Monday, June 17, 2013

अनबुझ सी पहेली

तुझसे जुदा हो कर भी
  कहाँ तुझसे जुदा हो पाई हूँ
तेरी ही सुबह बन के 

  तेरे ही पहलू में सिमट के
लो आज फिर से "मैं" 

 तेरी ज़िंदगी में नयी उमंग लाई हूँ

बसी हूँ तेरे दिल की धड़कन में राग बन के
कभी तेरे ख़्यालो के रंगो में ढली हूँ
हूँ "मैं " ही तो संवाद तेरा अनकहा सा
तेरे गीतो में प्रतिबिंब बन के छाई हूँ

हूँ "मैं" ही  अभिव्यक्ति  तेरी
मैं ही तो तेरा आह्लाद  हूँ
हूँ मैं ही तेरे सांसो का स्वर
मैं ही तो तेरे जीवन का आधार हूँ

बसी हूँ मैं ही तेरी निश्चल हँसी में
तेरे संग तेरी तन्हाई से खेली हूँ
कभी हूँ संग तेरे बन के सावन की घटा
कभी तेरे लिए एक अनबुझ सी पहेली हूँ

पहचान ले मुझे मेरे हमसफ़र अब तो
तेरी महकी सी बातो में, बहकी सी रातो में
संग तेरे बन के नशा कभी बन के महक
तेरे नाम से जुड़ी कोई "नार अलबेली"हूँ 

रंजू ...
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