लगता है कभी कभी
मेरे भीतर
एक लावा सा
बहता है
खून नहीं
तब ओढती हूँ बर्फ ,
और
सो जाती हूँ
एक ठण्ड का
एहसास दे कर
अपने दिल को बहलाती हूँ
पर ज्वाला मुखी सा लावा ,
जैसे धधकता ही रहता है
बर्फ होते हुए सीने में ,
बहता ही रहता है
और फिर टूटते हुए
बाँध की तरह
बह जाने को होता है
तब मैं उस बाँध पर
अपनी ख़ामोशी की
रोक लगा देती हूँ
और मुस्कराते हुए
हर लावे को
अपने भीतर समेट लेती हूँ .............??
यह लिखी गयी पंक्तियाँ कुछ अधूरी सी है ...........आप सब अपनी राय इस पर आगे लिख कर दे सकते हैं ....
जब करनी होती ख़ुद से बाते तो में कुछ लफ्ज़ यूँ दिल के कह लेती हूँ .... ज़रा थम थम के रफ़्ता रफ़्ता चल ज़िंदगी कि यह समा या फ़िज़ा बदल ना जाए अभी तो आई है मेरे दर पर ख़ुशी कही यह तेरी तेज़ रफ़्तार से डर ना जाए!! - रंजू
Thursday, December 23, 2010
Wednesday, December 08, 2010
एक ख्वाइश
एक ख्वाइश
कि समेट लूँ
अपने
अँधेरे के
सब हिस्से
और गठरी में
बांध छोड आऊं
क्षितिज के पार
और ले आऊं
वहां से
एक लौ
रोशनी की
और तब तक रखूं उसको
मुस्कराहट की ओट में
जब तक वह
खिलखिलाती
हँसी में
तब्दील न हो जाए
7.12 .10
कि समेट लूँ
अपने
अँधेरे के
सब हिस्से
और गठरी में
बांध छोड आऊं
क्षितिज के पार
और ले आऊं
वहां से
एक लौ
रोशनी की
और तब तक रखूं उसको
मुस्कराहट की ओट में
जब तक वह
खिलखिलाती
हँसी में
तब्दील न हो जाए
7.12 .10
लेबल:
.kuch yun hi,
kavita
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