हमेशा मुस्कुराना ज़रूरी नहीं होता...
कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो समय के साथ खत्म नहीं होते, बस भीतर कहीं शांत बैठ जाते हैं। फिर अचानक किसी याद, किसी शब्द या किसी खामोशी से जाग उठते हैं।
ऐसे में हमें उपदेश नहीं चाहिए— "सब ठीक हो जाएगा..." "पॉजिटिव सोचो..." "मजबूत बनो..."
क्योंकि हर घाव पर सकारात्मकता का मरहम नहीं लगाया जा सकता।
कभी-कभी इंसान को सहानुभूति भी नहीं चाहिए होती, उसे सिर्फ एक सच्चा वाक्य चाहिए होता है—
"मैं हूँ न... कहो, क्या तकलीफ़ है?"
किसी टूटे हुए व्यक्ति के लिए यह वाक्य हजार सलाहों से ज्यादा कीमती होता है। क्योंकि दर्द का इलाज हमेशा जवाब नहीं होते, कई बार सिर्फ किसी का साथ होता है।
याद रखिए, हर वक्त मजबूत दिखना ज़रूरी नहीं, कभी-कभी बिखर जाना भी इंसान होने का सबूत है।और रिश्तों की असली खूबसूरती वहीं शुरू होती है, जहाँ लोग आपकी मुस्कान नहीं, आपकी खामोशी भी समझने लगते हैं।
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