Monday, November 02, 2015

ज़िंदगी की रात

खोई खोई उदास सी है
मेरी ज़िंदगी की रात
दर्द की चादर ओढ़  कर
याद करती हूँ तेरी हर बात
तुम बिन
ना जीती हूँ ना मरती हूँ मैं
होंठो पर रहती है
हर पल तुमसे मिलने की फ़रियाद
बहुत उदास सी है मेरी ज़िंदगी की रात

रूठ गए  मेरे अपने
टूट गये सब मेरे सपने
तुम्ही से तो थी मेरी ज़िंदगी में बहार
तुम थे तो था मुझे अपनी ज़िंदगी से प्यार
सजते थे तुम्ही से मेरे सोलह सिंगार
अब तो याद आती है बस तेरी हर बात
बहुत उदास सी है मेरी ज़िंदगी की रात

अब तो अपनी छाया से भी डरती हूँ मैं
तुम्ही बताओ अपने तन्हइयो से कैसे लड़ूं मैं
ले गये तुम साथ अपने मेरी हर बात
बहुत उदास तन्हा सी है मेरी ज़िंदगी की रात


Post a Comment