँ देखने से वह परेशान न हो जाए पर मेरे कान उसकी बातो को न चाहते हुए भी सुनते रहते हैं ...और फ़िर कुछ देर पहले उस औरत पर जो मुस्कराहट आई थी वह अपने ऊपर आ जाती है .......इंसानी फितरत स्वभाव से मजबूर है .क्या करें ...

वापसी पर भी वही सब है भरी बस ,कम्बल लपेटे ताऊ जी ,आधे घूँघट में ताई जी और बीडी का धुंआ ......जो रोहतक आते आते कम हो जाता है ....हिसार से रोहतक तक तेज रफ़्तार और दिल्ली की शुरुआत होते ही वही कंक्रीट के जंगल ..मेट्रो का रास्ता बनाते मजदूर .बस अड्डे से ऑटो ले कर घर का रास्ता तय हो ही रहा होता है | रास्ते में कई झुग्गियां टूटी हुई है ..यहाँ पर अब मेट्रो का रास्ता बनेगा .फ़िर यह मजदूर और कागज़ बीनने वाले कहाँ रहेगे ? ठण्ड भी कितनी है, बारिश भी हो रही है ...उनके टूटे घरों में चूल्हा जल रहा है शायद खाने पीने का काम जल्दी से ख़त्म कर के सोने की कोई जगह तलाश करेंगे |
तभी एक जोर की ब्रेक ले कर ऑटो एक दम से घूम जाता है सामने के नजारा देख कर मेरी रूह कांप जाती है .एक बाइक वाले ने सीधे जाते जाते एक दम से यू टर्न ले लिया था, उसको बचाने के चक्कर में ऑटो वाले ने एक दम से ब्रेक लागने की कोशिश की और एक ब्लू लाइन बस हमारे ऑटो को छूती हुई निकल गई ..यानी कुछ पल यदि नही संभलते तो अपना टिकट ऊपर का काटने वाला था ...ऑटो वाला सकते में कुछ पल यूँ ही खड़ा रहता है ....और फ़िर धीरे से कहता है "मैडम आज तो बच गए "....मैं भी कुछ पल तक जैसे सकते में आ जाती हूँ .....मन ही मन जय श्री कृष्ण और बाबा जी का शुक्रिया अदा करती हूँ ,और रास्ते में फ़िर से टूटी झुग्गियों को देख कर सोचती हूँ कि इतनी ठण्ड में यह अब कैसे रहेंगे ...कुछ समय पहले लिखी अपनी कुछ पंक्तियाँ याद आने लगती है ..

दिख रहा है ......
जल्द ही
दिल्ली का नक्शा बदल जायेगा
खेल कूद के लिए ख़ुद रहा है
दिल्ली की सड़कों का सीना
हर तरफ़ मिटटी खोदते
संवारते यह हाथ
न जाने कहाँ खो जायंगे

सजाती दिल्ली को
यह प्रेत से साए
गुमनामी में गुम हो जायेंगे

घने ठंड के कुहरे में
दूर गावं से आए यह मजदूर
फटे पुराने कपडों से ढकते तन को
ख़ुद को दे सके न चाहे एक छत
पर आने वाले वक्त को
मेट्रो और सुंदर घरों का
एक तोहफा
सजा संवार के दे जायेंगे !!

रंजना[रंजू ] भाटिया

Monday, August 18, 2008

देवताओं का नगर--रॉक गार्डन


उस बनाने वाले ने रॉक गार्डन
हर दिल में एक नयी चाहत जगा दी है
एक एहसास जीने का देकर
जीने की एक नयी राह दिखा दी है !!

चंडीगढ़ शहर और उस में बसा यह ,"देवताओं का नगर रॉक गार्डन "और सुखना झील मेरे पंसदीदा जगह में से एक है | रॉक गार्डन यानी देवताओं की नगरी ,जो इश्क की इन्तहा है ,जहाँ इश्क की इबादत करने को जी चाहता है | यह जनून जरुर किसी देवता ने ही नेकचंद के दिलो दिमाग में डाला होगा , वह कहते हैं कि जब वह छोटे थे तो जंगल और वीरानियों से पत्थर और अजीब सी शक्ल वाली टेढी मेढ़ी टहनियां चुनते रहते थे |पर कोई जमीन पास न होने के कारण वह उनको वहीँ निर्जन स्थान पर रख आते थे |फ़िर जब बड़े हो कर वह पी .डब्लू .डी में रोड इंस्पेक्टर बन गए तो चंडीगढ़ की इस निर्जन जगह पर एक स्टोर दफ्तर का बना लिया और यहाँ सब एक साथ रखता गए |
यहाँ इसी वीराने में उन्होंने इस नगरी की नीवं रख तो दी ,पर एक डर हमेशा रहता किसी सरकारी अफसर ने कभी कोई एतराज़ कर दिया तो फ़िर क्या करूँगा ? उस हालत में उन्होंने सोच रखा था कि फ़िर वही वही पर बनी गहरी खाई के हवाले कर देंगे| कितनी हैरानी की बात है कि गुरदास जिले के बेरियाँ कलां गांव के जन्मे इस अनोखे कलाकार को न ड्राइंग आती है न कभी उन्होंने की |पर जैसे देवताओं ने हाथ पकड़ कर उनसे यह सब बनवा लिया |

इस के पीछे हुई मेहनत साफ़ नज़र आती है | शाम होने पर वह दरजी की दुकानों पर जा कर लीरें इक्ट्ठी करते जहाँ कहीं मेला लगता वहां से टूटी चूडियाँ के टुकड़े बोरी में भर कर ले आते ,होटलों और ढाबों से टूटे प्याले प्लेटों के टुकड़े जमा करते ,साथ ही जमा करते बिजली की जली हुई ट्यूब और जले हुए कोयले के टुकड़े भी | और इस सब सामान को जोड़ने आकृति देने के लिए सीमेंट , जहाँ सीमेंट के पाइप बनते और जो छींटों के साथ साथ सीमेंट उड़ता उसको इकठ्ठा कर के ले आते | इस तरह पंजाब की मिटटी पर बना यह इस कलाकार का वह सपना है जो पूरी दुनिया ने इसको बन कर खुली आंखों से देखा है |
१२ साल तक यह कलाकार छिप कर यह नगरी बसाता रहा , डरता रहा कि कहीं कोई सरकारी हुक्म इसको मिटटी में न मिला दे पर जब एम् .एस .रंधावा ने यह नगरी देखी तो उनका साथ दिया फ़िर नए चीफ कमिशनर टी .एन चतुर्वेदी ने इन्हे पाँच हजार रूपये भी दिए और सीमेंट भी दिया और दिए मदद के लिए कुछ सरकारी कारीगर |काम अभी खूब अच्छे से होने लगा था तभी उनकी ट्रांसफर यहाँ से हो गई और नए कमिशनर ने आ कर यह काम यह कह कर बंद करवा दिया कि , फालतू का काम है | तीन साल तक यह काम बंद रहा | उसके बाद आए नए चीफ कमिशनर ने काम दुबारा शुरू करवाया और इन्हे जमीन भी दी | तब से या देवताओं की नगरी आबाद है और नित्य नए बने तजुरबो से गुलजार है |

यहाँ चूडियों के टूटे टुकड़े से बनी गुडिया जैसे बोलने लगती है ,पहाडी प्रपात का महोल अपने में समोह लेता है और तब लगता है की यह पत्थर हमसे कुछ बातें करते हैं .बस जरुरत इन्हे ध्यान से सुनने की है |

कभी रॉक गार्डन पर पर लिखी एक कविता पढ़ी थी जिसका मूल भाव यह था कि जिस तरह एक कलाकार ने टूटी फूटी चीज़ो से एक नयी दुनिया बसा दी है क्या कोई मेरे एहसासो को इसी तरह से सज़ा के नये आकार में दुनिया के सामने ला सकता है ?दिल तो मेरा है "रॉक" है , क्या उस पर अहसास का गार्डन बना सकता है? ...... उसको सोच कर यह नीचे लिखी कविता मैंने लिखी ..पता नही यह उस कलाकार के अंश मात्र भाव को भी छू सकी है यह नही ,पर एक कोशिश कि है मैंने .....

बना तो सकते हैं हम
अपनी चाहतों से तेरे
रॉक हुए दिल को
प्यार के महकते हुए
एहसासों का गुलिस्तान
पर क्या तुम भी
उन टूटी फूटी चीजों की तरह
अपने सोये हुए एहसासों को
जगा पाओगे ?
जिस तरह सौंप दिया था
टूटे हुए प्यालों चूडियों ने
अपना टूटा हुआ अस्तित्व
अनोखे बाजीगर को .
क्या तुम उस तरह
अपना अस्तित्व मुझे
सौंप पाओगे ??
क्या तुम में भी है ..
सहनशीलता उन जैसी
जो उन्होने नये आकार
बन पाने तक सही थी..
क्या तुम भी उन की तरह तप कर
फिर से उनकी तरह सँवर पाओगे ????

अगर मंज़ूर हैं तुम्हे यह सब
तो दे दो मुझे ..
अपने उन टूटे हुए एहसासो को
मैं तुम्हारे इस रॉक हुए दिल को
फिर से महका दूँगी ,सज़ा दूँगी
खिल जाएगा मेरे प्यार के रंगो से
यह वीरान सा कोना तेरी दुनिया का
पूरी दुनिया को मैं यह दिखा दूँगी !!

रंजू


Saturday, May 10, 2008

ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं[मीना कुमारी]



अभिनय की हर बारीकी से सम्पन्न मीना कुमारी एक अभिनेत्री के रूप में ३२ साल तक भारतीय सिने जगत पर छाई रहीं फ़िल्म परिणीता की शांत अल्हड़ नवयौवना ,बैजू बावरा की चंचल हसीं प्रेमिका साहब बीबी और गुलाम की की सामंती अत्याचार व रुदिवादी परम्परा की निष्ठुर यातनाएं झेलने वाली बहू और शारदा की ममता मयी माँ और सबसे बेहतरीन पाकीजा की साहब जान इन मीना कुमारी को कौन नही जानता...

१ अगस्त १९३२ को जन्मी और गरीबी में पली इस अभिनेत्री का बचपन भी बहुत अच्छा नही गुजरा मात्र ८ साल की उम्र में यह फिल्मों में आ गई पहले यह गाने गाया करती थी कई गजल और गीत उन्होंने अपनों दर्द भरी आवाज़ में गाए हैं उपनाम नाज से वह लिखा भी करती थी ..कुछ कहानिया भी लिखी थी इन्होने ..यदि यह अभिनेत्री न होती तो एक बहुत अच्छी शायरा होतीं ....सन १९४७ में बनी पिया घर आजा के सभी गीत मीना जी ने गाए थे इन में देश पराए जाने वाले .नयन डोर में बाँध लिया आदि गीत बहुत लोक प्रिय भी हुए थे ...सन १९52 में बेजू बावरा बहुत हिट साबित हुई और इन्हे फ़िल्म फेयर अवार्ड भी मिला ज्यूँ ज्यूँ यह शोहरत की बुलन्दी पर पहुंचती गई उतनी ही अपनी ज़िंदगी में तन्हा होती गई हर वक्त खोयी खोयी उदासियों में जीने वाली मीना के अभिनय भी वह दर्द छल कता ही रहा सन १९७१ में बनी पाकीजा में जैसे उन्होंने अपनी सच्ची पीडा को ही फ़िल्म में उतार दिया उस फ़िल्म का एक संवाद भूले नही भूलता हम तो वह लाश है जिसकी कब्र खुली पड़ी रहती हैं इस को बोलते हुए उन्हें कोई अभिनय नही करना पड़ा क्यूंकि उनकी ज़िंदगी की सारी पीड़ा जैसे उस में सिमट के रह गई थी ...

बच्चो से मीना जो को बहुत लगाव था उन्होंने कई अनाथ बच्चों की मदद की कहते हैं कि कई बार वह सारा सारा दिन उन बच्चो के साथ बिता देती थी ..पर तकदीर ने उन्हें औलाद का सुख नही दिया परदे पर माँ कि ममता रूप जीने वाली सदा माँ बनने के लिए तरसती रहीं .अन्तिम दिनों में सावन कुमार टाक उनके साथ रहे उन्होंने मीना जी की सेवा मैं कभी कोई कमी नही आने दी उन्होंने उनक दिल रखने के लिए उनकी फ़िल्म गोमती के किनारे में भी काम किया उन्होंने पूरी ज़िंदगी में कभी किसी को निराश नही किया लेकिन कोई उनका नही हो सका तब उन्होंने शराब को उन्होंने साथी बना लिया सिर्फ़ ४० साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने इस बेदर्द दुनिया से रुखसत ली यह कहते हुए

ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है और जां तन्हा
मीना कुमारी का ही लिखा हुआ है
चाँद तन्हा है आसमं तन्हा
दिल मिला हैं कहाँ कहाँ तनहा
ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है जां तन्हा

Saturday, February 16, 2008

पुस्तक मेला और हिंद युग्म ..की कामयाबी

२ फरवरी जब यह पुस्तक मेरा शुरू हुआ तो एक जोश था इस बार इस मेले का ...मैं दिल्ली पुस्तक मेला हो या यह विश्व पुस्तक मेला जरुर जाती हूँ और जब तक लगा रहता है कई बार जाती हूँ ...किताबो की जादू नगरी लगती है मुझे जहाँ बेसुध हो के पुस्तक संसार में खोया जा सकता है ...पर इस बार इस मेले में मैं सिर्फ़ इस बार मैं सिर्फ़ पुस्तके देखने नही गई थी बलिक इस मेले में शिरकत करने वाला हिंद युग्म से जुड़ी हुई थी ..जोश हम सब में भरपूर है और जनून है हिन्दी भाषा को हिन्दी साहित्य से लोगो को जोड़ना ..और ३ फरवरी को विमोचन के बाद लोग हमे तलाशते हुए हमारे स्टैंड तक आए ...कोई उम्र की सीमा से नही बंधा हुआ ..यदि आज की युवा पीढ़ी हिन्दी से जुड़ना चाहती थी तो उम्र दराज़ लोग भी पीछे नही थे .सबसे अच्छा लगा जब कई जाने माने लेखक उदय प्रकाश जी ने हमारे इस प्रयास को सराहा और हमारे होंसले को बढाया .मीडिया वालो ने हमारी इस कोशिश को जन जन तक पहुचाने में अहम् भूमिका निभाई हम जिस उद्देश्य को ले कर यहाँ सब आए थे आखरी दिन पर उसकी कामयाबी की खुशी हम सब के चेहरे पर थी ..

Wednesday, January 09, 2008

जय श्रीकृष्ण ,ॐ नमो शिवाये ......यूं किया हमने नए साल का स्वागत पार्ट २


गुजरात जब मैं आज से लगभग २० साल पहले गई थी तो उस वक्त सोचा भी नही था की दुबारा फ़िर यहाँ आना होगा ..पर जो बांके बिहारी की इच्छा ...इस बार का घूमना तो एक याद गार पल बन गया सब बहने और उनके बच्चे अपने बच्चे ,और एक नया जोश विश्वास .सब कुछ अदभुत था ..हमारा सफर शुरू हुआ २६ दिसम्बर से रात को ८ बजे राजधानी से चले और सुबह ठीक १० बजे अहमदाबाद ..रास्ते में की खूब मस्ती आगे घूमने का जोश बढे से ले कर छोटे सब में था ..अहमदाबाद में गेस्ट हॉउस बुक था ..सब जा के पहले फ्रेश हुए ..और बढ़िया सी चाय पी कर चल पढे सबसे पहले अपने मनपसंद जगह शापिंग ...यह जगह लाल दरवाज़ा नाम से मशहूर है जम के शापिंग की हम सबने और फ़िर परेशान हो गए कि अब आगे तो इतनी यात्रा करनी है जो खरीदा है उस समान का क्या करें ...बहुत मुश्किल से बेटी जहाँ रहती है पी जी के रूप में उसके कमरे में वह सब समान रखा ..समय भी कम था और आगे जाना था तो शापिंग को दी यही मन मार के लगाम ..और इस के बाद चला हमारा कारवां यू एस पिज्जा की तरफ़ ..यह भी एक मजेदार जगह है ..अहमदाबाद की ..१५५ रुपीस में जितना मरजी आए सलाद खायो . पिज्जा खाओ सूप पीयो ...गार्लिक ब्रेड खाओ .सच में हर बार कुछ नया सलाद और दिल भर के खाने की छुट .पर बेचारा पेट भी क्या करे :) इन सबको खाने के बाद देते हैं आइस क्रीम ..वह एक ही देते हैं ..दिल किया सुझाव दूँ भाई यह भी अनलिमिटेड कर दो ...उनसे पूछा की इतनी बेहतरीन है आपकी यह सर्विस आप दिल्ली या एन सी आर में इस को क्यों खोलते ..जवाब दिया धीरे से मेरी छोटी बहन ने की शायद यह जानते हैं की वहाँ के लोग बिंदास है और खूब खाते हैं .. खैर द्वारका जाने का समय Tavera से रात को १२ बजे तय हुआ था अभी जाने में समय था क्या करे ..बच्चो ने शोर मचाया की चलो यहाँ एक मूवी देखेते हैं .टिकेट लिए और देखी वेलकम :) बस मूवी खत्म होते ही जाने का समय भी हो गया ...सबने अपने समान को पैक करके आगे की यात्रा शुरू की ...एक बात माननी पड़ेगी की गुजरात की हाई वे रोड्स और रोशनी सड़कों पर खूब हैं ..पुरा रास्ता साफ सुथरा कही से एक बार नही लगा की हम इतनी रात को सफर कर रहे हैं .दिन में गरम रहने वाला गुजरात रात को काफ़ी ठंडा था ..कहीं कहीं कोहरा भी घना सा आया पर सुबह ५ बजे हम द्वारका में थे यहाँ हमारी कोई बुकिंग नही थी ...और जिस धर्मशाला रेस्ट हॉउस या होटल में पता कर वही फुल ..सुबह होने में अभी देर थी ...हलका सा अँधेरा था अभी माहोल में और कुछ ठंडक भी ..एक ऑटो वाले ने कहा की वह हमारे साथ चल कर बता सकता है की कोई होटल या कुछ देर रहने को झ्गाह मिल जाए ..बहुत तलाश करने के बाद एक कमरा मिला ५०० रुपीस में .हमने कुछ देर ही रुकना था फ़िर आगे निकालना था बेट द्वारका और आगे पोरबंदर के लिए श्री द्वारका नाथ जी का मन्दिर पश्चिम समुन्दर के किनारे है यह हिंदू धरम के चार धामों में से एक माना जाता है यहाँ पर कृष्ण जी की प्रतिमा बहुत ही प्रभावशाली है ...द्वारकानाथ जी के वस्त्र समय अनुसार बदले जाते हैं ,होली ,दिवाली .जन्माष्टमी के मौके पर इनका शिंगार देखने वाला होता है ..यहीं पर पास ही संगम स्थान भी है गोमती नदी के दर्शन भी यहीं होते हैं सब बहुत ही पावन है ..पर वही बात की पण्डे आपको बहुत परेशान करेंगे और गोमती नदी के दर्शन हेतु जायेंगे तो वहाँ इतनी काई है की पैर फिसलने का डर होता है ..और उस पर पंडो का इजहार की यहाँ पर आचमन करो ..खैर हम सबने तो श्रद्धा पूर्वक बस हाथ जोड़े और प्रसाद अपनी श्रद्धा से वहाँ अर्पण किया .अब पेट पूजा की बारी थी सुबह से सबको हिदायत दे दी थी की पहले दर्शन होंगे फ़िर खाने पीने की बात कोई करेगा ,,खाने की लिए जब जगह देखी तो सब तरफ़ ढोकला .दाल वडा,और कुछ नमकीन दिखी ..बताया गया की यहाँ के लोग यही नाश्ता करते हैं ..अब बच्चे यह सब खाने की तेयार नही थे .बहुत मुश्किल से कुछ दूर जाने पर एक पंजाबी होटल मिला ..पर वहाँ का सर्विस करने वाला बन्दा शायद हमसे भी ज्यादा थका था ..इतनी देर में पूरी आलू ,लाया कि हम सब कि भूख भी बाय बाय बोल गई :) आगे चले बेट द्वारका की तरफ़ ...यह समुन्दर के बीच में बना द्वारका नाथ जी का मन्दिर है .इस पर जाने के लिए मोटर बोट करनी पड़ती है ..अब तक १२ बज चुके थे और गरमी पूरी तरह से हावी थी ...एक तो धूप तेज सामने सारा समुन्दर जिसका पानी बहुत ही साफ था और उस पर मोटर बोट वाले टैब तक नही चलते जब तक सवारी पूरी से भी जायदा न हो जाए ..कृष्ण कृष्ण करके मोटर बोट चली ..वहाँ पहुंचे तो पता चला की मन्दिर के द्वार अभी ४ बजे से पहले नही खुलेंगे ,बहार से माथा टेका ...फ़िर वही की मोटर बोट तभी चलेगी जब तक यह पूरी तरह से भर नही जाती है ..उस दिन जो धूप में हम सब टेप ..भूल नही सकते हम उस समय को ..किनारे पहुँचते ही पीया खूब सारा पानी ठंडा तो जान में जान आई ...आगे बढ़ा हमारा कारवां इसके बाद पोरबंदर ...
यहाँ पर हमारी बुकिंग पहले से ही तोरण गेस्ट हॉउस में बिटिया ने करवा रखी थी बहुत ही सुंदर जगह समुन्दर के किनारे ..खुला सा गेस्ट हॉउस देख के ही आधी थकावट उतर गई ...थोड़ा फ्रेश हुए ..और सामने बीच पर जा के बहुत देर तक बेठे रहे .यहाँ के समुन्दर का पानी इतना खारा है कि किनारे पर बालू सख्त चट्टान सी हो चुकी है ..ठंडी हवा में जितनी देर बैठ सकते थे बैठे फ़िर भूख लगने पर वहाँ के स्वागत होटल में गए .बहुत ही अच्छा खाना था वहाँ का अब सब बहुत थके हुए थे ..पर कोई सोने के मूड में नही था . सो क्कुह देर बात गपशप कि ..कुछ देर हँसी मजाक के बाद सब कि आँखे बंद होने लगी ...और जब सुबह उठे तो सब एक दम उगते सूरज से फेश थे सब फटाफट नहाए और हमारा शुरू हुआ सबका फोटोशेशन ..सबने खूब फोटो लिए और चल पढे फ़िर गाधी जी के जन्म स्थान की और ...बहुत ही सुंदर जगह .वहाँ पग पग पर गांधी जी के होने का एहसास था और दिल में था ख़ुद के भारतीय होने का गर्व ..यहाँ कुछ देर रुकने के बाद चल पढे हम सोमनाथ की तरफ़ ...पोरबंदर से सोमनाथ का रास्ता बहुत ही सुंदर है ..बहुत ही हरियाला सा ..नारियल और केले के खेत मन मोह लेते हैं ..इसी रास्ते में आया माधवपुर बीच बहुत ही सुंदर और साफ ..कुछ देर रुक के हमने यहाँ खूब मस्ती की ..फोटो और यहाँ पर खूब सारा नारियल पानी पीने के बाद ..चल पड़े आगे ..सोमनाथ मन्दिर ..यहाँ पर बुकिंग नही थी और यही पर एक अनजान ऑटो वाले ने हमारी बहुत मदद की ..बिना किसी स्वार्थ के उसने हमे उस अनजान जगह पर कई अच्छे होटल दिखाए ..पर नए साल के स्वागत में वहाँ सब होटल फुल थे ...उस अनजान ऑटो वाले ने हमारी बहुत मदद की और आखिर हमे मिल ही गया एक गेस्ट हॉउस ..समान रखा और सोमनाथ मदिर के दर्शन किए .बहुत ही सुंदर मन्दिर है यह समुन्दर के किनारे बना हुआ ख़ुद में कई इतिहास समेटे ..पहले भी कई लुटा गया कई बार बना कई बार टुटा और अब भी शायद आतंकवाद के निशाने पर है तभी बहुत ही ज्यादा सिक्यूरिटी थी ....यहाँ हमे पता नही था पहले सो ज्यादा फोटो नही ले पाये यहाँ के ..रास्ते में विरावल भी देखा जहाँ कृष्ण जी को तीर लगा था और रात को देखा लाईट एंड साउंड शो जो सोमनाथ मन्दिर बनने और टूटने की पूरी कथा बताता है ..अच्छा लगा इसको और अच्छा बनाया जा सकता है ..पर जितना भी देखा बहुत पसंद आया ... समुन्दर की लहरों की आवाज़ उस पर शिव की आरती .सुंदर मन को मोह लेने वाली थी यह ..कभी न भूलने वाला समां है यह ....रात के दस बजने वाले थे हमने रात्रि दर्शन किए और खाना खा के सो गए ..नही नही चुप चाप नही ..कुछ देर आज के घूमने की बातें और कुछ गाने और शरारते कर के ..छोटी बेटी को थोड़ा सा बुखार आ गया था सो सबको कहा अब सो जाओ ..ताकि कल दियू के निकला जा सके .जो वहाँ से सिर्फ़ ८० किलोमीटर की दूरी पर है ..रास्ता बहुत ही सुंदर वही नारियल और केले के पेड़ ..और जब गेस्ट हॉउस पहुंचे तो बस वह देख के मज़ा आ गया यह जगह उन थी दियू से १० किलोमीटर दूर ..दियू शहर बहुत ही सुंदर है .घर इतने सुंदर है की बस वही देखते रहने को दिल करता है ..पर बीच उतना ही गंदे पानी का ..शायद वहाँ होने वाली वाटर गेम्स और चलने वाली मोटर बोट ने पानी को साफ नही रहने दिया .खूब मौज की यहाँ खूब वाटर गेम्स पैरा सीलिंग की ..पानी गन्दा था ...पर हम कहाँ बाज आने वाले थे खूब पानी में खेले ..और रात को दियू का नजारा लिया रात का .अगले दिन था इस साल का आखरी दिन ..इस दिन वहाँ का फमुस फोर्ट देखा चर्च देखा और फ़िर की वाटर गेम्स ..पर शाम होते ही यहाँ का माहोल अजब रंग से रंगने लगा ..सब तरफ़ पिय्कड़ ही पिय्कड़ दिखने लगे .वहाँ से हम भागे क्रूस में जहाँ जम के डांस किया और नए साल का स्वागत ..फ़िर वापस होटल में अपने ..अगले दिन वापसी थी ...कभी न भूलने वाली याद गार यात्रा थी यह ...बहुत मदद की हमारी गाड़ी के ड्राइवर हितेश ने ,और बच्चो के हँसते गाते जोश वाले माहोल ने ..अब फ़िर से इंतज़ार है एक ऐसे ही और यादगार सफर का ...!!

Monday, January 07, 2008

यूं किया हमने स्वागत नए साल का ..[तेरे शहर का मौसम सुहाना लगे ...२ .जीत लिया दिल गुजरात के लोगों ने ]





कुछ समय पहले मैंने लिखा था तेरे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे ..यह पंक्ति थी अहमदाबाद शहर के लिए .एक बार फ़िर से जाना हुआ गुजरात ..और इस बार दिल जीत लिया वहाँ के रहने वालो ने ,हर जगह हमारे लिए नई थी .पर पग पग पर वहाँ के कुछ लोगो ने इतना साथ दिया की नया शहर भी अपना सा लगने लगा चाहे वह हमारे साथ चलने वाला ड्राइवर हितेश हो ..या सोमनाथ मन्दिर ,द्वारका मन्दिर में ऑटो वाला हो ... .......नया साल मनाने की उमंग और बेटी से मिलने की चाह ने दिल को एक महीने पहले ही तैयारी करने को बेताब कर दिया ...बेटी से मिलना और गुजरात घूमने की इच्छा ,और सब बहने और उनके बच्चे साथ ..सच में एक नए साल के स्वागत की नई तैयारी थी ....सफर शुरू हुआ हमारा २६ दिसम्बर से और खत्म हुआ १ जनवरी को ..यह कुछ दिन कैसे पलक झपकते ही गुजरे इसको मेरी बेटी पूर्वा ने बहुत अच्छे से अपनी इस कविता में लिखा है ....इस के बाद मेरे लायक लिखने को क्कुह बचा ही नही ..........हम सबको उसका यह लिखा और पूरी यात्रा को यूं कुछ शब्दों में समेट लेना बहुत अच्छा लगा ...कुछ याद गार लम्हे मैं समय समय पर लिखूंगी जरुर ..पर पहले आप यह पढे और हमारे गैंग के साथ इस यात्रा में शामिल हो जाए :)


इस trip को किया हमने खूब ENJOY

बहुत अच्छे से कहा 2007 को GOODBYE



बहती WAVES के साथ भेज दिया अपने SORROWS को

GANG OF GIRLS ने अकेले घूम के भगा दिया अपने HORRORS को



CRUISE पे DANCE या जगह जगह POSE

मस्ती की WITHOUT TENSION, WITHOUT ANY बोझ


27th को की अहमदाबाद में SHOPPINg

शाम को की US PIZZA में जमकर HOGGING



द्वारका के TEMPLES देखे on 28th

bet द्वारका में नाव में किया बहुत WAIT



एक DIRTY BEACH देखा in Porbandar

29th को गए Gandhiji के घर के अन्दर



थक कर सवारी पहुँची सोमनाथ

GUEST ROOM मिला फ़िर आई जान में जान



30th को हम पहुंचे DIU

PARASAILING से मिला पानी का अच्छा VIEW



पता चला वहाँ की जनता का थोड़ा ढीला है SCREW

पी के टुन्न थे सभी on the BEACH

शक्ल से ही लग रहे थे काफ़ी नीच



ANYWAYS, हमने किया उन्हें ROYALLY IGNORE

और नही करने दिया उन्हें हमें BORE



CRUISE पे मिलाई ताल से ताल

इस तरह we welcomed the नया साल……….पूर्वा द्वारा लिखित:)