Friday, December 07, 2012

यह जीवन यूँ ही चलेगा

बदल गयी है सभी प्रथाएं
बदली बदली सी सभी निगाहें
उगने लगी है अब अन्याय की खेती
मुट्ठी में बस रह गयी है रेती

पर यह जीवन तब भी चलेगा
लिखा वक़्त का कैसा ट्लेगा

खो गये सब गीत बारहमासी
ख़्यालो में रह गये अब पुनू -ससी
अर्थ खो रही हैं सब बाते
सरगम के स्वर अब ना रिझाते

पर यह जीवन कैसे रुकेगा
लिखा वक़्त का हो के रहेगा

लोकतंत्र बीमार यहाँ है
जनमानस सहमा खड़ा है
मूक चेतना ठिठुर गयी है
चिरपरिचित भी अब अनजान मिलेगा

पर यह जीवन यूँ ही चलेगा
हर रंग में ढल के बहेगा

हरी धरती अब बंजर हुई है
अधरो की प्यास सहरा हुई है
सूखी शाखो पर फूल कैसे खिलेगा
यह पतझर अब कैसे वसंत बनेगा

पर यह जीवन यूँ ही चलेगा
लिखा वक़्त का कैसे ट्लेगा

माया के मोह में बँधा है जीवन
हर श्वास हुई यहाँ बंजारिन
जीना यहाँ बना है एक भ्रम
आँखो का सुख गया ग़ीलापन

पर भावों का गीत यह दिल  फिर भी बुनेगा
यह जीवन यूँ ही चला है ,
चलता रहेगा 

7 comments:

vandana gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (8-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

expression said...

जीवन जब तक है चलता ही रहता है.....
चाहे जो हो...
बहुत सुन्दर रचना..

अनु

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सही बात है, जीवन यूं ही अनवरत चलता ही रहता है ....

Anju (Anu) Chaudhary said...

सही लिखा ...जीवन यूँ ही निरंतर चलता रहेगा

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही प्यारी और भावो को संजोये रचना......

दिगम्बर नासवा said...

लोकतंत्र बीमार यहाँ है
जनमानस सहमा खड़ा है
मूक चेतना ठिठुर गयी है
चिरपरिचित भी अब अनजान मिलेगा ..

आज के समय को बाँधने की कोशिश है शब्दों में .... सच लिखा है ...

प्रवीण पाण्डेय said...

बहते रहना प्रकृति कार्य है