Friday, July 27, 2007

तुम्हारे शहर का मौसम बहुत सुहाना लगे मैं एक शाम चुरा लूं अगर बुरा ना लगे

भारत देश इतनी विवधता से भरा हुआ है की जितना देखा जाए उतना कम है .. अभी कुछ काम से अहमदाबाद जाना हुआ . दिल में एक कोतूहल और कुछ बदलाव देखेने की इच्छा मन में दबी थी..बहुत साल पहले द्वारका जाना हुआ था उस यात्रा की एक धुधंली सी याद कही दिल में अब भी छिपी थी ....उस के बाद कुछ साल पहले इस शहर ने भूकंप का कहर झेला था ...दिल में कही था की कैसा होगा अब यहाँ सब .पर सच में यहाँ के लोग जीना जानते हैं ... वही शहर अपने पूरे शबाब से जी रहा था ...वही चहल पहल ...और वही टू-वीह्लरर्स की भाग-दौड .. सच में अच्छा लगा .... दिन बहुत गरम और पसीने से नहला देना वाला उस पर बेटी के लिए चंद महीनो के लिए एक अदद रहने का ठिकाना तलाश करने की मुहिम ने हमे पूरे अहमदाबाद की सैर करवा दी ....शायद वहाँ के लोकल लोग इतना नही देख पाए होंगे जो हमने वाहना 4 दिन में देख डाला ... आश्रम रोड से दूर हाई रोड पर बने पेंटा हाउस तक हमने देख डाले ...


अंतःता
पसंद आया वहाँ के सबसे अच्छे इलाक़े वस्तरापुर में बना एक सुंदर सा घर ..जहाँ कई जगह से आई लड़कियाँ रहती है .... हर घर में झूला और बा :) सच में मेरे दिल को तो भा गये ......जगह जगह खाने की मौज ... क़दम क़दम पर आपको रेस्तोरेंट मिल जायंगे .... एक बात और वहाँ की अच्छी लगी की वहाँ के लोग जीना जानते हैं ... शनिवार, एतवार की शाम शहर को ज़िंदा दिली से भर देती है ...... दिन भर की गर्मी को शाम की ख़ुशनुमा हवा बरबस यह बात दिल से कहलवा ही देती है की .तुम्हारे शहर का मौसम बहुत सुहाना लगे मैं एक शाम चुरा लूं अगर बुरा ना लगे[:)]





सुरमई शाम बहती मस्त ब्यार
कल कल बहता यह नदिया का पानी
दिल में जगा देता है यह सब कुछ
एक नयी प्रीत कोई अनजानी

उगता सूरज ढलता चाँद
कह देता है एक कहानी
सोख चंचल लहरे
आते जाते सुना देती हैं
कुछ बाते सुहानी



साइन्स
सिटी ... में शाम को चलते रंगीन म्यूज़िकल फाउंटन ने हमारा दिल छू लिया ....तो गाँधी आश्रम और साबरमति के किनारे ने एक शांति सी दी दिल को ..... अभी पूरे शहर को देखने की प्यास दिल में रह गयी ... और बहुत से ख़ास लोगो से मिलना भी रह गया .... चद लफ़ज़ो में शायद इस शहर को ब्याँ करना मुश्किल होगा .. गाँधी नगर की खूबसूरती... अक्षर धाम का मनमोहक नज़ारा बांधँा कैसे जाएगा ... वैसे यहाँ के लोग बहुत ही मदद करने वाले हैं ...लॅंग्वेज भी यहाँ की थोडा ध्यान देने पर समझ जाती है
चार दिन में इस शहर को समझने के भरपूर मोका मिला ... बाक़ी अगले अंक में .. अभी के लिए इतना ही काफ़ी है ..कुछ पंक्तियाँ साबरमति के बहते जल को देख कर दिल में गयी ,








बहती
यह नदिया कब कौन सा राग सुना गयी
अनजान शहर था यह बेगाना
बसंत हवा ख़ुशनुमा फ़िज़ा
दिल को मेरे अपना बना गयी!!!! !!!!

12 comments:

Purva said...

bohot acha likha hai....jitna sundar shaher hai utna hi sundar yeh desrciption hai...

keep it up!

Sanjeet Tripathi said...

अमदावाद और वहां के अमदावादी!
एक पूरी किताब लिखी जा सकती है इन पर!

भूकंप के कुछ महीनों बाद ही अमदावाद में दो दिन और वहां से 300किमी दूर एक गांव में एक दिन गुजारने का मौका मुझे मिला था।
आपने कई स्मृतियां ताज़ा करवा दी, खासकर साबरमती आश्रम की फोटो देखकर। आश्रम में पेड़ के नीचे बैठकर सामने बहती नदी को देखते रहना एक अलग ही अनुभूति देता है!


बहुत अच्छा लिखा है आपने।

sanjay patel said...

अमूमन जाता हूं अहमदाबाद लेकिन बस एक ही चीज़ सालती है ...वाहनों का कारवाँ और पल पल बढ़ता प्रदूषण.वाक़ई प्यारा शहर रहा है लेकिन अपनी ख़ालिस गुजराते संस्कृति से कटता सा नज़रा आ रहा है आजकल. वजह भी साफ़ है...प्रवासियों की बढ़ती संख्या..जो रोज़ी की तलाश में आते हैं और शहर की तहज़ीब को उजाड़ देते हैं ..मेरा प्यारा शहर इन्दौर भी इसी दौर से गुज़र रहा है इन दिनों ..क्या आप यक़ीन करेंगी कि अभी...बिलकुल अभी मेरे शहर के नगर पालिक निगम ने एक सड़क को चौड़ा करने की खातिर 250 पेड़ शहीद कर दिये.महानगर बनने के लिये न जाने क्या क्या स्वाहा करना पड़ता है.अहमदाबाद का आँखों देखा हाल मर्मस्पर्शी बन गया है.साधुवाद.

Mohinder56 said...

रंजना जी,

आपने अहमदाबाद का इतना बढिया लेख लिखा कि बिना वहां जाये ही काफ़ी कुछ पता चल गया... जब जाऊंगा तो काफ़ी सहुलियत रहेगी...
फ़ोटो भी बहुत सुन्दर हैं

डा.अरविन्द चतुर्वेदी Dr.Arvind Chaturvedi said...

अहमदाबाद का सचित्र वर्णन पढकर आनन्दित हुआ.
अच्छा लिखा है. हमारी सैर तो मुफ्त में हो गयी ,और वो भी घर बैठे बिठाये.

Udan Tashtari said...

बढ़िया लगा आपकी कलम से अहमदाबाद देखना. क्या बैंगाणी बन्धुओं से मुलाकात नहीं हुई ?? ब्लॉगर मीट टाईप?

आगे विवरण की प्रतिक्षा है.

Prakash Solanki said...

Hi Ranju,
You have seen my city and enjoyed here and you liked it too. thanks for your wonderful compliment on Ahmedabad.

Abhi yaha aur bhi ahout kuch hai, jo tumne dekha nahi agar mujhe mauka mila abke jab tum yahan aaogi tau me tumhara guide banana chahunga.

You shot 2 nice pic of Nehru Bridge near Ashram Road. Your daughter is in Vastrapur that is the most beautiful area of my city.

Aapka Apna
Prakash Solanki...
Ahmedabad

मैथिली गुप्त said...

रंजना जी, आपने तो एसे लिखा है जैसे किसी कविता को पढ़ रहे हों

उन्मुक्त said...

मुझे तो दूसरा चित्र बहुत सुन्दर लगा।

Maulik's Blog said...

THanks for writing so nice about my beloved city..

Waise aaj kal fashion ho gayi hai bura likhane ki usmein yeh blog bahot sukoon diya..achha laga..

Come again in my city.

ilesh said...

Suhana e Desh mera isme suhana shahar hamara
shaan jo he Desh meri sartaj he ye shahar hamara

Milte he chand pal log apna bana ke le jate he , ye shahar to zindadili ka saboot he kese aapko apna sa na lagta ?
chand dino me mere shahar ko bakhubi pehchana he tumne , ya yun kahu ki tumhe is shahar ne apna bana liya he to sayad galat nahi hoga,bhid bhad tarakki karte sahahero me aam he lekin is shahar me ab bhi insaniyat zinda he ,.......... likhta rahu ga mere shahar ke baare me to uska ant lana mushkil hoga, Mauka bhi nahi na dastoor he kabhi aur sahi.......

Shukriya adaa karna chahuga Ranju , jitna bhi dekha tune is shahar ko jo mehsus kiya tune ise bahot sahi pehchana,yahi vo baat tujme he ki tera dil saaf aur sacha he aur tabhi itni sachi baat tum bol sakti ho.
hats of u dear ,

Ilesh shah

Divine India said...

ताज़गी से परिपूर्ण जानदार प्रस्तुति…
अहमदाबाद की आनंदमय सैर को आपने रंगीन बना डाला अपने कलम से… पढ़कर कर सारे चित्र एक-2 कर आँखों के सामने आते गये और दिलमें समाते चले गये…।