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Friday, July 15, 2022

एक सेक्स वर्कर की आत्मकथा (पुस्तक समीक्षा)

 इंसानों की भीड़ के झुण्ड में

कुछ अलग सी  पहचान लिए

होंठ कुछ अधिक लालिमा लिए

पर पुता हुआ एक्स्ट्रा मेकअप

नजरों के इशारे ...

काजल से अधिक चमक कर बातें कर रहे थे

अजब अंदाज़ से हिलते हाथ पांव और उसके खड़े होने का अंदाज़

जैसे किसी कला की नुमाइश करता लग रहा था (पर मज़बूरी से भरा था )

खिलखिला के हँसना बेमतलब था ( पर लग नहीं रहा था )

कोने के दबा कर कभी होंठ कभी नखरा दिखा कर (किसी रंगमंच सी कठपुतली सा था )

बहुत कोशिश थी उन उदासी .उन चिंताओं को भुलाने की

जो घर से चलते  वक़्त बीमार बच्चे के पीलेपन में दबा आई थी

सिमटे हुए बालों में गजरा लगा कर

समेट  ली थी उसने शायद अपनी सभी चिंताएं ( क्यों कि यह अभी कारोबार का वक़्त था )

वो बाजार में थी अपने जिस्म  का सौदा करने के लिए

पर ....क्या वो इतनी ही अलग थी ?

उसके हंसने मुस्कराने की जिद

ठीक उसी "एक ब्याहता या आम औरत सी" ही तो थी ....

जो किसी भी हालत में जानती थी

यही अदा यही जलवे उस "आदम भूख "पर भारी होंगे

जो उसके बच्चो की आँखों  में सुबह दिखी थी ..


अभी कुछ दिन पहले  नलिनी जमीला "की किताब "एक सेक्स वर्कर की आत्मकथा" पढ़ कर यही भाव मेरे दिल से कविता  के रूप में निकले।    

हिन्दी में प्रकाशित  'एक ही पुस्तक है नलिनी जमीला की और यह है उनकी अपनी कहानी, उन्हीं की जुबानी।


 पुस्तक के रूप में मलयालम में यह पहली बार प्रकाशित हुई, और सौ दिन के अन्दर ही इसके छह संस्करण प्रकाशित हो गए। अब तक अंग्रेजी और अन्य कई भाषाओं  में यह प्रकाशित हो चुकी है। शायद ही कभी किसी सैक्स वर्कर ने अपने जीवन की कहानी इतने बेझिझक और बेबाक तरीके से कही हो।वह एक बेटी,पत्नी , माँ, व्यावसायिक महिला और सोशल  वर्कर और साथ में सैक्स वर्कर भी हैं और ये उनके सभी पहलु इस आत्मकथा में उभर कर आते हैं।


यह आत्मकथा कभी रूलाती है तो कभी हँसाती है और कभी अपने दर्दनाक सच से झकझोर कर रख देती है। मज़बूरी में किया गया यह कार्य केरल में बसी सेक्स वर्कर के दर्द को बखूबी ब्यान करता है । इस तरह का कार्य कोई अपनी  मर्ज़ी से नहीं करना चाहता हालात किस तरह से इस   को करने के लिए बेबस कर   जाते हैं यह उनकी इस आत्मकथा में ब्यान हुआ है। बाद में उन्होंने इस में एक संगठन ज्वालामुखी  से जुड़ कर भी   के कार्य किया  वह भी  इस में ब्यान है । दर्दनाक है सब पढना पर कुछ भाषा मे अनुवादित होने के कारण कहीं कहीं बोझिल सी भी  लगती है पर फिर भी बहुत हिम्मत चाहिए अपनी इस आत्मकथा  को  लिखने के लिए जो "नलिनी जमीला "ने इसको लिख कर की है


बहुत मसाला या कोई बढ़ा चढ़ा कर इसको नहीं लिखा गया जो ज़िन्दगी ने रंग दिखाए इस राह पर चलते हुए वह ही उनकी कलम से लिखे गए हैं । बचपन में पढने की इच्छा लिए हुए ही कई काम करते हुए जैसे मिटटी ढोना आदि काम करने पढ़े फिर पैसे की जरुरत  आगे उसको इस राह पर  गयी साथ ही यह हमारे समाज  के उस पहलु भी दिखाती है जो एक तरह से हिप्पोक्रेट है ।


 अपने आप को और अपनी बच्चो को जिंदा रखने के लिए वो हर काम करने की कोशिश में रहती है पर अंत में यह उसकी जीविका का साधन बन जाता है। एक सच्चाई से लिखी गयी यह एक बेबस बेबाक आत्मकथा है जो सच के कई पहलु से रूबरू करवाती है ।

हिंदी में इसको अनुवाद किया है Rachna Bhola Yamini  ने ।


Thursday, July 07, 2022

आजादी मेरा ब्रांड (पुस्तक समीक्षा)

 आजादी मेरा ब्रांड ( अनुराधा बेनीवाल)

यह किताब जिसने भी पढ़ी वह इस लिखने वाली" अनु" से प्रभावित हुआ और कुछ न कुछ लिखा जरूर इस किताब के बारे में।

 मेरे पास यह किताब पिछले एक साल से पढ़े जाने के इंतजार में रखी थी, अब जब शुरू की तो दो दिन में पढ़ कर ही चैन आया। इस किताब में वो सब कुछ लिखा है जिसके सपने मेरे जैसे कई और भी लेते होंगे ,पर हम सिर्फ सपने  लेते रह गए और "अनुराधा बेनीवाल" ने इसको सोलो ट्रिप में घूम कर सच कर दिखाया। 

   इस किताब में सिर्फ घूमने की ही बात नहीं है, इसमें वो भी सब है जो हम अक्सर अपने अंदर सोचते हैं पर कह नहीं पाते हैं या कर ही नहीं पाते हैं। पूरी किताब में कितनी जगह मैने उन लिखित वाक्यों को अंडरलाइन किया जिसे पढ़ कर लगा कि सच है यह कितना हम लोगों को बस अपने अंदर झांकने की जरूरत है। वाकई हम सब इस तरह से पले बढ़े हैं कि अपनी खुशी की चाबी भी दूसरों को दे देते हैं।अपनी किसी भावना का कोई एहसास ही नहीं रहता है। किसी एक खुशी को बताने के लिए सामने वाले पर इतने निर्भर हो जाते हैं कि उसके मूड के आगे अपनी खुशी गम उधार पर दे देते हैं। जब हम खुद में खुशी ढूंढ लेते हैं दूसरे पर बोझ नहीं उसके साथी होते हैं। यहां बहुत बढ़िया उदहारण के साथ लिखा है कि " आप एक दूसरे के लिए विक्रम और बेताल नहीं होते ।एक दूसरे की खुशी निचोड़ने के लिए नहीं होते । एक दूसरे की खुशी साझा करने बढ़ाने के लिए साथ होते हैं।" 

  मेरे ही जन्मस्थान "रोहतक से निकली यह लड़की जिस तरह से यूरोप की अपनी यात्रा करती है वह वाकई एक बहुत बढ़िया प्रेरणा है। हमारे देश में घूमने पर डर है जो वह बाहर के देशों में नहीं पाती ।सिर्फ घूमने के दम पर अनुराधा खुद लड़कियों और पूरे समाज की सोच को बदलने की बात करती हैं, ‘तुम चलोगे तो तुम्हारी बेटी भी चलेगी और मेरी बेटी भी. जब सब साथ चलेंगी तो सब आजाद, बेफिक्र और बेपरवाह ही चलेंगी. दुनिया को हमारे चलने की आदत हो जाएगी. अगर नहीं होगी तो आदत डलवानी पड़ेगी, डरकर घर में मत रह जाना. तू खुद अपना सहारा है. तुम अपने-आप के साथ घूमना. अपने तक पहुंचने और अपने-आप को पाने के लिए घूमना,तुम घूमना !‘अनुराधा इस समाज की आंख में आंख डालकर बहुत सारे सवाल पूछती हैं, ‘आखिर एक लड़के को एक लड़की के साथ बेहतर जीवन जीने की तैयारी पहले से क्यों नहीं करनी चाहिए?’ यह देखकर कुछ जलन सी होती है कि जितनी सुरक्षा हमें अपने घर और अपने देश के भीतर नहीं मिलती, उससे कहीं ज्यादा सुरक्षित लेखिका खुद को अंजान देश के अंजान लोगों के बीच पाती है. अनुराधा यूरोप के 13 शहरों में अंजान लोंगों के घर रुकीं. अंजान लोगों के साथ कार में लंबी यात्रा की।हम अपने देश की राजधानी में देर रात अकेले टैक्सी लेने की हिम्मत नहीं कर सकते।लेकिन अनु  रात के किसी भी वक्त टैक्सी लेती हैं।

यह किताब टूरिस्ट और घुमक्कड़ के बीच का फर्क बहुत अच्छे से  समझाती है कि शहर टूरिस्टों को लूटता है, जबकि घुमक्कड़ों से दोस्ती करता है, ‘जब आप थोड़े समय के लिए ही किसी नए शहर में होते हैं तो होटल में रहकर सिर्फ पोस्टकार्ड वाला शहर ही देख पाते है. शहर की आत्मा छुपी रह जाती है. आप टूरिस्ट होते हैं तो शहर भी आपको टूरिस्ट जैसे ही ट्रीट करता है. वह आपसे पैसे भी ज्यादा लेता है. लेकिन अगर आप शहर में टूरिस्ट नहीं, दोस्त के जैसे रहते हैं तो शहर भी आपको दोस्त जैसे ही ट्रीट करता है.’

 यदि आप ने अब तक यह किताब नहीं पढ़ी है तो जरूर पढ़े । यह किताब न केवल बाहर जगह की यात्रा करवाती है ,यह आपको अपने अंदर के उन सवाल जवाब की भी यात्रा करवाती है। यह सिखाती है कि घूमने से ही आप दुनिया को आसानी से समझ पाते हैं। और घुमक्कड़ी ही जिंदगी की असली पाठशाला है। अलग अंजान लोगों के घर रुकना और उन्हें समझना ही वाकई सही में वहां से असली परिचय करवाता है। किताब बहुत ही सरल और सहज ढंग से लिखी गई है। रोचक है और घुमक्कड़ी का सपना देखने वालों के लिए एक बढ़िया प्रेरणा।


   आजादी मेरा ब्रांड 

अनुराधा बेनीवाल

राजकमल प्रकाशन

मूल्य 199


   




Monday, June 06, 2022

ट्रेन टू पाकिस्तान .. खुशवंत सिंह

 


"पाकिस्तान मेल " खुशवंत सिंह की लिखी यह किताब  बहुत रोचक ढंग से लिखी गई है  ,बंटवारे पर लिखी यह किताब की शुरुआत 1947 की गर्मियों से शुरू होती है और अंत तक अपने लिखे से आंसुओं की बारिश में भिगो कर मानसून पर खत्म हो जाती है। 

  सम्पूर्ण बंटवारे का लिखा हुआ एक एक करके आंखों के सामने जैसे घटता हुआ महसूस होता है। "मनो माजरा" गांव का चित्रण सजीव हो कर बिल्कुल अपने बचपन का बीता गांव जैसा दिखता है। वही गुरुद्वारे के शब्द कीर्तन ,वही मस्जिद की अज़ान जैसे सब वहीं अटका हुआ है। 

  इकबाल, जग्गा , हुकमचंद सब चरित्र अपने अपने लिखे पात्र के साथ सम्पूर्ण न्याय करते दिखते हैं। खुशवंत सिंह ने किताब में विभाजन के दर्द को समेटने के साथ अन्य बातों को भी बहुत सुंदर ढंग से लिखा है । लाशों से भरे ट्रेन के डब्बे, हजारों लाशों को एक साथ जलाने वाले वीभत्स दृश्य को शब्द देना हो अथवा अपने बेटी के उम्र की लड़की को छूते हुए हुकुमचंद की मनोदशा का वर्णन हो , सभी लिखा हुआ जैसे दिल को झंझोर जाता है।

   पाकिस्तान मेल  सिर्फ एक किताब नहीं है बल्कि यह विभाजन के समय का एक पूरा दस्तावेज है । मैने कहीं पढ़ा था कि यह उनकी सर्वाधिक प्रिय रचना थी क्योंकि इसी ने उन्हें लेखक के रूप में स्थापित किया और लोकप्रिय बनाया । स्वयं खुशवंत भी ऐसा ही मानते थे । उन्होंने अपनी सबसे बेहतरीन रचनाएं तब ही लिखी जब वो परेशान रहे । "ट्रेन टू पाकिस्तान" वैसे इंग्लिश में लिखी गई है ,इसका हिंदी अनुवाद "पाकिस्तान मेल", उषा महाजन ने बहुत सुंदर ढंग से लिया है कि कहीं भी पढ़ते हुए अलग सा नहीं दिखता।   किताब को लंदन की ग्रोव प्रेस ने उस समय 1 हजार डॉलर का इनाम भी दिया था । बाद में इसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ । 

   आज जब देश में साम्प्रदायिक सौहार्द अक्सर बिगड़ते रहता है ऐसे में यह किताब पढ़ना जरूरी है कि आपसी वैमनस्य किस तरह से सिर्फ दुख और त्रासदी ही देता है। मुझे तो अब आज कल का वक्त जैसे इसी बंटवारे की याद दिला रहा है। 

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Friday, December 07, 2012

किशोर चौधरी और उनका लिखा मेरी कलम से .............

किशोर चौधरी ..........


.परिचय .....रेत के समंदर में बेनिशाँ मंज़िलों का सफ़र है. अतीत के शिकस्त इरादों के बचे हुए टुकड़ों पर अब भी उम्मीद का एक हौसला रखा है. नौजवान दिनों की केंचुलियाँ, अख़बारों और रेडियो के दफ्तरों में टंगी हुई है. जाने-अनजाने, बरसों से लफ़्ज़ों की पनाह में रहता आया हूँ. कुछ बेवजह की बातें और कुछ कहानियां कहने में सुकून है. कुल जमा ज़िन्दगी, रेत का बिछावन है और लोकगीतों की खुशबू है.
रुचि ----आकाशवाणी से महीने के 'लास्ट वर्किंग डे' पर मिलने वाली तनख्वाह
पसंदीदा मूवी्स--- जब आम आदमी किसी फिल्म को देखने का ऐलान करता है, टिकट खिड़की पर मैं भी अपना पसीना पौंछ लेता हूँ.
पसंदीदा संगीत ---लोक गीत और उनसे मिलते जुलते सुर बेहद पसंद है. कभी-कभी उप शास्त्रीय और ग़ज़लें सुनता हूँ.
पसंदीदा पुस्तकें ---किताबों को पढने की इच्छा अभी भी कायम है.























जिसका परिचय ही इतना रोचक हो ..उसके लिखे हुए को पढना कैसा होगा ,यह पढने वाला खुद ही जान सकता है :)

किशोर चौधरी के लिखे से मैं वाकिफ हुई जब से मैंने उनका ब्लॉग हथकड़  और बातें बेवहज पढ़ी | बातें जो कविता की तरह से    लिखी गयी थी वह बेवजह ही लिखी गयी थी पर वह इतनी पसंद आने की वजह बन गयी कि  मैंने उनके प्रिंट आउट ले कर कई बार पढना शुरू किया और किशोर जी को सन्देश भी भेजा हो सके तो आप इन बातो को एक किताब की शक्ल में ले आयें ..मेरी तरह बहुत से पाठक आपको यूँ पढना चाहेंगे ..पर मैं अदना सी पाठक ,बात गोल मोल जवाब में खतम हो गयी | अब किशोर जी के दो संग्रह बातें बेवजह और चौराहे पर सीढियां एक साथ आये और उनसे दिल्ली में मिलना भी हुआ तो मैंने उन्हें यह बात याद दिलाई ..और ख़ुशी जाहिर की ..कि मेरे जैसे उनके पढने वालों के लिए यह एक बहुत बढ़िया तोहफे जैसा है | किशोर जी से मिलना भी एक तरह से मेरे लिए उनके लिखे से मिलना था | वह अक्सर पूछी गयी बातों का बहुत मुक्तसर सा जवाब देते हैं ...जिस से पता चलता है कि वह बहुत कम बोलने वाले इंसान हैं ,पर मिलने पर ऐसा नहीं लगा ..जितनी देर उनके साथ बैठने का वक़्त मिला उनको सुना ,उनके लिखने की वजह को सुना ..और वह क्या सोच कर कैसा लिखते हैं वह पढ़े गए कई किरदार .कई बातें बेवजह मेरे मन में अन्दर चलती रही|उनकी ज़िन्दगी की बातें उनकी  बाते बेवजह में ..सामने आती रही
ज़िन्दगी गुल्लक सी होती तो कितना अच्छा होता
सिक्के डालने की जगह पर आँख रखते
और स्मृतियों के उलझे धागों से बीते दिनों को रफू कर लेते.
...सच में ऐसा होता तो क्या न होता फिर ..
लिखना कैसे शुरू हुआ ....कहानी का पूछने पर उन्होंने बताया कि वह लिखते थे बहुत पहले से पर हर साल उन डायरी /कापी को फाड़ दिया करते थे .ताकि उनको कोई और न पढ़ सके क्यों कि उस समय उस में उम्र की वो नादानियाँ भी शामिल हो जाती थी जो समय के साथ हर इंसान जिनसे वाकिफ होता है ..फिर खुद उन्ही के शब्दों में "मैंने यूं ही कहानियाँ लिखनी शुरू की थी। जैसे बच्चे मिट्टी के घर बनाया करते हैं। ये बहुत पुरानी बात नहीं है। साल दो हज़ार आठ बीतने को था कि ब्लॉग के बारे में मालूम हुआ। पहली ही नज़र में लगा कि ये एक बेहतर डायरी है जिसे नेट के उपभोक्ताओं के साथ साझा किया जा सकता है।"हर महीने कहानी लिखी। कहानियाँ पढ़ कर नए दोस्त बनते गए। उन्होने पसंद किया और कहा कि लिखते जाओ, इंतज़ार है। कहानियों पर बहुत सारी रेखांकित पंक्तियाँ भी लौट कर आई। कुछ कच्ची चीज़ें थी, कुछ गेप्स थे, कुछ का कथ्य ही गायब था। मैंने मित्रों की रोशनी में कहानियों को फिर से देखा। मैंने चार साल तक इंतज़ार किया। इंतज़ार करने की वजह थी कि मैं समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं से प्रेम न कर सका हूँ। इसलिए कि मैं लेखक नहीं हूँ। मुझे पढ़ने में कभी रुचि नहीं रही कि मैं आरामपसंद हूँ। मैं एक डे-ड्रीमर हूँ। जिसने काम नहीं किया बस ख्वाब देखे। खुली आँखों के ख्वाब। लोगों के चेहरों को पढ़ा। उनके दिल में छुपी हुई चीजों को अपने ख़यालों से बुना। इस तरह ये कहानियाँ आकार लेती रहीं।..और आज हमारे सामने एक संग्रह के रूप में है |
           उनके डे  ड्रीमर में एक रोचक बात उन्होंने पेंटिंग सीखने की भी बताई कि कैसे उनके पिता जी ने उन्हें पेंटिंग सीखने के लिए भेजा और सिखाने वाले गुरु जी तो अपनी पेंटिंग सामने कुदरती नज़ारे को देख कर खो कर सीखा गए और किशोर जी आँखे खोले ड्रीम में खोये रहे कि उनकी पेंटिंग बहुत बढ़िया बनी है और लोग वाह वाही कर रहे हैं ..और गुरु जी के कहने पर ,आँख खुलने पर सामने खाली कैनवास था ..मजेदार रहा यह सुनना उनके खुद की  जुबानी ..पर क्या यह मन का कैनवास वाकई कोरा रहा होगा .??.यहाँ तो कई सुन्दर कहानियाँ और बाते बेवजह जन्म ले रही थी |
उनसे हुई बात चीत में यह बातें वहां उनके जुबानी भी सुनी और उनकी नजरों से उनके लफ़्ज़ों में दिल्ली को भी देखा ..आईआईटी की दूजी तरफ
पश्चिमी ढब के बाज़ार सजे हैं
कहवाघरों के खूबसूरत लंबे सिलसिलों में
खुशबाश मौसम, बेफिक्र नगमें, आँखों से बातों की लंबी परेडें
कोई न कोई कुछ तो चाहता है मगर वो कहता कुछ भी नहीं है।

सराय रोहिल्ला जाते हुये देखता हूँ कि
सुबह और शाम, जाम में अकड़ा हुआ सा
न जाने किस ज़िद पे अड़ा ये शहर है। ये अद्भुत शहर है, ये दिल्ली शहर है।
...दिल्ली शहर को इस नजर से देखना वाकई अदभुत लगा |मुझे पढ़ कर ऐसा लगा कि  लिखने वाला दिल, दिमाग अपनी ही सोच में उस शहर को लिखता है परखता है ..वह बहुत बार दिल्ली आये होंगे पर मैं अब भी याद करूँ तो उनकी वही उत्सुक सी निगाहें याद आती है जो बरिस्ता कैफे के आस पास घूमते .बैठे लोगो को देख रही थी .सोच रही थी .और मन ही मन कुछ न कुछ लफ्ज़ बुन  रही थी |पक्के तौर पर कह सकती हूँ कि  जो सोचा बुना गया उस वक़्त ,वह हम हो सकता है आगे आने वाली कहानियों में पढ़े या बातें बेवजह में सुने |
             उनके संग्रह चौराहे पर सीढियां कहानियों पर कुछ लिखा है पहले भी ..पर वो सिर्फ तीन पढ़ी कहानियों पर था .जैसे जैसे उनकी और कहानियाँ पढ़ी ..उनके लिखे से उन्हें और समझने की कोशिश जारी रही ..कोई भी कहानी यदि आपके जहन पर पढने के बाद भी दस्तक देती रहे तो वह लिखना सार्थक हो जाता है | और जब पढने वाला पाठक यह महसूस करे की उन में लिखे कई वाक्य  बहुत कुछ ज़िन्दगी के बारे में बताते हैं और उन में साहित्य ,ज़िन्दगी का फलसफा मौजूद है .साथ ही यह भी कि  हर कहानी ऐसी नहीं की आप समझ सको पर उसने में लिखी बातें आपको कुछ सोचने समझने पर मजबूर कर दे तो लिखना वाकई बहुत असरदार रहा है लिखने वाले का | यह संग्रह अपनी चौदह कहानियों में कही गयी किसी न किसी बात से पढने वाले के दिलो दिमाग पर दस्तक देता रहेगा ...बेशक यह एक बैठक में न पढ़ा जाए पर यदि आप अच्छा साहित्य पढने वालों में से हैं तो यह संग्रह आपकी बुक शेल्फ में अवश्य होना चाहिए | चौराहे पर सीढियां यह शीर्षक ही पढने वाले को एक ऐसी जगह में खड़ा कर देता है कि  आप अपना रास्ता किस तरह से कहाँ कैसे चुनना चाहते हैं वह आपके ऊपर है |समझना भी शायद आपके ऊपर है कि  आप उसको कैसे लेते हैं .बाकी पढने वालों का पता नहीं .पर मैं अक्सर कई कहानियों में गोल गोल सी घूम गयी ..और वह मेरे पास से हो कर गुजर गयी ..यही कह सकती हूँ शायद वह सीढियां जो बुनी गयी लफ़्ज़ों में ,मैं उन पर चढ़ने समझने में नाकाम रही ...लिखने वाले ने अपनी बात पूरी ईमानदारी से लिखी होगी |
....अब कुछ बातें उनकी बेवजह बातों पर ....मुझे वह बातें कभी कविता सी नहीं लगी .बस बातें लगी जो अक्सर हम खुद बा खुद से करते हैं ,या अक्सर मन ही मन कुछ बुनते रहते हैं लफ़्ज़ों में .....मुझे यह बेवजह बातें दिली रूप से पसंद हैं क्यों कि मुझे यह दिल की  आवाज़ लगीं और जब जब पढ़ा सीधे दिल में उतरीं ..और जब किशोर जी से जाना की क्यों उन्होंने यह बेवजह बातें लिखनी शुरू की तो एक मुस्कान मेरे चेहरे पर आ गयी .अक्सर ज़िन्दगी आपको उन लोगो से मिला देती है जिस को आप बहुत कुछ कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते हैं ..मेरे ख्याल से यदि वह बाते कहने वाले के हाथ में कलम है तो इस से बेहतर जरिया कोई नहीं हो सकता अपनी बातों को कहने का ..पर चूँकि यह बातें बेवजह है ..सो यह आसानी से अपनी जगह आपके दिल में भी बना लेती है .और  मुझे लगता है कि  हर इंसान कभी न कभी इस मोड़ से इस राह से गुजरा
जरुर है ....

तुम ख़ुशी से भरे थे
कोई धड़कता हुआ सा था
तुम दुःख से भरे थे
कोई था बैठा हुआ चुप सा. ....
......और यह सब कुछ  उसके बारे में है जो है ही नहीं

सब कुछ उसी के बारे में है
चाय के पतीले में उठती हुई भाप
बच्चों के कपड़ों पर लगी मिट्टी
अँगुलियों में उलझा हुआ धागा
खिड़की के पास बोलती हुई चिड़िया।

....इन बातों बेवजह में अक्सर शैतान  का जिक्र आया है जो कहीं अपनी ही आवाज़ सा लगता है ....
हवा में लहराती हरे रंग की एक बड़ी पत्ती से
प्रेम करने में मशगूल था, हरे रंग का टिड्डा
पीले सिट्टे की आमद के इंतज़ार में थी पीले रंग की चिड़िया
शैतान ने सोचा आज उसने पहना होगा, कौनसा रंग.
....यह सवाल बहुत साधारण सा होता हुआ भी ख़ास सा लगता है | उनकी बाते बेवजह में उनके रहने की मिटटी का रंग भी अक्सर कई जगह पढने को मिला है जो एक स्वाभविक रंग है आप जहां रहते हैं वहां का होना आपके लिखे में सहजता से अपनी जगह बना लेता है ..........उन्ही के शब्दों में ..किसी शाम को छत पर बैठे हुये सोचा होगा कि यहाँ से कहाँ जाएंगे। बहेगी किस तरफ की हवा। कौन लहर खेलती होगी बेजान जिस्म से। किस देस की माटी में मिल जाएगा एक नाम, जो इस वक़्त बैठा हुआ है तनहा। उसको आवाज़ दो। कहो कि तनहाई है। बिना वजह की याद के मिसरे हैं। रेगिस्तान में गीली हवा की माया है। पूछो कि तुम कहीं आस पास हो क्या? अगर हो तो सुनो कि मेरे ख़यालों में ये कैसे लफ़्ज़ ठहरे हैं…. "
स्त्री मन के कई रंग भी उतरे हैं उनकी बाते बेवजह में ........
ख़ूबसूरत औरतें नहीं करती हैं
बदसूरत औरतों की बातें
वे उनके गले लग कर रोती हैं। 
दुःख एक से होते हैं, अलग अलग रंग रूप की औरतों के।  ......यदि कोई पुरुष मन इस बात को समझता है तो वह बहुत बेहतरीन तरीके से ज़िन्दगी को समझ सकता है |बाते बेवजह बहुत सी है और उन पर जितना लिखा जाए वह बहुत कम ...किशोर जी का लिखा और उनसे मिलना मुझे कहीं से भी एक दूजे से जुदा नहीं लगा | एक बहुत सरल ह्रदय इंसान जो लिखता तो खूबसूरती से है ही उतना  ही जुड़ा हुआ है अपनी मिटटी से अपने परिवार से ...और अपने पढने वाले पाठकों से ...बाते बेवजह चढ़ रही है धीरे धीरे कहानी बुनती हुई अपनी सीढियां कदम दर कदम और अपने होने के एहसास जगा रही है हर पढने वाले के दिल में |यही बहुत बड़ी बात है | कोई भी लिखने वाला आगे तभी बढ़ पाया है जब उसको पढने वालों से सरहाना मिली है प्यार मिला है और किशोर जी की झोली में उनके पाठकों ने यह भरपूर दिया है |
           पहले कदम हैं अभी इन सीढ़ियों पर चढ़ने पर ..कुछ अलग से लग सकते हैं पर मजबूत हैं और अपनी मंजिल तक पहुंचेंगे जरुर यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है और साथ ही यह भी कि ब्लॉग के लेखन से शुरू हुआ यह सफ़र अब आगे और भी लिखने वालों को ,पढने वालों को एहसास दिलवा देगा की ब्लॉग लेखन सिर्फ समय खर्च या पास करने का जरिया नहीं है यह आगे साहित्य को समृद्ध करने का रास्ता भी है | चलते चलते उन्ही का बताया हुआ याद आया कि उनके डे ड्रीम में एक ऐसा मंच भी है या था अब भी (किशोर जी यह  बेहतर जानते होंगे) कि वह रेड कारपेट पर चल रहे हैं आस पास बहुत सी सुन्दर कन्याएं  हैं :)  और वाकई उनको आज प्यार करने वालों और चाहने वालों की कमी नहीं है ...आज जब उनके दो संग्रह आ चुके हैं तो लगता है यह ड्रीम असल में रंग जरुर जाएगा यही दुआ है कि वह ज़िन्दगी के सुन्दर रास्ते पर ..यूँ ही मंजिल दर मंजिल सीढियां चढ़ते रहे | उन्ही की लिखी एक बेवजह बात ..जो मुझे बेहद बेहद पसंद है ,क्यों कि यह बहुत सच्ची है ज़िन्दगी सी . और कम से कम मेरे दिल के तो बहुत ही करीब है

दरअसल जो नहीं होता,
वही होता है सबसे ख़ूबसूरत
जैसे घर से भाग जाने का ख़याल
जब न हो मालूम कि जाना है कहां.

लम्बी उम्र में कुछ भी अच्छा नहीं होता

ख़ूबसूरत होती है वो रात, जो कहती है, न जाओ अभी.

ख़ूबसूरत होता है दीवार को कहना, देख मेरी आँख में आंसू हैं

और इनको पौंछ न सकेगा कोई
कि उसने जो बख्शी है मुझे, उस ज़िन्दगी का हाथ बड़ा तंग है.

कि जो नहीं होता, वही होता है सबसे ख़ूबसूरत. 



 चौराहे पर सीढ़ियाँ/कहानियाँ/ पृष्ठ 160/ मूल्य 95 रु./ प्रकाशक हिन्द युग्म/

Tuesday, December 04, 2012

चौराहे पर सीढियां




समपर्ण ..--अत्याचार की मौन स्वीकृति ,वफ़ा -तू जो चाहे करने की अनुमति दे .पतिता --जो साथ सोने से इनकार कर दे .वार्डन--सरकार की ओर  से नियुक्त किये गए दलाल .इसके बाद ज़िन्दगी लिख कर कई सारे अपमानजनक शब्द लिखे गए हैं ......यह परिभाषाएं हैं चौराहे पर सीढियां ..किशोर चौधरी द्वारा लिखित कहानी संग्रह की .अंजली तुम्हारी डायरी से तुम्हारे ब्यान मेल नहीं खाते ..कहानी  से ........हर कहानी अपनी बात मन के गहरे में यूँ कह जाती है कि  उसको भूलना मुश्किल हो जाता है ...इस किताब की समीक्षा करना बहुत मुश्किल है ..क्यों कि  यह कहानियाँ सिर्फ कहानियाँ ही नहीं है ,ज़िन्दगी में रोज़ उगते सूरज ओर ढलती शाम के बीच की बातें हैं ...जिन में रात के अनकहे अंधेरों की सच्चाई भी है और सुबह उगते सूरज की रौशनी में ओस की बूंदों में छिपी दर्द की आवाज़ भी है | यह कहानियाँ एक ही बैठक में पढ़ ली जाएँ ,यह मुमकिन नहीं है .इनको पढना और फिर जुगाली की तरह उनको मन में मंथन में डुबोना ही सही समझने की बात को समझ पाना है |
..मैंने अभी तक इस संग्रह में तीन कहानियाँ ही पढ़ी हैं और वह ही मेरे जहन से उतर नहीं रही हैं ....आज की इस बात में सिर्फ उन कहानियों में आई पंक्तियों की बात .और उनको समझने की बात ...: यह लिखी पंक्तियाँ ही इन कहानियों की समीक्षा है .....जो खुद ही अपनी बात कहती है ...
अंजलि तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खाते .."ज़िन्दगी आज में तुम्हारा आभार व्यक्त करना चाहती हूँ |सिगरेट के कडवे और नशे भरे स्वाद के लिए .मुह्बब्त के होने और खोने का एहसास को समझाने के लिए ,सबको अलग सुख और अलग तरीके की तकलीफ देने के लिए ,भेड़ियों के पंजो से भाग जाने का साहस देने के लिए और मनुष्य को बुद्धि देने के लिए की वह शुद्ध और पीड़ा रहित जहर बना सकने में कामयाब हुआ |" ....यह पंक्तियाँ और यह कहानी इतनी सच्ची है की यह भूल नहीं सकते आप इसको पढने के बाद ...अंजली करेक्टर आपके आस पास घूमता रहता है और हर लिखी पंक्ति में अपनी बात अपने होने के एहसास दिलाता रहता है |

दूसरी कहानी जो मैंने पढ़ी इस संग्रह में गली के छोर पर अँधेरे में डूबी एक खिड़की ..शुरू होती है बहुत साधारण  ढंग से यह कहानी सुदीप और रेशम की मुलाकतों की ....और फिर पढने वाला पाठक भी खुद को उस गली ,खिड़की के पास होने को महसूस करता है .किशोर जी की लिखी कहानी की यह विशेषता उसे पढने वाले को अलग नहीं होने देती ..."वह पगलाया हुआ दुधिया रौशनी के बिछावन पर खड़ा खिड़की को चूमता रहता था |कुछ नयी खुशबुएँ भी उस खिड़की में पहली बार मिली |एक रात इसी उन्माद में वह अपने सात रेशम की चुन्नी ले आया|वह रेशम के वजूद को टुकड़ों में काट कर अपने भीतर समेट लेना चाहता था |"पर यही कहानी आगे चल कर ऐसा मोड़ ले लेती है समझ के भी सब कुछ अनजाना सा महसूस होने लगता है ..ठीक इन लिखी पंक्तियों की तरह ..चाहे आप खुश हैं या दुखी .ये ज़िन्दगी अजब गलतफहमियों का पिटारा है |हरे भरे जंगलों में आग लगती है और वे राख में बदल जाया करते हैं |हम सोचते हैं कि  जंगल बर्बाद हो गया लेकिन उसी राख से नयी कोंपलें फूटती है |" पढने में यह पंक्तियाँ किसी फिल्सफी सी लगती है पर ज़िन्दगी के सच के बहुत करीब हैं |
इस कहानी का अंत .मुझे अभी तक असमंज में डाले हुए हैं कि  ..आखिर उस रात खिड़की पर कौन था ?इस कहानी के नायक सुदीप की तरह :)
तीसरी कहानी जो पढ़ी है वह है एक फासले के दरम्यान खिले हुए चमेली के फूल ....सफ़ेद खिले हुए यह फूल जब किसी याद से जुड़े हुए होते हैं तो कैसा सर्द और जलन का आभास देते हैं यह इस कहानी को पढ़ कर जाना जा सकता है ...एक घर ..घर के आँगन में लगी चमेली के फूल की बेल ...नैना और तेजिन्द्र सिंह के लिए एक यादों का जरिया है जो अपने खिले सफ़ेद फूलों से नैना के लिए बीती ज़िन्दगी का दर्द हैं वहीँ तेजिंदर के लिए उस बेटे की लगाईं बेल जो उसने अपनी माँ की पसंद को जान कर वहां लगाई थी पर  अब वहां नहीं रहता  ...उन फूलों की खुशबु दोनों के लिए एक दर्द की कसक है पर दोनों सिर्फ उसी कसक में अपनी जिंदगी सहजते रह जाते हैं .इंसान जिस चीज़ से पीछा छुड़ाना चाहता है कभी कभी वो ही अतीत सबसे ज्यादा शिद्द्त से पीछा करता है....यही इसी कहानी में नजर आता है |
 ...आसमां से टूटे तारे के बचे हुए अवशेष जैसा या फिर से हरियाने के लिए खुद को ही आग लगाते जंगल जैसा. जैसे जंगल खुद को आग लगता है वैसे ही कई पंछी भी आग में कूद जाते हैं. जंगल अपनी मुक्ति के लिए दहकता है या अपने प्रिय पंछियों के लिए,.....किशोर जी लिखने की यही विशेष शैली मन्त्र मुग्ध कर देती है .....यह कहानी भी ज़िन्दगी की सच्चाई के बहुत करीब की लगती है .वो परिवेश जिस में यह ढली है अपना सा ही लगता है ...यह कहानी बहुत दिनों तक याद रहने वाली है ..अपने कुछ विशेष भावों के साथ और आपकी लिखी इस जैसी कई पंक्तियों के साथ .जैसे यह ...."ये तुम्हारी ज़िद थी, और घर भी... मैं इसका भागीदार नहीं हूँ"किशोर जी की लिखी कहानियाँ भी यूँ ही कसक सी दे जाती है अंतर्मन में और महकती हैं इन्ही  सफ़ेद फूलों की तरह ..हर कहानी का अंत सुखद हो यह जरुरी नहीं है ...अतीत में डूबे दोनों पात्र क्यों अपनी ज़िन्दगी के दर्द से उभर नहीं पाते यह सवाल भी सहसा मन में आता है | क्यों उस सफ़ेद फूलों में अपने अतीत के साथ वर्तमान को जी रहे हैं यह सोच साथ साथ छलकती रही है उनके लिखे शब्दों में |
इनकी लिखी कहानियों के बारे में अधिक लिखना मेरे लिए बहुत संभव नहीं है ,बस यह वह कहानियाँ है जिस में आप खुद को पाते हैं ,इन में लिखे वाक्य आपको अपने कहे लगते हैं ..दर्द की लहर जब पढ़ते हुए पैदा होती है तो वह लहर अपने दिल से उठती हुई सी लगती है .."जगह जगह उगा हुआ खालीपन" जैसे शब्द आपको अपने अन्दर खालीपन का एहसास करवाते हैं |
बहुत कुछ लिखा जा चुका है अब तक किशोर जी के लिखे इस संग्रह के बारे में ...अधिक क्या लिखूं यह अभी तक पढ़ी गयी कहानियों में मेरी पंसद की पंक्तियाँ है ....बहुत बढ़िया शुरुआत है यह हिंदी कहानी में इस संग्रह के साथ ..आगे और भी बेहतर पढने को मिलेगी इसी उम्मीद के साथ फिर कोशिश करुँगी कुछ और लिखने की उनकी पढ़ी कहानियों पर .....आप यह किताब इन्फीबीम और फ्लिप्कार्ट से ले सकते हैं 

Friday, November 16, 2012

कैसा होमोसेपियंस?


कैसा होमोसेपियंस ?(कविता-संग्रह)

मूल्य- रु 150
प्रकाशक- हिंद युग्म,
1, जिया सराय,
हौज़ खास, नई दिल्ली-110016
(मोबाइल: 9873734046) इन्फीबीम पर खरीदने का लिंक

मेरे अन्दर सीलन ....थी भी?
मुझे याद नहीं
जब से देखा है...खुद को
ऐसा ही पाया है
चेहरा नम होता है
और आंखें खाली... बदन गीला रहता है
और जेहन खाली न जाने कब..
किस हादसे में...?
क्या बह गया है....
कमबख्त....आंखों से लहू के सिवा
कुछ उतरता ही नहीं !

अभिषेक पाटनी की लिखी यह पंक्तियाँ उनके परिचय के साथ जब पढ़ी थी तो ही वह विशेष लगी थी और जब उनका संग्रह कैसा होमोसेपियंस पढ़ा तो उत्सुक हुई यह जानने के लिए कि आखिर इसका नाम इस तरह का क्यों रखा गया ? हिंदी कविता का संग्रह और नाम वैज्ञानिक ?जो विज्ञान में रूचि रखते हैं उनके लिए यह नाम नया नहीं हो सकता है पर हिंदी कविता संग्रह के लिए यह नाम जरुर कुछ अनोखा लगता है ..इस का जवाब भी अभिषेक पाटनी ने अपने संग्रह में लिखे दो शब्दों में बहुत खूबसूरती से लिखा है की ...यकीन मानिए ,मैंने बहुत कोशिश की लेकिन दिन ब दिन बदलती इस दुनिया को जिस तरह से मैंने समझा और झेला ,उसके बाद मुझसे इस से सामान्य कोई शीर्षक सूझा  ही नहीं ?" इस संग्रह में जितनी कवितायें हैं सबके विषय वस्तु में आज का इंसान है यानी आधुनिक इंसान और साथ में हैं उस इंसान की बनायी तमाम सरंचना ,फिर चाहे वह रिश्ते हों या समाज |
विज्ञान की नजर में इंसान भी बाकी दूसरे जानवरों की तरह महज एक जीव मात्र है ..होमोसेपियंस .फिर भी भौतिकता और विकास का हवाला दे कर इसको बाकी जानवरों से अलग दिखाने की बताने की कोशिश की जाती है एक ही इंसान में अच्छे बुरे तमाम दोनों तरह के लक्ष्ण  नजर आते हैं और इस में लिखी हर कविता इसी बात को बताती है ..
हाँ, यही बताई थी
उसने अपनी जाति
तिस पर,
नेताजी ने चेहरे पर
बिना भाव बदले
उसे लताड़ा था --
’अरे तू कैसे हो गया होमो सेपियंस ?
फिर हम क्या हैं ?
कुछ पता भी है
समाज के प्रबुद्ध लोग कहलाते हैं—
होमो सेपियंस !’

अभिषेक पाटनी के लिखे इस संग्रह में उन्होंने हर कविता इस तरह से लिखी है जो आज के समाज पर करारा व्यंग करती है और उसकी सच्चाई को बखूबी ब्यान करती है इनकी लिखी कविताओं में संवेदना बहुत ही सूक्ष्म रूप से ब्यान हुई है उन्हें यह हुनर आता है कि इस संवेंदना को कैसे कलम से उतरना है
अलग अलग तरीके से
सब मरते हैं
कई कई बार
बड़ा हो या छोटा
सब जीते हैं

मरने के साथ ..उनकी लिखी यह पंक्तियाँ हमारे आस पास की सच्चाई है जो ब्यान हुई है आज की ज़िन्दगी में कैसे हम जीते हैं ...अभिषेक जी के बारे में ही उनके इस संग्रह में पढ़ा कि  वह बचपन में हकलाते थे दूसरे लोग मजाक बनाते फिर अपने भी हंसने लगे |यह बात उन्हें और उनकी माँ को बहुत तकलीफ पहुंचाती थी  लेकिन माँ ने उन्हें इस रास्ते से उबरने का रास्ता तलाशने को कहा और वह अपनी  बात लिख के कहने लगे और इस से उन्हें कई बार नुकसान  भी हुआ अधिक चुप रहने के कारण पर फायदा अधिक  हुआ कम से कम वह अपनी बात अब लिख कर कह सकते  थे और वही उनकी पहचान भी है
मेरी आवाज़ में गहराई है
सदियों की ख़ामोशी
टूटती है इनसे
मैं हकलाता भी हूँ
टोकने से पहले
मुझे दबाया जाता है
अब इन दो विलक्षणताओं से सधी
मेरी आवाज़
कैसी भी है
मेरी पहचान है !!
और यह पहचान मुझे बहुत पंसद आई इनकी .बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो इस तरह से अपनी बात को यह अंदाज़ दे पाते हैं और अपने मन की आवाज़ को बुलन्द करते हैं अपने लिखे से ..
अभिषेक 'पत्रकारिता व जन्सम्प्रेषण' में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से  स्नात्कोत्तर हैं |इन्हें २००७ में राँची स्थित स्पेनिन संस्था द्बारा 'स्पेनिन सृजन सम्मान से सम्मानित किया गया है और तमाम हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ व निबंध प्रकाशित हो चुके हैं|जो बात वह जुबान से न कह सके वह उनकी कविता में उनकी ताकत बन कर उतरी और लोगों ने उनको पढना पसंद करना शुरू किया |
देखे थे सपने एक कस्बे ने
की वो शहर हो गया
दोड़ता रहा वो सालों
उस सपनों के पीछे
आखिर रंग लायी उसकी उर्जा
रोशन हुआ वह कस्बा
और शहर हो गया !
सपने सबकी आँखों में सजते हैं और वह रंग भी लाते हैं पर इन सपनों को लाने के लिए पूरा करने के लिए कुर्बानी भी देनी पढ़ती है और दर्द भी सहना पड़ता है तब कलम लिखने लगती है
  ऐसी ज़िन्दगी दे डालो
कि हर कोई खुद को पैदा करे
खुद को जीए
अपने ही रिश्ते के लबादे में पलता रहे
और अंत खो जाए बचा लो चाहते हो
गर खुदाई की खुदाई सलामत
हर कुछ ,हर शय,या खुदा
बसा बदल डालो !!

पर बदला जाना क्या इतना आसान है न जाने इस में कितने दर्द कितनी सिसकियाँ छिपी हुई हैं ..
खुद को सुलझाने की आस में
और उलझ जाने की
बेबसी
हालत से
हारते रहने का खौफ

पता नहीं और क्या क्या ..?यह दर्द छिपाया जाता है सिसिकयों में ...उनकी  लिखी रचना सिसकियाँ बहुत बेहतर तरीके से इस बात को दर्शाती है और तब एक मुखोटा ओढ़ लेते हैं  जिसको व्यवस्था नाम दे देते हैं खुद से ही
एक मुखोटा
महज ओढ़ लिया गया है
एक ढोंग की तरह
एक दिखावे की तरह
नहीं तो कुछ भी नहीं ऐसा
जो हो रहा है कहीं भी
न जाने फिर भी कैसे
हर कुछ नजर आता है
एक व्यवस्था के तहत !!

इनकी इन्ही रचनाओं में वेश्या कविता की पंक्तियाँ दिल में एक अजीब सी सनसनाहट पैदा कर देती हैं
जिस दिन उसे
कोई ग्राहक नहीं मिलता
वह सोती है
अपने पति के साथ
अपने पति की
प्यास बुझाने में
हर बार उसे
अलग से एहसास होते
कई बार बेगार का मलाल
कई बार कल की चिंता
कई बार पैसे की कमी ..
और भी न जाने क्या क्या ..
पर प्यार
शायद कभी ..
शायद कभी नहीं !और
यही उसकी ज़िन्दगी जीने का जरिया है .जिस का कोई उसको मलाल नहीं ..ज़िन्दगी उसको इसी तरह से नए रूप में रोज़ ढाल कर अपने सामने खड़ा कर देती है ..बहुत कड़वा सच है इन पंक्तियों में |जो यूँ अपनी कलम से उतारना हर किसी एक लिए शायद सहज न हो | उनका यह संग्रह तीन भाग में बंटा है
यह रचनाये थी इनके कैसा होमोसेपियंस के उस भाग से जहाँ अभिषेक दुनिया को अपनी नजर से देख रहे हैं और बहुत सुन्दर ढंग से अपनी बात कह भी गए हैं इनके संग्रह के दूसरे भाग में वहम ..में हैं मैं और मेरी बातें जो बहुत ही बेहतरीन हैं
घर
गांव का अच्छा था
भली थी मिटटी की दीवारें
करके सुराख
कहीं से हो सकती थी
किसी से बात ...स
च कितना सही लिखा है ..वह घर वाकई घर कहलाता होगा आज के वक़्त में जब घर में रहने वाले ही बात नहीं करते हैं
एक पल तुम्हारी छावं में
बैठने की आस में
न जाने कब तक बैठा रहा
तुम आये भी
तुमने दामन फैलाया भी
लेकिन वह छाँव कहीं नहीं थी .
उनके लिखे इस भाग में आसमाँ कैसे कैसे ?अम्मा के सपने और परवरिश न भूलने वाली रचनाएं हैं
कुछ चीजे शायद कभी न हो
अम्मा के चेहरे पर हँसी
हमारा लहलहाता खेत
और अम्मा के पूरे सपने
.. ..बहुत असलियत से भरे हुए हैं यह शब्द ...और परवरिश रचना में ब्यान है दर्द उन परम्पराओं का जो अब हम सब कहीं पीछे छोड़ते आ रहे हैं ...
माँ बुलाया करती थी
हर "छठ" में घर ............विश्वास हो या न हो माँ से मिलने का यह बहाना था जिस में घर जाने का मौका मिल जाता था ..पर आज का वक़्त कितना बदल गया है ...
हमारा बेटा विदेश में रहता है
और पिछले सात सालों से
एक बार भी नहीं आया
कभी कभार
फोन से बातें कर लेता है
वह भी अंग्रेजी में  

कई बार बोलता हूँ आने को
और मेरी पत्नी के पास तो
कोई बहाना (?) भी नहीं है
उसे बुलाने का
........यह आज के वक़्त की वह सच्चाई है जो हम सब जानते हैं ..भागम भाग लगी है .सब कुछ कहीं पीछे छुटा जा रहा है
कितने आंसू का अर्ध्य
कितने सिसकियों का तर्पण
कितने भावों की हवी
कितने संबंद्दों की बलि चाहती है --समृद्धि ..?


तीसरा भाग है इस संग्रह में गिलहरियाँ ..कुछ यहाँ कुछ वहाँ की ..चंद पंक्तियों में कही गयी यह रचनाएं बेहद प्रभाव पूर्ण तरीके से अपनी बात कहती है वाकई कुछ यहाँ से हैं कुछ वहां से ..कुछ कच्ची सी भी है और कुछ गहरी भी ...फिर भी प्रभावित करती हैं ...
माँ ने ख़्वाबों का
बगीचा बना रखा है
वहीँ से हर रोज़
तोड़ लाती है
होंसलों के फल .........
.......इस से अधिक बेहतरीन ढंग से इस बात को और कैसे व्यक्त किया जा सकता है ..
दरवाज़े पर दस्तक होगी और बेटा
अपने जूते उतारता हुआ बोलेगा -
"आज बहुत थक गया हूँ "
वृद्धाश्रम की हर वृद्धा हर वक़्त इसी आस में
एक ही और देखती है ..............

हमारे आस पास सब कुछ बहुत तेजी से बदल रहा है और हम सब तेजी से बस भागे चले जा रहे हैं अभिषेक जी की लिखी रचनाएं वही बदलाव को ले कर लिखी गयीं है |उनकी लिखी रचनाओं में अपन आस पास को ले कर लिखा गया है जो हम सबसे जुड़ा हुआ है शहर गांव .माँ बहन समाज सब का दर्द है इन रचनाओं में |यह आज के युवा आक्रोश है ,इस में एक तड़प भी दिखती है और एक आग भी ..बदलने की चाह भी है तो सहम जाने का ठहराव भी ..जो कहीं कही जोश में भर कर कहा गया हुंकारा भी है जो उड़ान तो भरता है पर कहीं ठहर भी जाता है फिर भी वह  अपनी बात कह गया है ..बदलाव आयेगा यदि यही सोच रही आने वाली युवा पीढ़ी की  तो बदलेगा ज़िन्दगी को समझने का ढंग भी |   ..इस संग्रह में समाज, परिवार से जुडी तो कई बातें है पर प्रेम प्रसंग के लिए कहीं कोई जगह नहीं है .और इतने युवा कवि के संग्रह में यह बात कुछ अनोखी सी लगती है ..इसी तर्ज़ पर शायद और भी गम है ग़ालिब जमाने में मोहब्बत के सिवा :).या शायद पहले संग्रह में अभी आक्रोश को जगह मिली है और बाद में प्रेम को जगह मिले ,जैसे किसी बरसात के बाद हुई  शान्ति ....इनके यदि अगले आने वाले अंक में हम इस के बाद उमड़ने वाले प्रेम को भी पढ़ पाए तो बहुत बेहतर होगा| क्यों की मन तो छलिया है और कलम उसको कह देने का माध्यम
कभी लिखा करता था
अपनी संतुष्टि के लिए
आज कल लिख रहा हूँ
खुद को छलने के लिए!!!

Friday, October 19, 2012

"वो लड़की जो शहर की दीवारों पे लिखती रहती है शहर भर में "

इक सुबह/मेरे आँगन में आ गया/इक बादल का टुकड़ा/छूने पर वो हाथ से फिसल रहा था/मैंने उसे बिछाना चाहा /ओढ़ना चाहा/पर/ जुगत नहींबैठी/फिरबादल को न जाने क्या सूझी/छा गया मुझ पर/मैं अडोल सी रह गई/और समा गई बादल के टुकड़े मे     और मैं मनविंदर का लिखा संग्रह पढ़ कर "अडोल" सी रह गयी ...मनविंदर भिंभर की लिखी यह पंक्तियाँ उनके संग्रह "अडोल" से है ..निरुपमा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह संग्रह बहुत सुन्दर आवरण में  लिपटा हुआ मेरे हाथ में आया तो कितनी बातें जहन में घूम गयीं | उन से हुई पहली बातचीत और भी बहुत कुछ | मनविंदर को मैं कैसे मिली ..या वो मुझे कैसे मिली ...यह जब याद करूँ तो याद आता है कि आज से तीन साल पहले मेरे पास एक मेल आया जो बहुत अपनेपन से बहुत प्यार से मेरी लिखी गयी कविताओं के बारे में था ..मैंने भी हमेशा की तरह  उस को उसका जवाब दे दिया .और .उसके बाद मेल का सिलसिला बढ़ता गया ..फ़ोन पर बात शुरू हुई ...और फिर उन्होंने "साया मेरे पहले संग्रह" के बारे में अपने अखबार में लिखा ,"मेरे ब्लॉग के बारे में" अपने विचार व्यक्त किये ...मेल से ही हम दोनों ने न जाने कितनी बातें शेयर की ,सपने डिस्कस किये ..पर कभी मुलाकात नहीं हो पायी ..फिर थोडा सा बातचीत में अंतराल आ गया ..पर जुड़े रहे एक दूजे से और यह इतना सहज था की मैं कभी उन्हें "मनविंदर जी" कह ही नहीं पायी ...उनके इस पहले संग्रह" अडोल" पर मैं उतनी ही खुश हूँ .जितनी वो मेरा पहला संग्रह "साया" पढ़ कर खुश हुई थी ...एक कड़ी और जो सामान है हम दोनों में वह है "अमृता प्रीतम" ....दोनों ही हम उसको सामान रूप से पसंद करती है और लिखती है उस पर ....

अडोल संग्रह पढ़ कर मुझे अमृता की ही याद आई ..दिल से लिखी यह नज्में बेहद खूबसूरत हैं सबसे बेहतरीन बात जो वाकई मेरे दिल को बहुत गहरे तक छु गयी ...उन्होंने इसका विमोचन अपनी माँ के हाथो करवाया ...सीधी सादी मनविंदर ने बहुत सरलता से इसका संग्रह को जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाने वाली माँ के हाथो में सौंप पर यह कहा

 लीजिये ......मेरी "अडोल" के चेहरे से घूँघट  उठा दिया मेरी माँ ने ....  "अडोल" मेरी नज्मों का गुलदस्ता

 "बहुत ही अदभुत क्षण रहा होगा न यह मनविंदर ?"...मैं तो जान कर ही भावुक हो गयी |देश के माने हुए अखबार "हिन्दुस्तान" में" प्रमुख संवाददाता "पद की गरिमा बनाए हुए मनविंदर पेशे से पत्रकार हैं और इस खबर की दुनिया में ज़िन्दगी वाकई उनको रोज़ छु कर निकल जाती होगी अपनी घटनाओं से उन्ही की लिखी एक बात भी बहुत बेहतरीन लगी ...."बहुत बार ऐसा हुआ ,जो दिन में देखा ,उसने रात को सोने नहीं दिया |अन्दर से आवाज़ आती ,जी खबर लिख कर आई हो ,वो अधूरी है .सच लिखना अभी बाकी है |खबरों के सफ़र में मुझे ऐसे कई सच मिलते रहे जो खबर नहीं बन सके और वो ही सच नज्म बन गए "........जो इस संग्रह के रूप में हमारे सामने आये ..उनकी लिखी यह नज्म इस सच की गवाह है

 मन में आती है कई बातें ,कई बार
कुछ कहने को जो नहीं होता ,हर बार
एक डर का पहरा होता है कई बार
कोई सर्द सी शिकन दिखती है ,हर बार ..


 एक सच जो खबर में कहीं छिपा हुआ पर लिखने वाले के दिल में आक्रोश पैदा कर देता है ..वह विवशता इन लिखी पंक्तियों में उभर कर आई है |मनविंदर की कवितायें अक्षरों के काफिले के साथ चलती अपनी पहचान छिपाए ख़ामोशी से चलती एक औरत द्वारा अभिव्यक्त के कुछ जिंदा रास्तों की तलाश की कवितायेँ हैं यह कहना है मृणाल पांडे का जिन्होंने इस में प्रकथन लिखा है और साथ ही यह .......की इन कविताओं को तमाम उन लोगों को पढना चाहिए जो सचमुच जानना चाहते हैं की सामजिक मुखोटों के परे ,तमाम वर्जनाओं के बीच जी रही औरत के मन की अँधेरी ,बाहर निकलने की कलपती दुनिया का सच कैसा है ?

 काले घेरों में लिपटी
उसकी बेजान आँखे
पता नहीं
इन आँखों ने कभी
कोई ख्वाब देखा
या नहीं
कोई नहीं जानता
रिश्तों के हाशिये पर खड़ी
वो लड़की
बस चलती रही

............... पढ़ कर बस एक चुप्पी सी लग जाती है
..आँखों के काले घेरे पढने वाले के मन को घेरने लगते हैं ..अजनबी नज्म में की यह पंक्तियाँ कुछ और कह जाती है

कह दो इन पगडंडियों से
फिर से बन जाएँ अजनबी
और फिर हम चलें
इन पगडंडियों पर
अपनी अपनी तन्हाइयों के साथ
अपनी अपनी परछाइयों के साथ .........

 

वाकई यह तलब दिल की कैसे इन लफ़्ज़ों में उतर कर आई है ..की पढ़ते ही दिल से एक आह निकल जाती है ..और एक दूसरी नज्म की पंक्ति गीली हैं तो आँखे -हलचल है तो ख्यालों में ...कितने सवाल कितने जवाब एक अजीब सी रहस्य सी हैं मनविंदर की लिखी यह नज्मे जो कभी सूफी रब्बी मसला भी महसूस करवा देतीं है|
सवाल बहुत है
पर दिल डरता है जवाबों से
कहीं जवाब "यह "न हो
कहीं जवाब "वो "न हो
इसी "ये और वो" में तो
ज़िन्दगी बसर हुए जाती है


      उनकी लिखी इन नज्मों को यूँ ही आप सरसरी तौर पर नहीं पढ़ सकते हैं ..उनको समझना है तो उनकी तह तह जाना होगा डूबना होगा उन लिखे लफ़्ज़ों में ...जो अडोल को एक यादगार संग्रह बना गए हैं उन्होंने इस में जो अपनी बात कही है वह भी बहुत ही बेहतरीन है ...की उनका यह नज्म लेखन गुरु ग्रन्थ साहिब जी की वाक् की तरह है वाकई यह बहुत सुन्दर लफ़्ज़ों से सजा है ..मैं तो डूब कर रह गयी इस में ...
मुद्दत बाद
उम्रें ठहर गयीं
उनकी नजरें मिली
एक दूसरे  को
देखा
जैसे तपती धूप में
ठन्डे पानी के घूंट भर लिए हो ...

और यह सच जो उनके लिखे लफ़्ज़ों का सच ब्यान कर गया जो उन्हें अक्षरों की माला के रूप में कोई जोगी दे गया और वह उस नूर को यूँ लफ़्ज़ों में कह गयी
मंत्रों के नूर से उजली हुई
वो माला मेरे सामने थी
मैं अडोल-सी खड़ी रह गई
और सोचने लगी
कैसे लूँ माला को

यह वही अक्षर हैं जो सोच से से भी आगे हैं कभी कलम को  छुते  हैं कभी कागज पर बैठते हैं और कभी गीत बन जाते हैं ..और अंतर्मन  में उतर जाते हैं असल नज्म की लिखी इन पंक्तियों के माध्यम से ..
तेरे कमरे में
सब कुछ बिखरा है
कहानियों के अधूरे ड्राफ्ट
तकिये पर रखी डायरी
डायरी के पन्नो में रखा पेन
हर दिन पन्नो पर धरे जाने वाले
उदास ,हंसाते बिसूरते ,चिढाते
अक्षर ...........

सही में एक लिखने वाले मन का परिचय जो इसी नज्म में लिखी पंक्ति की सोच को और भी मुखरता से कह जाता है" कि कई बार सोचा समेट दूँ तुम्हारा बिखरापन लेकिन तुम तो बेतरतीब हो कैसे जानोगे असल" .........मुझे तो इनके संग्रह में संजोयी हर नज्म ही बहुत बहुत अपने दिल के करीब लगी ..वह सच जो इन अक्षरों में अपनी बात कहता हुआ दिल में बस गया उनकी लिखी इस सहेलियाँ नज्म सा ..
दो सहेलियाँ
एक ही देह में रहती हैं
साथ साथ
दुःख कुरेद्तीं है

गहरे तक यह उतरे अक्षर अन्दर के तूफ़ान को ब्यान कर जाते हैं जो बहुत कहना भी चाहते हैं और बंधे हुए भी हैं ..
एक लड़की
मैं जानती हूँ उसे
बहुत नजदीक से
बातें करती हूँ उस से
वो चाहती है
तितली के रंग ओढना
पेड़ों की छांव में बैठना
फूलों की खुशबु में जीना
...यह वही एहसास हैं जो मनविंदर के मन के साथ साथ मेरे मन ने भी पढ़ लिए सोयी जागी आँखों से ...और दिल उस शक्ति से फ़रियाद करने लगा ..मुझे बचा लो /रस्मों से /कानूनों से/दावों से /और पहना दो मुझे /अपने रहम की ओढ़नी ....उनके लिखे हो को पढ़ते हुए मेरा दिल तो हर नज्म की पंक्ति यहाँ लिखने का हो उठा है ..हर लिखा हुआ अक्षर एक पुकार है वाकई अंतर्मन की जो चुपचाप बैठ से अपने से ही बात करते हुए पढ़ी जा सकती है
या रब्बा
बादल चीखे या चिल्लाएँ
गरजे या पगलाएं
इधर उधर मंडराएं
पर जब मेरा मौसम आये
मेरे मन की धरती पर
बिन पूछे छा जाएँ

कौन नहीं चाहता यह मौसम ..हर दिल की पुकार छिपी है इन पंक्तियों में ...अपने में सम्पूर्ण यह नज्मे बहुत रहस्यवादी है बहुत गहरी हैं .कोई कमी मुझे इन में दिखी नहीं ..अमृता प्रीतम के साथ जुड़े होने का एक एहसास सा हुआ इनकी लिखी कई नज्मों में ...हर नज्म के बारे में लिखूं तो भी कई बातें अनकही रह जाएँगी ...दिल से लिखे इस संग्रह को अवश्य पढ़े तभी दिल की बात समझ पाएंगे ..फिर भी मैं कुछ और नज्मों का ज़िक्र नहीं करुँगी तो यह समीक्षा कुछ अधूरी सी लगेगी ...अरसे बाद दराज़ खोला /आँखों में वो अक्षर तैर आये जिन पर लकीरें फेरी गयीं थी ...दराज़ नज्म से ..तेरा इश्क बैठा था हर अक्षर की ओट में/डायरी तो हाथ में थी लेकिन /अक्षर बहुत ऊँचे स्थान पर खड़े थे ..डायरी नज्म से ....सूरज को भीतर उतार लूँ /और रौशनी को हो मेरी तलाश /सेक से यह ली गयी पंक्तियाँ रोशन कर देती है पढने वाले को और एक खूबसूरत एहसास में रंग देती है ..मनविंदर की इन नज्मो के कई बिम्ब बहुत ही सुन्दर है नए हैं ..लफ्ज़ पंजाबी रंग लिए हुए हैं जो बहुत ही सहजता से अपनी बात कहते हैं जैसे "बुक्कल "शब्द का बहुत बढ़िया प्रयोग उनकी एक नज्म में लगा मैं तन्हाई और बुक्कल
देर तक तन्हाई /मेरी बुक्कल में बैठी रहती है ..और ख़ास बात की हर रिश्ते की गहराई को पढने वाला इस संग्रह में पढ़ सकता है ..माँ .पिता और बेटी पर लिखी हर पंक्ति अपनी सी लगती है ..सबका ज़िक्र करना यहाँ बहुत मुश्किल है .....
खुद मनविंदर के शब्दों में अडोल "..उन हादसों और मुलाकातों का जिक्र भर है जो मुझे कभी ख़बरों के सफर में मिले और जुदा हो गए लेकिन उनका असर रह गया  मैंने उन्हें नज्म की शकल देने का एक पर्यास भर किया है
"वो लड़की जो शहर की दीवारों पे लिखती रहती है शहर भर में "






Tuesday, October 16, 2012

दिल का दर्पण .

दिल का दर्पण



काव्य संग्रह
मूल्य- रु 150
प्रकाशक- हिंद युग्म,
1, जिया सराय,
हौज़ खास, नई दिल्ली-110016
(मोबाइल: 9873734046) 







दिल का दर्पण ...दिल का आईना जो अपने में समेटे हुए है हर अक्स को ........ दिल के आईने के बारे में लिखते हुए कभी लिखा था कि
झांक के कभी न देखते
 उसकी आँखों में
हम यूँ डूब कर
अगर पता होता
कि वो आईना है ...यही हाल हुआ मोहेंदर जी के इस संग्रह को पढ़ते हुए | अपने साथ बीते हर लम्हे का अक्स दिखा उनके लिखे इस दिल के दर्पण में | मैं उनके लिखे से बहुत समय पहले से परिचित हूँ और लिखे हुए से प्रभावित भी ..इस लिए उन रचनाओं को जिन्हें ब्लॉग में पढ़ा था हाथ में पुस्तक के रूप में देख कर बहुत ही ख़ुशी हुई और अच्छा लगा | दिल के रंग में सजी लाल संतरी रंग की आभा लिए यह किताब आपको अपने अक्स में मोहित कर लेती है ...खुद मोहिन्दर  जी के लफ़्ज़ों में कहे तो ..कविता हो या कहानी रचनाकार की आँखों में समाज ,आस पास की घटनाओं ,अपने व्यक्तित्व अनुभवों तथा कल्पनाओं का प्रतिबिम्ब होती हैं| चूँकि अनुभूतियाँ ,अनुभव व कल्पनाएँ अलग रंगों से रंगी होती हैं ,कविता व कहानियाँ भी बहुरंगी लिबास से सजी होती है| कभी चटक शोख व कभी धुंधलके में लिपटी हुईं ...सही बिलकुल मोहिन्दर जी तभी तो वह  दिल का आईना कहलाती है |
  दिल का दर्पण अपनी एक ख़ास विशेषता लिए हुए है .शुरू से आखिर तक ...सबसे पहले इसके अनुक्रम में ही देखे तो इस दिल के अक्स का अलग अलग एक टुकड़ा है जो अपने में हर विषय को समेटे हुए है जैसे सामाजिक सरोकार .जीवन दर्शन .अंतर मंथन ,श्रृंगार प्रणय मिलन विरह .प्रतीक्षा ,अनुनय ,नवीन प्रयोग ,गीत ,क्षणिकाएँ,हाइकु ...पढने वाला पाठक अपने मूड के हिसाब से अपनी पसंद से जो पढना चाहे पढ़ ले ...यह बहुत ही बेहतरीन प्रयोग लगा मुझे इस संग्रह में ..
 सामाजिक सरोकार में ..उनकी उलेखनीय रचनाओं में कोमल बेल या मोढ़ा....बेटी के कन्यादान से जुडी प्रथा पर गहरा प्रहार करती है |बेटी का विवाह हमारे समाज में आज भी एक बोझ है ...जो इन लफ़्ज़ों में ब्यान हुआ है .
बेटी ब्याही ,तो समझो गंगा नहाये
सुन कर लगा था कभी
जैसे कोई पाप पानी में बहा आये .....आज भी यह कितना कड़वा सच है ..जो जाने अनजाने हमारे कथन में शामिल है ...बेटी के विवाह के बाद यह एक लोक विश्वास है कि गंगा नहाने जाना  चाहिए यानी की एक बहुत बड़े काम से मुक्ति मिली..और इसी के अंत में एक सवाल ...
देखे आज का दूल्हा कल क्या कहता है
मुक्त रहता है ,या गंगा नहाता है ??
समाज के सरोकार से जुडी एक और रचना आदमी सड़क और आसमान ...एक बहुत बड़े सच से रूबरू करवाती है .कहने को दुनिया इतनी बड़ी और उस में रहने वाला ननकू ..जिसको मिला सिर्फ एक वह टुकड़ा रहने को जहाँ वह बेबस एक गाडी के अपने पैर के ऊपर से गुजर  जाने की वजह से गालियों पर जी रहा है एक बड़े से पुल के नीचे ..तरपाल के उस टुकड़े के साए तले..
जो कहने को तो एक छत है
किन्तु स्वयं में बेबस है
आंधी तूफ़ान बारिश
रोक नहीं पाता है
ननकू रात में लेटे लेटे
अक्सर सोचता है
काश वो गाडी उसके
पांव के ऊपर से नहीं उसके
पांव के ऊपर से नहीं
उसके सिर के ऊपर से गुजरी होती
शायद फिर उसे
न इस सडक ,न इस आसमान
और न किसी आदमी से कोई शिकायत होती !!
अब यह पंक्तियाँ ही पूरी कविता का मर्म समझा रही है ..मैं अपने लिखे शब्दों में क्या कह सकती हूँ .कितनी बेबसी है इन में ..और यह बेबसी और भी उभर जाती है जब उनकी लिखी एक और रचना आज़ादी से क्या बदला है की यह पंक्तियाँ पढ़ते हैं ..
केवल अंग्रेज कर गए कूच यहाँ से
और इस देश में क्या बदला है ?
झूठ का है अब तक बोलबाला
सच अब भी यहाँ लंगड़ा है ...हमारे देश के आज के सच पर प्रहार करती एक सच्ची रचना है यह ........और फिर यह हालत देख कर सिर्फ आक्रोश ही पैदा होगा दिल में और वह चीत्कार उठेगा
सोने की चिड़िया का ,पहले
विदेशी गिद्धों ने सुनहरे पंख थे नोचे
देसी कौए अब ,देह से मांस कचोट रहे हैं ..दोषी कौन ..है इसका ..इसका विश्लेष्ण तो खुद का आत्म निरीक्षण कर के ही पाया जा सकता है ..
मोहिन्दर जी की यह रचनाएँ समाज की जागरूक चेतना से जुडी हुई है है ,वह यूँ ही बिना पंखों के कल्पना के आकाश में नहीं उडी हैं .
अंतर अगम है बीच का स्वर्ग रसातल
जीवन अपना सत्य का ठोस धरातल
हास्य की पूंजी पास नहीं है
है मन का मर्म उपहास नहीं हैं |
 इनके संग्रह का दूसरा भाग जीवन दर्शन के सच से जुड़ा हुआ है ...जो मोहिन्दर  जी के लिखे लफ़्ज़ों से हमें खुद से बातचीत करने का मौका देता है ...मिथ्याबोध , जीवन का गणित जय पराजय , और एक नदिया इस में बहुत ही अच्छी रचनाएं कही जा सकती है ....
जीवन का कोई गणित नहीं है
न ही मनुष्य कोई आकृति
यहाँ समीकरण स्थापित सूत्रों से नहीं ,अपितु
समय की मांग के अनुसार सुलझाये जाते हैं ....सच से परिचय करवाती यह पंक्तियाँ जय पराजय से स्वतः  ही जुड़ जाती है ..
सौरमंडल में मात्र बिंदु भर यह धरा
प्रत्येक अंश किसी महाअंश से बौना है
सिंह भी धूल चाटते हैं जीवन द्वंद में
जय परिभाषित हो सकती एक छंद में
पराजय का कण कण से नाता है ......
               आत्म मंथन की श्रृंखला में भी रचनाएँ बहुत मुखर हो कर अपनी बात कह रही है ...आत्म चिन्तन ..जब व्यक्ति निरंतर सोचता रहता है तब उसका चिंतन उसके आकुल .व्याकुल मन का प्रतिबिम्ब होता है ,किन्तु जब वह अपने अस्तित्व की पूर्ण प्राप्ति कर लेता है तो तब वह अपने मनोमंथन की सभी अवस्थाओं को पार कर जाता है और कवि की लिखी यह रचनाएं इसी तरह का बोध करवाती है ...नव जीवन का उदगम समय सब कुछ बदल देता है
पर मिटती पहचान निरंतर परिवर्तन
ही किंचित
नवजीवन का उदगम है .......और जब इस बात को मनुष्य पहचान ले तो अंतर्मन के द्वार खोलने की कोशिश में लगा या कह उठता है
किस तरह उतराऊं इस अंधकूप में
किस तरह बहार आऊं धूप में
या चीत्कार करूँ भीतर बाहर
क्या कोई सुन पायेगा  ?
पर एकांत मन की भाषा को सहज ही समझ जाता है और खुद से कह उठता है
मैं चाहता हूँ
एक नितान्त एकांत
कोई न हो जहाँ ..इस भाग में आने वाला समय से भी शिकायत है बिंधे हुए पंखो से उड़ न पाने की और मृगतृष्णा में उलझे हुए प्रश्न की भी कौन हूँ मैं ?यह सवाल हर पढने वाला पाठक ही खुद से करेगा इस रचना को पढने के बाद ..
काल चक्र के गूढ़ मंथन से
जो भी उपजा पाया है
वो अमृत है या तीव्र हाला
इसका निर्णय कौन करे
भीतर अपनी उपजी कुंठाओं का
अब तक विश्लेषण न हो पाया
कौन सा परिचय दूँ मैं अपना ?
अब बात करते हैं उनके लिखे हुए श्रृंगार रस पर लिखे प्रेम पर लिखी रचनाओं की ..बात ढाई आखर की है ,चाहे उसको प्रेम कहें ,या इश्क .इसी में मिलन है इसी में विरह का ताप भी है जो छलका है अपनी लिखी इन रचनाओं से कर्णफूल सा मैं ..रूमानी एहसास की भाव पूर्ण अभिव्यक्ति है
कर्णफूल सा
मैं संग तुम्हारे
दर्पण में ही
होता प्रतिबिम्ब
और अभिव्यक्त होता मन के उदगारों से जिन्हें पढ़ लेती तुम  और कहती जो बीत गया उसको बिसरा कर समेट लो खुशियाँ आँचल में ...क्यों की प्यार का रंग बदला नहीं करता है
किस तरह अलग हो
प्यार बिना जीवन बंजर
बिना धार ज्यों हो खंजर
मान्यताओं के मौसम बदले हैं
मगर प्यार का रंग न बदला ...........प्यार की परिभाषा और प्यार के मौसम एक अनुभूति से संग रहते हैं ..
प्रेम एक अनुभूति जो कभी शांत और कभी प्रज्वलित हो कर दिल को भिगो जाती है ...तब कामनाओं का अमलतास खिल उठता है पर यह तो स्वप्न से है तभी कवि विरह में डूबा कह उठता है ....
मृगतृष्णा के आभास से
निद्रा से जब नयन खुले
अश्रुओं से भीगी थी पलकें
होंठ सूखे हुए थे प्यास से
झाँक कर देखा जो खिड़की से बाहर
धरा सुनहरी फूलों से अटी पड़ी थी
धीरे धीरे दल झर रहे थे
मेरी कामना के खिलते हुए
अमलतास से !
पर दिल तो दिल है ...प्यार की रंग में पगा हुआ भरा हुआ ..बसंत सा ..मौसम है यह मन का ...
मौसम चाहे कोई भी हो
सीधा रिश्ता दिल से है
मन के बारूदी फ़ितनों को बना पटाखा
अपनी रात दिवाली कर लेना
एक और रचना कंगन लिए फिरता हूँ ..बहुत ही रोचक लगती है जब यह पंक्तियाँ पढने में आती है
सब ढूढ़ते फिरते हैं
चेहरों में तबस्सुम
मैं दिलों में बसी सफाई तलाशता हूँ
कंगन लिए फिरता हूँ
कलाई तलाशता हूँ
प्यास लिए होंठो पर
सुराही तलाशता हूँ .......
तलाश खत्म हुई तो सवाल कई उभरे जो रुकने का समझने का और अपनी बात कहने का यूँ ढंग तलाश कर लेते हैं
अभी अभी मिले हो मुझसे
नाम केवल मेरा जाना है
हाथो से बस हाथ मिले हैं
मुझे अभी तक कहाँ पहचाना है ...और यह पहचान फिर दिल के उन रिश्तों में ढलने लगती है जो अनाम होते हैं ..
कुछ रिश्ते अनाम होते हैं
होंठो तक आ गए जो
वो "बोल "तो आम होते हैं  |
नवीन प्रयोग में इनकी रचनाओं में बाबुल बिटको ..बहुत ही सुन्दर रचना है ...
बाबुल देहरी ,लाँघी आई
हाथों मेहँदी ,पावों अलताई
अंगूठी बिछुए ,पैजन छनकाई
मायका सूना,ससुराल बधाई
बाबुल बिटको हुई पराई ...........बेटियाँ बाबुल के घर कब रह पायीं ....बहुत ही दिल को एक कसक में डुबो देने वालीं रचना है |यह दर्द वही महसूस कर सकता है ..जो बेटियों के घर में होने से रौनक समझता है ...
शब्दों का सब खेल है ,परछाई ,हम तुम चाँद अकेला इस संग्रह की उम्दा रचनाएँ कही जा सकती है
एक बार मुड कर देख ले में प्यार भरी मनुहार बहुत ही मीठी है
इक बार मुड कर देख ले
ख़्वाबों को पलकों में लिए
टिमटिमा रहे हैं कुछ दिए
बेकाबू हुई दिल की धड़कने
बसा के आरजू बेशुमार ये
इक बार मुड के देख ले
क्षणिकाओं में जो बेहतरीन कही जा सकती है ..वह हैं ,,,
उम्र भर संभाले कांच से रिश्ते
बस और किया क्या है
सुलझाते रहे बेतरतीब उलझने
जीने को जीया क्या है ?
रिश्तों का एहसास इस से अधिक कम पंक्तियों में और क्या होगा ?
टूटे नग कौन गहनों में बिठाता है
अब कोई ख्वाब नहीं
आँखे सूनी है ......आँखे और नग बिम्ब जीवन के एक सच को ब्यान कर देते हैं ...........यह बहुत कम है इस संग्रह में ..
हाइकु में अपनी बात है ..सहज ही अपनी बात यह कम लफ़्ज़ों में कहे जाने वाले इस संग्रह में संख्या में भी बहुत कम है ..पर जोरदार है
नम नयन
होंठो पर कंपन
कथित मौन
कविता मन को बांधती है  और मन को खोलती भी है वह यूँ इन कम लफ़्ज़ों में भी अपनी बात कह जाती है
छुआ उसने
न जाने क्या सोच
पुलकित मैं !
कविता संग्रह में रचनाये हीरे की कनी की तरह अलग अलग कोणों से अलग अलग किरणें बिखेरती नजर आती है वही बात मोहिन्दर  जी की रचनाओं में देखने को मिलती है |कविता हृदय की गहरी अनुभूतियों की झंकृति होती है .कवि मन की भावों की गूंज होती है और कविता लिखना हर एक के बस की बात नहीं है पर हर संवदनशील व्यक्ति का दिल कवि होता है और एक कवि के लेखन में वह भाव होना चहिये जो पढने वाला भी महसूस कर सके ..मोहिन्दर  जी का लेखन इस बात पर बहुत हद तक सही रहा है ..कहीं कहीं भटकाव की हालत लगी है ..पर फिर भी लिए गए विषयों में उन्होंने अपने लेखन से न्याय किया है | पर पढ़ते हुए कुछ विचार भी आये इस संग्रह को शायद वो या तो मेरे पहले पढ़े हुए से प्रभावित हो सकते हैं ..जैसा कि मैंने पहले कहा की बहुत समय से मैं मोहिन्दर जी का लिखा हुआ पढ़ रही हूँ .मुझे उस में उस जादू की थोड़ी सी कमी लगी जो बाँध लेती है ..गजल वो बहुत बढ़िया लिखते हैं ..उसकी कमी इस संग्रह में अखरी| और कहीं कहीं ऐसा लगा की जैसे लिखने वाले का मन कहीं बंधा हुआ है ..खुलापन  स्पष्टरूप से किसी किसी रचना में बहुत ही कंजूसी से लिखा हुआ महसूस हुआ |प्रेम विषय भी इस से अछूते नहीं रहे ...पर जहाँ मुखरित हुए हैं वहां अपनी बात कह गए हैं विरह का रंग बखूबी उकेरा है उन्होंने अपनी कलम से ..शायर मखमूर के लिखे शब्द याद आते हैं इस तरह की रचनाएँ पढ़ कर ...मोहब्बत के लिए कुछ ख़ास दिल मखसूस होते हैं ,यह वह नगमा है जो हर साज पर गाया नहीं जाता | मोहिन्दर जी के लिखे में भी प्रेम को खोने पाने का सुन्दर चित्र उभर का आया है |हर विषय को खुद में समेटे हुए यह संग्रह पढने लायक है और संजोने लायक है .मोहिन्दर जी का लिखा बहुत बेहतरीन है और हो भी क्यों न क्यों कि कृतित्व हमेशा लिखने वाले का दर्पण ही तो है ......मोहिन्दर  जी के लिखे की यह संग्रह के रूप में अभी प्रथम सीढ़ी है .आगे उनसे और भी बेहतर संग्रह का इन्तजार हर पढने वाले को रहेगा .उन्ही के लिखे शब्दों की परिभाषा में ..
शब्दों का सब खेल है
शब्द प्राण है
शब्द बाण है
कुछ सहलाते
कुछ गहरे गड जाते
शब्दों का सब खेल है .....
यह शब्द दिल के दर्पण में जब झांकते हैं तो एक झंझाहट पैदा कर देते हैं आपको अपने अक्स से मिलवा देते हैं |

Friday, October 12, 2012

मृगतृष्णा

मृगतृष्णा (कविता-संग्रह)

संपादक : सत्यम शिवम्
१० कवियों की तृष्णाएँ कविताएँ
मूल्य- रु १९५
प्रकाशक- हिंद युग्म,
1, जिया सराय,
हौज़ खास, नई दिल्ली-110016
(मोबाइल: 9873734046)
फ्लिप्कार्ट इन्फिबीम पर खरीदने का लिनक्स
मृगतृष्णा क्या है ?जल या जल की लहरों की वह मिथ्या प्रतीति जो कभी कभी ऊपर मैदानों में भी कड़ी धूप पड़ने के समय होती है । मृगमरीचिका । गरमी के दिनों जब वायु तहों का धनत्व उष्णता के कारण असमान होता है, तब पृथ्वी के निकट की वायु अधिक उष्ण होकर ऊपर को उठना चाहती है, परंतु ऊपर की तहें उठने नहीं देती, इससे उस वायु की लहरें पृथ्वी के समानांतर बहने लगती है । यही लहरें दूर से देखने में जल को धारा सी दिखाई देती हैं । मृग इससे प्रायः धोखा खाते हैं, इससे इसे मृगतृष्णा, मृगजल आदि कहते हैं ।समान्यता हम यही मृगतृष्णा की परिभाषा समझते हैं जानते हैं। मृगतृष्णा काव्य संग्रह ...संपादक सत्यम शिवम् और उनके लिखे शुरूआती लफ़्ज़ों में मृगतृष्णा एक ऐसा बिम्ब है जो हमें जीवन के आध्यात्मिक वास्तविक स्वरूप की झलक देता है ।रेगिस्तान में इधर उधर भटकते मृग जब प्यास बुझाने के लिए पानी की कामना करते हैं तो कुदरत अपना झूठा स्वांग रच कर पानी की झलक दिखा जाती है ..और प्यास वहीँ रह जाती है ...इसी तरह हमारा जीवन है हम झूठी लालसाओं में घिरे भागते रहते हैं और असली वास्तु से दूर होते जाते हैं ..झूठ को सच मान लेना और वही सच समझना इस "मन की मृगतृष्णा "है ख्वाइशें हैं मन के भीतर रेत में भी एक नदी की
स्वांग के आकाश में याथार्थ की तलाश है
जिस समन्दर के लिए हम दर -ब -दर ताउम्र भटके
पाके उसको भी कैसी यह प्यास है ....
वाकई यह प्यास जो न  चैन से रहने दे वह मृगतृष्णा सी ही प्यास है ....इस में दस कवि तृष्णाएँ कविता कर्म की उस इच्छा को समर्पित  हैं  जो हमेशा अतृप्त रहती हैं और इनको हम जानेंगे इनके इस संग्रह में लिखे के माध्यम से ...हर लिखने वाला कवि या कवियत्री के पास प्रेम विरह ,आस पास घटने वाली हर बात असर डालती है और वही मरीचिका बन कर उनके लफ़्ज़ों में ढल जाती है ...इस में भी लिखने वाली हर रचियता का माध्यम यही विषय रहे हैं ..अधिकतर लिखने वाले ब्लॉग जगत से ही जुड़े हैं ..कुछ पहली बार प्रकाशित हो रहे हैं कुछ की कवितायें पहले भी पब्लिश हो चुकी हैं इस लिए कहीं कहीं यह मरिचिका बहुत चमकीली है और कहीं कहीं धुंधली हो गयी है .पर मरीचिका तो मरीचिका है दिल को पानी तरफ खींचेगी ही ....नीरज विजय की रचना ..
यही तो दर्शाती है
कुछ पाने की चाहत में
करते मन को घायल ये
पर क्या यही असली है कमाई
या ये मृगतृष्णा की है गहराई !!!
इनकी लिखी रचनाएं इनके सपनों को साकार करती हुई कहतीं है हर उम्मीद की किरण होंसलें की  लो जलाती है और इनकी रचनाओं में कुछ बहुत ही बेहतर हैं और कुछ अभी मासूम है जिन्हें पकने में थोडा वक़्त लगेगा ।
अभिषेक सिन्हा की रचनाओं में अभिनय करते मेरे शब्द हैं रचना बहुत ही बढ़िया है ..
ये शब्द एक दर्पण है
जो निज से सबको मिलाता है
उनके अस्तित्व का
ये दर्शन उन्हें कराता है
इनकी बेहतर रचनाओं में तू हमेशा पास रहती है और कांच के टुकड़े हैं
इस संग्रह की एक चमकीली मरीचिका के नाम में अर्चना नायडू का नाम महवपूर्ण है ..इनकी रचना आ अर्जुन ! अब गांडीव उठा ..झंझोर देती है ...निखरता है सोना ,अग्नि में तप कर
रंग लाती है मेहँदी ,पत्थरों में पीस कर
जीवन नाम है युद्ध का ,तू संघर्ष कर ..बहुत जीवन के सही अर्थों को समझाती है ....बरगद की छांव रचना रिश्तों के ताने बने पर बुनी एक सुन्दर रचना है जिस की छांव में माँ है पिता है और वह गांव प्यार का गांव है ।नारी व्यथा को दर्शाती एक सच्चाई रचना  की कुछ पंक्तियाँ
नहीं चाहती थी मैं
दहलीज की लक्ष्मण रेखाएं
वचनों की वर्जनाएं
फिर भी तुमने दी मुझे
सिर्फ सीमाएं ..यह रचना बहुत आएगी पढने वालों को ..साफ़ साफ़ शब्दों में नारी मन की बात इनकी कलम से बहुत सुन्दर ढंग से उतरी है कहीं मौन में ढल कर और कहीं स्वयं सिद्धा बन कर ..
रूह के  रिश्ते भी
जिस्मों से गुजर कर पूरे होते हैं ....यह  कहना है कुदरत प्रेमी डॉ प्रियंका जैन का ..इनकी लिखी रचनाये पढना बहुत ही रोचक लगा ..आज के वक़्त को यह बखूबी ब्यान कर रही है दिवाली की सफाई में बेच दिया इन्होने
थोड़ी सी मासूम हाथापाई
पुराने सिक्के
कुछ जूते के तस्में
कुछ यारों के टशन ..क्यों की मार्केटिंग वाले सब एक्सेप्ट करते हैं इस फेस्टिव सीजन में .....इनकी रचनाओं में शब्द आज की उस भाषा के इस्तेमाल हुए हैं जो हम अधिकतर बोलते हैं सुनते हैं ...जिस से हर रचना बहुत अपनी सी बात कहती लगती है ..इनको रचनाओं के कोई शीर्षक नहीं है ..नम्बर्स है सिर्फ जो और भी अधिक पढने वालों को रोचक लगते  हैं नंबर 13 की रचना पर हम पाते हैं कुछ और नम्बर 
यूँ ही दफअतन
दूसरे पहर उठती कभी
पुरवाई की तपिश से
पाती ढेरों मिस्स्ड कॉल्स
लिपटे थे उन 55 .60 .75 .80 .95 .99 कॉल्स  में
बेशुमार चाहत के नम एहसास ..
रजनी नैय्यर मल्होत्रा का नाम पढने वालों के लिए नया नहीं है ..इनके लिखे से बहुत से लोग परिचित हैं ...इनकी गजलो के अलफ़ाज़ दिल की जमीन से सीधे आपको खुद से रुबरु करवा देते हैं ..और कहते हैं पसंद आये तो दाद दे देना /यही है मेरे अशआर का इनाम
और आज का सच .. किताबों से उठ कर नेट पर आ गया /मीर हो या ग़ालिब का कलाम ...
एक सच और ...
जिनको चाह किये दोस्तों की तरह
वो बदलते रहे मौसमों की तरह

बाकी रचनाओं में इनकी रचना बेटियाँ कहाँ पीछे हैं बेटों से ..यह कहते हुए की जन्म नहीं कर्म भाग्य बनाता है /बेटों का भी और बेटियों का भी ...डॉ रागिनी मिश्र की रचनाओं में तुम प्रथम .आओ खेले भ्रष्ट -भ्रष्ट और हमारा आनलाइन प्रेम ...बहुत ही चमकीली रचनाएं है ....मेरी मृगतृष्णा में आखरी पंक्तियाँ बहुत जोरदार है ..
जीवन के बढ़ते क्रम में
मेरी प्रेमाग्नि भड़कती जाती है
होगी पूर्णाहुति इसमें ,तुम्हारी
या मेरी मृगतृष्णा बन जायेगी ?सवाल वाजिब है ..और बहुत गहरा  भी ..
रोशी अग्रवाल की रचनाएँ लिखी तो अच्छी है ..पर कहीं कही कहीं बहुत सपाट सी हैं .पढने में कुछ अलग हैं और प्रस्तुत करने का ढंग एक कहानी सा लगा ....कविता कम और बाते कहती सी अधिक लगी इन की रचनाएं .
विश्वजीत सपन ..इस संग्रह में बहुत सी विवधिता लिए से बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी बातें सुनाते हुए लगे ..इनकी क्षणिकाएँ .हाइकु .मुक्तक बहुत ही बेहतरीन हैं इस संग्रह में ...
तुम तो जालिम हो
सामने आ कर गुजर जाती हो
कभी सोचा है तुमने
उस दिल का क्या होगा
जिसपे चल कर गुजर जाती हो

या यह ..करवट ले /नींदे तोड़ जाती हैं /यादें मुझको ....और एक हाइकु ..बहुत ही बढ़िया बात ...चुभन देता /अत्तित का दामन /छोड़ता नहीं !
सुमन मिश्रा ..की रचनाओं में मरीचिका पर लिखे हाइकु बहुत बढ़िया लगे ..बिलकुल मृगतृष्णा संग्रह को शब्द देते हुए ..
जल तलाश
तलाव कहीं पर हो
जीवन वहीँ !
सही कहा ..यही तो है सच ..इनकी बाकी रचनाएं अच्छी है ..कुछ तो बहुत ही गहरे भाव में उतरी हैं ..कहीं मन पंख सा उडता ,कहीं पत्थर सा भारी है ..में लिखी यह पंक्तियाँ
ये इश्क भी अजब बात है ,जब दूर है तब पास है
रिश्तों की अहमियत ही क्या किस किस को कहे ख़ास है
हेमंत कुमार दुबे की रचनाओं में प्रमुख रचना उनकी मृगतृष्णा ,तुम्हारे ख़त बहुत बेहतरीन लगी ..देश भक्ति पर लिखी इनकी रचनाएं जोश से दिल को भर देती हैं .सामजिक विषयों में नारी और जीवन संगिनी ने भी प्रभवित किया है
हर सुख दुःख की साथी
मेरी अन्तरंग सखी हो तुम
मन प्राण का आधार हो
जीवन संगिनी हो तुम ....सही परिभाषा है हमसफर की ...
जब इतने सारे लिखने वाले एक संग्रह से जुड़ते हैं तो विविधता हर रचना में आ जाती है ..इतने विचार अलग भाव और अलग लिखने के अंदाज़ ..जो कहीं कहीं बहुत बेहतरीन लगते हैं और कहीं कहीं खटक जाते हैं ....एक साथ संग्रह लाने में बहुत से वो लफ्ज़ .वो नाम और वो व्यक्तित्व भी पढने को मिल जाते हैं जो अनजान थे अब तक लेखन की दुनिया से ...यह अच्छा भी है और हिंदी भाषा के लिए बेहतरीन भी ..और मुझे लगता है कि  इस में हर लिखने वाला खुद ही अपने लिखे को आँक सकता है कि  वह कहाँ पर बेहतर है कहाँ कम है ....इन लिखी रचनाओं में आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बिम्ब मौजूद है ...काव्य -कला चूँकि एक कुदरत का वरदान है और कोई नहीं जानता कि कब और किसके अंतर्मन रूपी कलश में "वो "कृपा उड़ेल दे और वो हमें इसी तरह संग्रह में पढने को मिलता रहे इस के लिए सम्पादक को धन्यवाद देना चाहिए जिन्होंने नए लिखने वालों को मन और ह्रदय में विचार ,भाव ,सम्वेंदना और अनुभूति के भाव इस संग्रह में पिरोये हैं  वह जीवन के सच से परिचय करवाते हैं ठीक इसी संग्रह से ली गयी इन्ही पक्तियों सा सच ......

मन दौड़ता जाता है
वासनाओं के संग
गर्म रेतीले संसार में
जल के भ्रम में
जो मिलता नहीं
खो जाता है ....खो के फिर फिर मिलना ही जीवन कहलाता है और
पथिक मन
दूरियाँ तय कर
मरीचिका थी ..!!सुन्दर साज सज्जा से सजी साहित्य प्रेमी संघ के दस रचनाकारों की यह तृष्णा अपने कवर पेज पर दौड़ते हुए मृगों के साथ तलाशती मरीचिका आपके दिल को जरुर मोह लेगी |






Saturday, September 22, 2012

हम है मीर


हम है मीर (हाइकु -संग्रह)
मधु चुतर्वेदी
मूल्य- रु ९९
प्रकाशक- हिंद युग्म,
1, जिया सराय,
हौज़ खास, नई दिल्ली-110016
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सत्रह वर्ण
भरते हाइकु में
अर्थ का स्वर्ण

मधु जी द्वारा रचित यह हाइकु के बारे में लिखा उनके हाइकु संग्रह के बारे में खुद ही बात करने लगता है
मधु जी के संग्रह के बारे में लिखते हुए कुछ जानकारी इस विषय की भी ले लेते हैं .हालाँकि हिंदी साहित्य से अब यह अपरिचित नहीं रह गयी है ..फिर भी कई लिखने वाले पूरी तरह से इस विधा से परिचित नहीं है ..
हाइकु हिंदी साहित्य की अनेकानेक विधाओं में 'हाइकु' नवीन  विधा है। हाइकु मूलत: जापानी साहित्य की प्रमुख विधा है। आज हिंदी साहित्य में हाइकु की भरपूर चर्चा हो रही है। हिंदी में हाइकु खूब लिखे जा रहे हैं और अनेक पत्र-पत्रिकाएँ इनका प्रकाशन कर रहे हैं। निरंतर हाइकु संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं। यदि यह कहा जाए कि वर्तमान की सबसे चर्चित विधा के रूप में हाइकु स्थान लेता जा रहा है तो अत्युक्ति न होगी। जापानी हाइकु कवि बाशो ने कहा है, "जिसने जीवन में तीन से पाँच हाइकु रच डाले, वह हाइकु कवि है। जिसने दस हाइकु की रचना कर डाली, वह महाकवि है।"हाइकु कविता आज विश्व की अनेक भाषाओं में लिखी जा रही हैं तथा चर्चित हो रही हैं।  हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है।  हाइकु के लिए हिंदी बहुत ही उपयुक्त भाषा है।थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कहना आसान नहीं है। हाइकु लिखने के लिए बहुत धैर्य की आवश्यकता है।हाइकु काव्य का प्रिय विषय प्रकृति रहा है। हाइकु प्रकृति को माध्यम बनाकर मनुष्य की भावनाओं को प्रकट करता है। हिंदी में इस प्रकार के हाइकु लिखे जा रहे हैं। हाइकु विधा दिखने में जितनी सरल है उतनी ही लिखने में मुश्किल एक दम से आये विचार को को सत्रह वर्णों में लिख देने की कला कम नहीं होती है .और इस मुश्किल काम को मधु जी ने अपने हाइकु संग्रह हम हैं मीर में बखूबी कर दिखाया है ...
             'हम है मीर'  पुस्तक का लोकार्पण हिंदी के मशहूर  कवि एवं कविता-मंच के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. कुँअर बेचैन ने किया। इस पुस्तक का प्रकाशन हिंद युग्म ने किया है। इस हाइकु-संग्रह में कवयित्री डॉ. मधु चतुर्वेदी के 501 हाइकु संकलित हैं।और सभी बहुत ही मनमोहक है ..खुद मधु जी के शब्दों में "मैंने हाइकु में तुकान्त दे कर अपनी काव्य संस्कृति परम्परा को वाशो के साथ जोड़ने का प्रयास किया है वाशो और कबीर की आत्मा को एकमेक करने की अपनी परिकल्पना को एक साथ साकार करने का प्रयास है  मुझे विश्वास है कि दोनों हो महाकवियों की आत्माएं मुझे इस के लिए आशीष देंगी|"
हाइकु मूलरूप से प्रकृति की कविता हॅ। एक अच्छे हाइकु में ऋतुसूचक शब्द आना चाहिए। लेकिन सदा ऐसा हो, यह जरूरी नही। हाइकु, प्रकृति तथा प्राणिमात्र के प्रति प्रेम का भाव मन में जगाता है। अत: मानव की अन्त: प्रकॄति भी इसका विषय हो सकती है हिन्दी में हाइकु लिखने की दिशा में बहुत तेजी आई है।  मधु जी ने भी अनेक ऐसे हाइकु लिखे हैं जो प्रकृति से जुड़े हुए हैं
यह गोल चंदा
रात की हथेली पे
चांदी का सिक्का

और यह खूबसूरत चित्रण

फुला गुलमोहर
सांझ पर ज्यों
उतरी दोपहर
हाइकु में अब समाज में जो भी कुछ हो रहा है उस पर भी लिखा जा रहा है |मधु जी के हाइकु भी आज के समाज के प्रतिबिम्ब है
तोड़ दे मौन
कोई छांट दे कोहरा
वो कोई कौन ?
समाज है तो राजनीति भी है  उस पर भी मधु जी कलम खूब चली है
ये गणतंत्र
गणना पर टिका
संख्या का तंत्र
आज की भारतीय राजीनति पर भी खूब कहा है मधु जी ने
ओ धर्मराज
क्या दुष्कर्मियों को ही
मिलेगा ताज
मधु जी दर्शनशास्त्र से भी जुडी हुई है ..उसका प्रभाव भी उनके हाइकु लिखने में आया है
मन के तार
ही सुख या दुःख के
होते आधार
और जन्म मृत्यु के लिए बहुत सही कहा है उन्होंने
आत्मा अमर
फिर क्यों सताता है
मृत्यु का डर
मधु जी ने गीत दोहा कविता गजले सभी अपमी कलम से उतारी हैं और वह प्रेम की  कवियत्री भी मानी जाती है |जब सब विधा में उनकी कलम से यह प्रेम गीत गाया है तो यहाँ कैसे वह इस हाइकु विधा में चुक सकती है
प्रिय की गली
ऊँची नीची टेढ़ी भी
लगती भली
प्रेम का रास्ता बहुत ही अनूठा है उस में प्रेम ही मुख्य रहता है इस बात को उन्होंने बहुत सुन्दर ढंग से कहा है
ओ मनमीत
हम दोनों ही हारे
जीती है प्रीत
सबसे अच्छा हाइकु मुझे इस में उनका रति प्रेम पर लगा
चांदनी रात
बहकते जज्बात
प्रेम उत्पात ...
कम शब्दों में कह दी सारी बात ...बहुत ही मनमोहक है यह विधा जो आसानी से अपनी बात यूँ कह जाती है
पी मकरंद
भंवरे ने सुनाया
तृप्ति का छंद
इसी में उनका ढाई आखर खंड भी है जो बहुत बहुत सुन्दर है उसका हर हाइकु बहुत ही बेहतरीन लिखा गया है
ढाई आखर
राधा के मन ,गए
संतोष भर
मधु जी ने इस हाइकु संग्रह को कई खंडो में बांटा है और हर खंड का नाम भी हाइकु विधा में है
नभ को फांद,
नीम की डाली पर
अटका चाँद     .............इस में कुदरत और पर्यावरण पर लिखा बेहद रोचक है ...                       

दीपक तले
युगों से निरंतर
अँधेरा पले............................इस में मुहावरे और लोकोक्ति को सुन्दर नए ढंग से हाइकु में पिरोया गया है
ढाई आखर
पढ़े सुने प्रेम के
ज्ञानी  हो नर ..ढाई आखर है तो वह प्रेम से ही पगे हुए होंगे ..जो दिल को मोह लेते हैं ..
आदि हर खंड अपनी बात बहुत अच्छे से पाठक तक पहुंचा देता है |परिवार से जुड़े हाइकु भी सही में रिश्ते को पूरे परिभाषित कर देते हैं ..माँ की दुआ /जो था असंभव/संभव हुआ .....और दादी के प्यार के तो क्या कहने ...दादी का प्यार /मूल से भी अधिक /ब्याज का भार ...बेटियाँ तो जान होती है किसी भी रिश्ते की किसी भी परिवार की ...बेटी का प्यार /आँगन में झरता /हरसिंगार
 मधु जी ने इस के अलावा कई मुहावरों और लोकोक्ति पर भी हाइकु रच दिए हैं
..आँख के अंधे /नाम नयन सुख /गोरखधंधे ........अँधा जो बांटे /रेवड़ी ,फिर फिर /अपने छांटे..कौन बचाए ..यह एक नया प्रयोग है जो बहुत अच्छा लगा पढने में ....उनके इस संग्रह में हाइकु के अलावा डमरू भी संकलित किये गए हैं हाइकु में जैसे पांच सात पांच अक्षर होते हैं डमरू के पहली और तीसरी में सात सात और दूसरी में पांच अक्षर होते हैं ..जैसे छज्जे पर कबूतर /गूंजता घर / गुटर गूं गुटर /
मधु जी के कुछ हाइकु तुकांत में भी हैं ...आँखों का जल /उमड़ा छल छल /बहा काजल ......अलंका
रों का सुन्दर प्रयोग किया गया है यमक अलंकार जिस में प्रमुख है ..जिस से नए नए अर्थ निकल कर आते हैं ...प्यासी धरती /दरकी ,कब तक /धेर्य धरती ..इस में धरती के मायने अलग अलग हैं ...
उनके पहले पन्ने पर डॉ कुअंर बैचेन ने बहुत ही अच्छा लिखा है मधु जी के इस हाइकु संग्रह के बारे में ऊँचे दर्जे के आई क्यू वाले हाइकु का गुलदस्ता है यह संग्रह .जिस में भाषा ,बिम्ब .प्रतीक ,समाज राजनीति आदि सब एक सात दिखाई देते हैं ..इसको पढ़ कर पढने वाला वाह किये बिना नहीं रह सकता है ...वहीँ डॉ राहुल अवस्थी जी ने कहा है कि अलग विषयों पर उनके लिखे यह हाइकु उनकी लेखनी की सफलता है ..और यदि ऐसे ही कुछ साहित्यकार हाइकु लिखने वाले हिंदी साहित्य को मिलते रहे तो बल्ले बल्ले है इस विधा की ...वहीँ मधु जी जो पहले हाइकु विधा से अधिक परिचित नहीं थी डॉ कुंवर बैचेन का हाइकु संग्रह पर्स पर तितली पढने के बाद हाइकु लिखने से जुड़ गयी ..और नतीजा यह संग्रह हमारे सामने हैं
मैं भी अभी इस विधा से पूर्ण रूप से लिख नहीं पायी हूँ ..पर इस संग्रह को पढने के बाद बहुत कुछ सीखा है मैंने इस संग्रह से ..और बहुत मजेदार कक्षा की तरह लगे मुझे इसके पाठ पढने और सीखने में ....यदि आप भी इस विधा को सही से समझना लिखना पढ़ना चाहते हैं तो इस संग्रह को पढना न भूलें ..और अंत में कुछ मधु जी के हाइकु जिन से मैं बहुत प्रभावित हुई ..
ये पेट की अगन
कूड़े से चिंदी
बीनता बचपन
सारा विष पी लिया
प्रदूषण का
नदी को है पीलिया
होंठ क्या खुले
कजरारी आँखों में
सपने धुले ...अदभुत संग्रह अदभुत विधा और अदभुत मधु जी लिखने वाली ..      

Saturday, September 15, 2012

प्रेम न हाट बिकाय.........



प्रेम न हाट बिकाय (उपन्यास ) 
 लेखक रविन्द्र प्रभात
मूल्य रूपये 
२७०
प्रकाशक- हिंद युग्म,
1, जिया सराय,
हौज़ खास, नई दिल्ली-110016
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प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय।।

प्रेम के ढाई आखर हर किसी के दिल में एक मीठी सी गुदगुदी पैदा कर देते हैं। कभी ना कभी हर व्यक्ति इस रास्ते से हो कर  ज़रूर निकलता है पर कितना कठिन है यह रास्ता। कोई मंज़िल पा जाता है तो कोई उम्र भर इस को जगह-जगह तलाशता रहता है। किसी  एक व्यक्ति के संग बिताए कुछ पल जीवन को एक नया रास्ता दे जाते हैं तब जीवन मनमोहक रंगो से रंग जाता है और ऐसे पलों को जीने की इच्छा बार-बार होती है।
प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं।।

रवीन्द्र प्रभात , हिन्दी साहित्य में एक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने साहित्यक ब्लॉगस को बड़ी गंभीरता से लिया और ब्लॉग के मुख्य विश्लेषको के रुप में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया ।  रवीन्द्र जी द्वारा लिखित  उनका दूसरा उपन्यास “ प्रेम न हाट बिकाय” पढा अभी जो प्रेम संबंधो पर आधारित हैं । इससे पहले उनका उपन्यास “ ताकि बचा रहे लोकतन्त्र” भी चर्चित रहा ।वह भी मैंने पढा था ..वह दलित विमर्श पर आधारित था| यह प्रेम न हाट बिकाय विशुद्ध रूप से प्रेम पर आधारित है| प्रेम के विषय में जितना कहा जाए उतना ही कम है .यह इतना व्यापक क्षेत्र है कि कुछ भी कहना इस पर मुझे तो कम लगता है | एक बार इस पर लिखी थी कुछ पंक्तियाँ
प्रेम एकांत है
नाम नही
जब नाम बनता है
एकांत ख़त्म हो जाता है !! प्रेम  जब यह हो जाए तो कहाँ देखता है उम्र ,,कहाँ देखता है जगहा ,और कहाँ अपने आस पास की दुनिया को देख पाता है बस डूबो  देता है ख़ुद में और पंहुचा देता है उन ऊँचाइयों पर जहाँ कोई रूप धर लेता है मीरा का तो कही वो बदल जाता है रांझा में .....पर सच्चा प्रेम त्याग चाहता है ,बलिदान चाहता है उस में दर्द नही खुशी का भाव होना चाहिये| बस यही कहानी इस उपन्यास की है ...आपने नाम के अनुसार  यह उपन्यास प्रेम की धुरी पर स्थापित दो समांतर प्रेम वृतों की रचना करता है, जिसके एक वृत का केंद्र प्रशांत और स्वाती का प्रेम-प्रसंग है तो दूसरे वृत की धुरी है देव और नगीना का प्रेम । एक की परिधि सेठ बनवारी लाल और उनकी पत्नी भुलनी देवी है तो दूसरे की परिधि देव की माँ राधा । इन्हीं पात्रों के आसपास उपन्यास का कथानक अपना ताना वाना बुनता है । पूरी तरह से त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग पर आधारित है यह उपन्यास । रविंदर जी ने इस उपन्यास में प्रेम के स्वरूप को देह से निकाल कर अध्यात्म तक पहुँचाने का प्रयास इसी कहानी के माध्यम से किया है |
         मैंने जो इस उपन्यास में महसूस किया वह यही इसी  अध्यात्म प्रेम को महसूस किया और जाना कि हम सभी ईश्वर से प्रेम करते हैं और साथ ही यह भी चाहते हैं कि  ज्यादा से ज्यादा लोग उस ईश्वर से प्रेम करें पूजा करें वहाँ पर हम ईश्वर पर अपना अधिकार नही जताते !हम सब प्रेमी है और उसका प्यार चाहते हैं परन्तु जब यही प्रेम किसी इंसान के साथ हो जाता है तो बस उस पर अपना पूर्ण अधिकार चाहते हैं और फिर ना सिर्फ़ अधिकार चाहते हैं बल्कि आगे तक बढ जाते हैं और फिर पैदा होती है शंका ..अविश्वास ...और यह दोनो बाते फिर खत्म कर देती हैं प्रेम को ...मीरा को कभी भी श्री कृष्णा और अपने प्यार पर कभी अविश्वास नही हुआ जबकि राधा को होता था अपने उसी प्रेम विश्वास के कारण कृष्णा को मीरा को लेने ख़ुद आना पड़ा प्रेम चाहता है सम्पूर्णता , मन का समर्पण ,आत्मा का समर्पण ....तन शाश्वत है .,.हमेशा नही रहेगा इसलिए तन से जुड़ा प्रेम भी शाश्वत नही रहता जिस प्रेम में अविश्वास है तो वह तन का प्रेम है वह मन से जुड़ा प्रेम नही है जिस प्रेम में शंका है वह अधिकार का प्रेम है........बस वही नजर इसी उपन्यास में नजर आती है |खुद रविन्द्र प्रभात जी के शब्दों में विवाह जैसी संस्था की परिधि में उन्मुक्त प्रेम की तलाश है यह उपन्यास । इसमें कथा की सरसता भी आपको मिलेगी और रोचकता भी । मित्रता, त्याग,प्यार और आदर्श के ताने बाने से इस उपन्यास का कथानक रचा गया है जो पाठकों को एक अलग प्रकार की आनंदानुभूति देने में समर्थ है ।
          इस उपन्यास का मुख्य पात्र प्रशांत और स्वाती है जिनके इर्द-गिर्द उपन्यास से जुड़ी समस्त घटनाएँ हैं जो पूरे उपन्यास को आगे बढ़ाती हैं । प्रशांत ग्रामीण परिवेश मे पला एक निम्न माध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता है जो शादी-शुदा है और स्वाती एक व्यवसायी की पुत्री है जो शहरी परिवेश मे पली बढ़ी है। घर में लड़ाई होने के कारण प्रशांत शहर आ जाता है और स्वाति के पिता के पास नौकरी करते करते स्वाति के प्रेम में पड़ जाता है |स्वाति जानती है कि प्रशांत विवाहित है पर प्रेम पर कब कौन रोक लगा पाया है और नारी शब्द ही प्रेम से जुडा है और जब नारी प्रेम करती है तो फिर सच्चे मन से खुद को समर्पित कर देती है |औरत प्रेम की गहराई में उतर सकती है |औरत के लिए मर्द की मोहब्बत और मर्द के लिए औरत की मोहब्बत एक दरवाज़ा होती है और इसे दरवाज़े से गुज़र कर सारी दुनिया की लीला दिखाई देती   है |और जब यह प्रेम हो जाए तो प्यार का बीज जहाँ पनपता है वहां दर्द साथ ही पैदा हो जाता है और वह दर्द जुदाई के दर्द में जब हो जाए तो इश्क की हकीकत ब्यान कर देता है ..स्वाति प्रशांत से प्रेम करती है और देव स्वाति से ...सब एक दूजे से जुड़े हुए हैं पर सब के अपने रास्ते हैं |......... यह भी एक हक़ीकत है कि  मोहब्बत का दरवाज़ा जब दिखाई देता है तो उस को हम किसी एक के नाम से बाँध देते हैं| पर उस नाम में कितने नाम मिले हुए होते हैं यह कोई नही जानता. शायद कुदरत भी भूल चुकी होती है कि जिन धागो से उस एक नाम को बुनती है वो धागे कितने रंगो के हैं, कितने जन्मो के होते हैं..वही इस कथानक में स्वाति और प्रशांत के प्रेम के लिए कहा जा सकता है |इसी कथा क्रम में नगीना और देव भी  जुड़ जाते हैं और उपन्यास एक रोचक मोड़ ले कर धीरे धीरे अपनी कहानी के गिरफ्त में ले लेता है ..

      पूरे उपन्यास में बनारस की आवोहवा और बनारस की संस्कृति हावी है ।   जिस के लिए रविन्द्र जी कहते हैं कि र्मैंने बनारस मे कई बरस गुजारें है इसलिए बनारसी परिवेश को उपन्यास मे उतारने मे मुझे मेरे अनुभवों ने काफी सहयोग किया । रविन्द्र जी के कुछ लफ्ज़ कहीं पढ़े थे इसी उपन्यास के सम्बन्ध में कि मेरी राय मे यदि विवाह उपरांत आपसी सहमति से प्रेम संबंध बनते हैं तो गलत नहीं है, क्योंकि हर किसी को अपनी पसंद-नापसंद का अधिकार होना ही चाहिए न कि किसी के थोपे हुये संबंध के निर्वहन मे पूरी ज़िंदगी को नीरसता मे धकेल दिया जाया । हो सकता है मेरे विचारों से आप इत्तेफाक न रखें मगर यही सच है और इस सच को गाहे-बगाहे स्वीकार करना ही होगा समाज को, नहीं तो एक पुरुष प्रधान समाज मे स्त्री की मार्मिक अंतर्वेदना के आख्यान का सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा, ऐसा मेरा मानना है ।" यह सबकी अपनी अपनी सोच हो सकती है प्यार की आभा के विस्तार में ना तो दूरी  मायने रखती है ना ही कोई तर्क वितर्क . त्याग भी एक सीमित अर्थ वाला शब्द बन जाता मुहब्बत में. प्यार को किसी शब्द सीमा में बांधना असंम्भव है ...सोलाह कलाएं सम्पूर्ण कही जाती है पर मोहब्बत .इश्क सत्रहवीं कला का नाम है जिस में डूब कर इंसान ख़ुद को पा जाता है |

इस उपन्यास में कहीं कहीं नाटकीय प्रभाव भी देखने को मिला है सच्चाई और कल्पना से बुना यह उपन्यास कहीं कहीं बहुत भावुकता भी बुन देता है जो मुझे पढ़ते हुए इस में अवरोध ही लगी है | इस किताब के प्रथम पन्ने पर प्रताप सहगल के लिखे से मैं भी सहमत हूँ कि यथार्थ और आदर्श मूल्यों के बीच झूलती उपन्यास की कथा कहीं कहीं मेलोड्रेमिक  भी हो जाती है जो हमें भावुकता के संसार से रु बरु करवा देती है और कहानी को जिस तरह से लिया गया है इसको पुरानी तर्ज पर नया उपन्यास कहा जा सकता है |बहुत सही कहा है उन्होंने ..मुझे भी पढ़ते हुए परिवेश और कई जगह इस में लिखे अंश पुरानी तर्ज़ याद दिला गए | रविन्द्र जी के अनुसार इस  उपन्यास को लिखने की खास वजह यह रही कि प्रेम की स्वतन्त्रता और विवाह जैसी संस्था आदि विवादित विषयों पर नए सिरे से पुन: गंभीर बहस हो । और जब तक यह पढा नहीं जायेगा तो बहस कैसे होगी .इस लिए कहूँगी कि पढने लायक है एक बार आप जरुर पढियेगा इसको |