Wednesday, June 24, 2026

चढ़ावे का महान आध्यात्मिक बिजनेस

 चढ़ावे का महान आध्यात्मिक बिज़नेस मॉडल


 ईश्वर भी ऊपर बैठकर हमारी धार्मिक व्यवस्थाओं को देखकर मुस्कुराते होंगे और कहते होंगे—"वाह रे मेरे भक्तों, कमाल कर दिया

भक्त सोचता है कि उसका पैसा सीधे भगवान के खाते में जमा हो रहा है। लेकिन रास्ते में कुछ ऐसे दिव्य प्राणी मिल जाते हैं जिन पर भगवान की कृपा इतनी अधिक होती है कि देखते ही देखते उनकी पीढ़ियाँ तर जाती हैं। कोई नई गाड़ी ले लेता है, कोई होटल खोल लेता है, कोई आलीशान मकान बना लेता है। राम जी का नाम चलता रहता है और कुछ लोगों का काम चलता रहता है।


अब बेचारे भगवान भी क्या करें? वे तो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, शिकायत भी नहीं कर सकते।

मुझे तो लगता है कि अगर भगवान को सचमुच कोई विकल्प दिया जाए तो वे शायद कहें—

"भाई, मेरे लिए सोने का छत्र मत बनाओ। उसकी जगह किसी गरीब बच्चे की फीस भर दो। मुझे 56 भोग मत लगाओ, किसी भूखे को दो वक्त की रोटी खिला दो। मेरी मूर्ति पर लाखों की सजावट मत करो, किसी बीमार की दवा का इंतज़ाम कर दो।"


लेकिन नहीं, हम इंसान हैं। हमें सीधी बात कहाँ समझ आती है! भूखे को खाना खिलाने में फोटो कम आती है, जबकि मंदिर में बड़ा सा चढ़ावा चढ़ाने पर समाज में प्रतिष्ठा भी मिलती है और सेल्फी भी।


कबीर दास जी सदियों पहले समझा गए थे


"साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय, मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय।"


लेकिन हमने इसका नया संस्करण बना लिया


"साईं इतना दीजिए, बंगला मोटरकार, 

दानपेटी से हो सके तो खुल जाए व्यापार।"


धर्म का उद्देश्य इंसान को बेहतर बनाना था, लेकिन हमने  तो उसको प्रदर्शन  बना दिया है। जबकि सच्चाई इतनी सी है कि ईश्वर को सिर्फ हमारे सच्चे भाव पसंद है ,हमारी दयालुता पसंद है ।


किसी रोते हुए चेहरे पर मुस्कान लाना, किसी भूखे को भोजन देना, किसी प्यासे को पानी देना, किसी बच्चे को शिक्षा देना शायद यही वो चढ़ावा है जो सीधे भगवान तक पहुँचता है, बीच में किसी दानपेटी की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।


बाकी सोने के छत्र, चाँदी के मुकुट और करोड़ों के चढ़ावे देखकर ऊपर वाला भी कभी-कभी सोचता होगा—

"मेरे नाम पर कारोबार तो खूब चल रहा है, बस इंसानियत खत्म हो रही है"


 Please यह एक व्यंग्य है। इसमें व्यवस्था और दिखावे पर कहा है सिर्फ किसी व्यक्ति, समुदाय या आस्था का अपमान करना उद्देश्य नहीं है।



No comments: